इतिहास और संस्कृति के किस्से-11

इतिहास और संस्कृति के किस्से-11

इटली का यात्री निकोलाओ मनूची और मुगल सम्राट शाहजहाँ के दरबार के किस्से

आज के लेख में चर्चा है मुगल बादशाह शाहजहाँ के समय के किस्सों की।
शाहजहाँ के समय के कुछ बहुत रोचक वृतांत  वेनिस, इटली से आये एक यात्री जिसका नाम निकोलाओ मनूची (Niccolao Manucci) था उसने दिए हैं। मनूची एक लेखक और चिकित्सक था, जिसने 17वीं सदी में मुगल साम्राज्य का प्रत्यक्षदर्शी वृत्तांत लिखा था. वह लगभग 16 साल की उम्र में भारत आया और अपनी पुस्तक "स्टोरियो डू मोगोर" (Storia do Mogor) में मुगल साम्राज्य के इतिहास, रीति-रिवाजों और सामाजिक जीवन का विस्तृत विवरण दिया. उसने दारा शिकोह, राजा जय सिंह और कई अन्य महत्वपूर्ण हस्तियों के लिए चिकित्सक के रूप में भी काम किया था।
मनूची ने शाहजहाँ के दरबार के किस्से भी अपनी पुस्तक में लिखे हैं।
वह लिखता है कि एक अजीब मामला दिहली (दिल्ली) में हुआ।
वहाँ चार व्यापारी थे, जिनकी एक दुकान में बराबर हिस्सेदारी थी। उस दुकान में एक बिल्ली भी थीं। तय हुआ कि वे बारी-बारी से दुकान पर बैठा करेंगे। जिस दिन जिसकी बारी होगी, वह दीपक के लिए तेल और दुकान में रखी बिल्ली के खाने का इंतज़ाम करेगा। अगर बिल्ली मर जाए तो उसी व्यापारी को दूसरी बिल्ली खरीदनी होगी।

एक दिन उस बिल्ली का पैर टूट गया। जिस व्यापारी की बारी थी, उसने इलाज कराया और बाक़ी तीन साझेदारों से कहा कि वे भी इलाज का कुछ हिस्सा दें। लेकिन उन्होंने मना कर दिया।
इलाज के दौरान बिल्ली के पैर में पट्टी बँधी थी। एक दिन बिल्ली दीपक के पास खुजला रही थी कि पट्टी में आग लग गई। घबराकर बिल्ली दुकान के सामानों के नीचे भागी और पूरा माल जलकर राख हो गया।

बाक़ी तीन व्यापारी चिल्लाने लगे कि यह नुक़सान उस व्यापारी को भरना होगा, जिसने बिल्ली का इलाज कराया था। राज्य की अदालत ने भी ऐसा ही फ़ैसला दिया। 
लेकिन मामला वहाँ खत्म नहीं हुआ और मामला  बादशाह शाहजहाँ के दरबार तक पहुँचा तो उसने फ़ैसला पलट दिया। उसने कहा —
"टूटा पैर तो चल नहीं सकता, बाक़ी तीन पैर ही दौड़े और आग फैली। इसलिए नुक़सान के ज़िम्मेदार तीन व्यापारी हैं, न कि वह व्यापारी जिसने इलाज कराया।"
और इस तरह तीनों को उस व्यापारी को भुगतान करना पड़ा।बादशाह ने समझाया कि कभी-कभी छोटे ख़र्च से बचने की लालच, बड़े विनाश का कारण बन जाती है।

मनूची एक और घटना का वर्णन करते हुए आगे लिखता है कि शाहजहाँ चोरों के मामले में बहुत सख़्त था।
वह कभी उन्हें माफ़ नहीं करता था। अगर चोरी छोटी होती तो चोरों को मौत की सज़ा नहीं दी जाती, बल्कि उन्हें सिंधु नदी के पार भेजकर पठान कुत्तों के बदले में बदल दिया जाता था। अगर चोर पकड़ में न आते, तो इलाक़े के अफ़सरों को नुक़सान की भरपाई करनी पड़ती थी।

1645 ई. में सूरत में ऐसा ही हुआ। चोरों ने रात में डच (हॉलैंड) लोगों की फैक्ट्री लूट ली। नुक़सान ज़्यादा नहीं था, फिर भी डच लोगों ने शिकायत की परन्तु वहाँ के गवर्नर ने उस शिकायत पर कोई ध्यान नहीं दिया। ग़ुस्से में डचों ने अपनी फैक्ट्री का सामान जहाज़ों पर लादा और नदी का रास्ता रोक दिया, ताकि न कोई अंदर आए और न बाहर जाए। अपने नुकसान की भरपाई हेतु उन्होंने गवर्नर से भारी मुआवज़ा माँगा।

जब शाहजहाँ को पता चला, तो उसने आदेश दिया कि डचों को ख़ज़ाने से पैसा दिया जाए, और गवर्नर से वसूली की जाए। इस घटना में डचों ने हज़ार गुना फ़ायदा कमाया। और तब से यह नियम बन गया कि चोरी या लूट का नुक़सान उसी इलाके़ का अधिकारी चुकाएगा।
मनूची बताता है कि उस समय बादशाह से सब डरते थे, लेकिन एक किस्सा हुआ जब एक अफसर ने अपनी जान की परवाह किये बिना शाहजहाँ की उपस्थिति में एक अजीबोगरीब हरकत की।
मनूची लिखता है कि मुगल सम्राट अकबर ने पहले से एक नियम यह  बनाया था कि शाही ख़ून यानी शाही परिवार के सामने कोई बैठ नहीं सकता था।
एक बार शाहजहाँ ने एक अफ़सर को ड्यूटी न निभाने पर डाँटकर नौकरी से निकाल दिया। तब वह अफ़सर न जाने क्या सोचकर बिना डरे बादशाह के सामने बैठ गया और उसने निर्भीकता से कहा —
"अब मैं न तुम्हारा नौकर हूँ, न वफ़ादार, इसलिए बैठ सकता हूँ।”

शाहजहाँ उसकी हिम्मत देखकर हैरान रह गया और प्रसन्न भी हुआ। बादशाह ने उसे फिर से नौकरी व वेतन वापस दे दिया। तब अफ़सर उठकर खड़ा हुआ और शाहजहाँ  ने उसे जगन्नाथ भेजा ताकि वहाँ विद्रोहियों से लड़े
अपनी किताब में मनूची एक और मजेदार वाकया बताता है कि गोलकुंडा (गुलकंदा) के राजा के राजदूत के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
वह शाहजहाँ को अत्यंत बुद्धिमान व्यक्ति प्रतीत हुआ, और उसने सार्वजनिक दरबार में उसकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। शाहजहाँ ने उससे पूछा कि क्या उसके स्वामी, अर्थात् गोलकुंडा के राजा की ऊँचाई, शाहजहाँ  के एक दास (ग़ुलाम) के बराबर है, जो उस समय उपस्थित था और मक्खियाँ भगा रहा था।

राजदूत ने  इसमें छिपा व्यंग्य और इसका जो अर्थ था उसे समझ लिया, उसने अपनी नज़र उठाकर उस दास को देखा, और फिर साहसपूर्वक बादशाह से कहा :"मेरे राजा महामहिम (शाहजहाँ) से चार अंगुल ऊँचे हैं।”

यह उत्तर शाहजहाँ को अत्यंत प्रिय लगा, और उसने राजदूत की प्रशंसा एक वफ़ादार जागीरदार और अपने राजा का सच्चा सेवक कहकर की। उसने गोलकुंडा के राजा से वसूले जाने वाले तीन वर्ष के कर (ख़िराज) को माफ़ कर दिया। यह कर उस समय नौ लाख रुपये के बराबर था।इसके अतिरिक्त उसने राजदूत को एक समृद्ध सरोपा (सिलसिलेवार पोशाक) और एक सुंदर घोड़ा भी प्रदान किया।
मनूची लिखता है कि जब यह घटना और वार्तालाप हुआ, तो वो खुद भी वास्तव में बादशाह के दरबार में उपस्थित था।

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