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फिरोज़ाबाद — काँच का शहर, विरासत की आग

फिरोज़ाबाद — काँच का शहर, विरासत की आग सदियों से फिरोज़ाबाद की भट्टियों की लौ ने न जाने कितने लोगों के घरों को रोशनी दी है।  मुग़ल दरबारों से लेकर आधुनिक शो-रूम्स तक — यहाँ के शिल्पियों ने आग को सौंदर्य में और कौशल को विरासत में बदला है। पर इस जबरदस्त चमक के पीछे एक संघर्ष भी है।  आज भी अधिकांश कारीगर “देखकर सीखते” हैं — न कि किसी औपचारिक प्रशिक्षण या आधुनिक डिज़ाइन शिक्षा से और असलियत यह है कि यदि उनको उचित प्रशिक्षण मिले तो ये लोग कमाल ही कर देंगे।  हुनर पुराना है, और व्यवस्था शायद उससे भी पुरानी पड़ चुकी है। दुनिया जब वेनिस के Murano Glass की तारीफ़ करती है, तब यह समझना भी जरूरी हो जाता है कि  फिरोज़ाबाद के शिल्पकार सीमित साधनों, कच्चे माल की कमी और आधुनिक डिज़ाइन एक्सपोज़र के बिना भी अपनी कला को जीवित रखते हैं।  आधुनिक ऑटोमैटिक भट्टियाँ आईं, उत्पादन बढ़ा, लेकिन हाथ की वह नज़ाकत — वह आत्मा — जिसने इस शहर को पहचान और प्रसिद्धि दी, धीरे-धीरे खोने लगी। आज छोटे उद्योग लालफीताशाही, अनुमति, प्रक्रियाओं और भारी अनुपालनों में उलझे हैं।  ऊर्जा के रूप में गैस का उ...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 47 आज का किस्सा है भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 के घटनाक्रम का

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 47 आज का किस्सा है भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 के घटनाक्रम का और उस विषय में ब्रिटेन के तत्कालीन नेता विपक्ष बेंजामिन डिसराइली के प्रसिद्ध भाषण जो उन्होंने ब्रिटिश संसद में दिया और प्रसिद्ध विचारक और चिंतक कार्ल मार्क्स के इस विषय में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे लेख का साल था 1857 — जब भारत अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ अंगार बन उठा था।  दिल्ली, झाँसी, कानपुर, अवध, मेरठ और ग्वालियर — हर ओर विद्रोह की ज्वाला थी।  इसी समय, यूरोप में बैठा एक चिंतक Karl Marx ब्रिटिश उपनिवेशवाद की परतें उधेड़ रहा था। कार्ल मार्क्स के इस विषय पर कई लेख इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं।  14 अगस्त 1857 को उसने New York Daily Tribune में लंदन से  एक लेख लिखा —   “The Indian Question. उधर लंदन में ब्रिटेन की संसद में भी इस विषय पर उथल-पुथल थी। ब्रिटिश संसद और बेंजामिन डिसरेली का भाषण (27 जुलाई 1857) डिसरेली ने उस दिन प्रधानमंत्री लॉर्ड पामरस्टन की सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि  भारत में यह जो “विद्रोह” हो रहा है, वह किसी सिपाही की अवज्ञा नहीं, ...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 46 आज की इस पोस्ट में चर्चा करेंगे मुग़ल दरबार और बादशाहों से सम्बंधित कुछ और रोचक बातों की

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 46 आज की इस पोस्ट में चर्चा करेंगे मुग़ल दरबार और बादशाहों से सम्बंधित कुछ और रोचक बातों की जैसा मैं पहले बता चुका हूँ कि मुग़ल दरबार में प्रोटोकॉल तथा अन्य नियम-कायदे काफी कुछ स्पष्ट रूप ले चुके थे और उनका पालन करना ही होता था। मुग़ल बादशाह के दरबार में जो लोग मौजूद रहते थे उनके लिए वह क्या पहनेंगे, किस रंग के वस्त्र वहन सकते हैं और कौन से नहीं ये सारी बातें स्पष्ट रूप से निर्धारित थीं। लाल और पीले रंग के वस्त्र सिर्फ बादशाह ही पहन सकते थे। जो लोग दरबार में मौजूद रहते उनके सिर पर पगड़ी का बँधा होना जरूरी था और उनके पैर खाली होने चाहिए थे। दरबारियों के नाखूनों, दाढ़ी और पाजामों की लंबाई कितनी होगी यह भी तय होता था। एक बार का किस्सा है कि औरंगज़ेब के दरबार में मरहमत खान नामक व्यक्ति एक ऐसा पाजामा पहन कर चला आया जिससे कि उसके पैरों की उंगलियाँ नजर नहीं आ रही थीं। उसकी उंगलियाँ ढकी हुई थीं यह बात बादशाह की तेज नजरों से छिपी नहीं रह सकी और बादशाह ने तुरंत आदेश दिया कि उसके पाजामे को दरबार के शिष्टाचार  के मुताबिक कुछ इंच छोटा करवाया जाए और ऐसा ही किया भी गया। ल...

आसाम में चतुर्वेदी गए 16वीं शताब्दी में

कई बार बहुत से काम आप केवल अपनी खुशी (स्वान्तः सुखाय) के लिए करते हैं और ऐसे ही कोविड महामारी वाले समय में हमने भी श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय के इतिहास, संस्कृति, परंपरा आदि विषयों को समेटते हुए ‘चतुर्वेदी हैरिटेज’ नाम से एक यूट्यूब सीरीज बनाई थी जिसको देश-विदेश में फैले श्री माथुर चतुर्वेदी लोगों द्वारा काफी पसंद भी किया गया था।  अभी दो-तीन दिन पहले मेरे पास फेसबुक पर अरुण ज्योति छांगकाकोटी नाम से एक friend request आयी जिस पर मैंने पहले कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि एक तो मैं उनको जानता नहीं था दूसरे वह आसाम से थे जहाँ मेरा कोई विशेष सम्पर्क भी ध्यान में नहीं था। आज अरुण ज्योति की तरफ से एक मैसेज फेसबुक मैसेंजर पर आया जो मैं नीचे दे रहा हूँ। इस मैसेज को देख कर मुझको लगा कि मेरा चतुर्वेदी हैरिटेज की सीरीज बनाना कुछ सार्थक तो हुआ। अरुण ज्योति छांगकाकोटी के पूर्वज ज्योतिष के प्रकांड विद्वान थे और उस समय यानी लगभग सन 1575 में उनको तत्कालीन अहोम राजाओं ने अपनी मदद के लिए बुलाया था और इनको छांगकाकोटी की उपाधि दी (वैसे हो सकता है मथुरा का चतुर्वेदी आसाम पहुँचते-पहुँचते छांगकाकोटी हो गया ह...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 45 कुछ और बातें आगरा की

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 45 कुछ और बातें आगरा की आज की पोस्ट में हम स्व0 सतीश चंद्र चतुर्वेदी जी के आगरा पर लिखे ग्रंथ आगरानामा में लिखी आगरा की कुछ और बातों की चर्चा करेंगे आगरा के किले पर मराठों का कब्जा हो चुका था और उसका किलेदार एक डच जॉन हैंसिंग था जो 1794 से मराठों की सेवा में था। कलकत्ता में फोर्ट विलियम बनाने के बाद अंग्रेजों ने अपने को और मजबूत किया तथा अपनी विस्तारवादी नीति पर अमल करना शुरू कर दिया। सतीश चंद्र चतुर्वेदी जी ने आगरानामा में लिखा है कि अंग्रेजों ने योजना बना कर दिल्ली से सेना भेज कर आगरा किले के अमर सिंह दरवाजे पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों के 5 हजार सैनिक थे और जनरल लेक के गोपनीय प्रयासों से किले के ढाई हजार सैनिक भी अंग्रेजों से मिल गए और 17 अक्टूबर 1803 को शाम को किले की शेष सेना को जानमाल की सलामती का आश्वासन देकर किले ओर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। किलेदार हैंसिंग का निधन 1803 में आगरा किले में ही हुआ। अंग्रेजों के हाथ 25 लाख रुपया,162 बंदूकें और पीतल की विशाल तोप लगी। ये वही ऐतिहासिक तोप थी जिसको अंग्रेजों ने अपनी जीत की खुशी में ब्रिटेन के राजा जार्ज...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 44 रानादिल और औरंगज़ेब : एक स्त्री की गरिमा

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 44 रानादिल और औरंगज़ेब : एक स्त्री की गरिमा  आज का किस्सा है औरंगज़ेब के अपने बड़े भाई दारा की पत्नी पर मोहित होने का और उस पत्नी की प्रतिक्रिया का यह किस्सा इतालवी यात्री,लेखक और डॉक्टर मनूची की पुस्तक से लिया गया है। दारा शिकोह की हार के बाद दिल्ली की हवाओं में वीरान सन्नाटा था।  दारा के खून से सनी तलवारें अभी सूखी भी नहीं थीं कि औरंगज़ेब का ध्यान दारा की पत्नियों की ओर गया। दारा जिसका कत्ल कर दिया गया था उसकी पत्नियों में से एक थी बाई उदेपुरी —जो गोरी जॉर्जियन नस्ल की थ। औरंगज़ेब ने उसको हाजिर होने का सन्देश भेजा जो उसने मान लिया। औरंगज़ेब ने उससे शादी की इच्छा जताई जो उसने मान ली और उसकी शादी औरंगज़ेब से हो गयी। इस शादी से वह आगे चलकर औरंगज़ेब के पुत्र काम बख़्श की माँ बनी।  दारा की दूसरी पत्नी थी — रानादिल, इस नाम का अर्थ था “स्वच्छ हृदय”।  वह जन्म से हिंदू थी और बादशाह शाहजहाँ के दरबार में एक नर्तकी थी। उसके अप्रतिम सौंदर्य से दारा उस के प्रति बुरी तरह से आसक्त हो गया और वह उससे शादी करना चाहता था परंतु दारा की बेगम नूरमहल इससे बुरा मा...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 43 सिकन्दर के आक्रमण वाले समय के भारत में हाथीमेगस्थनीज की पुस्तक इंडिका

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 43 सिकन्दर के आक्रमण वाले समय के भारत में हाथी मेगस्थनीज की पुस्तक इंडिका  आज की पोस्ट में चर्चा है सिकन्दर के साथ आये मेगस्थनीज की इंडिका की जिसके साथ मुझको एरियन की इंडिका का पहला भाग भी इनके अंग्रेज़ी संकलन में देखने को मिला और साथ ही साथ हमको आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी द्वारा मेगस्थनीज की इंडिका के उपलब्ध हिस्सों का अनुवाद जो ‘मेगस्थनीज का भारत वर्णन’ के नाम से है उसको भी पढ़ने का सौभाग्य मिला। इस पुस्तक में मेगस्थनीज, एलियन और स्ट्रैबो इन सबके उध्दरण दिए गए हैं जिससे हमको सिकंदर के आक्रमण के समय के भारत के विषय में अच्छी जानकारी मिलती है। उस समय साधारण व्यक्ति को हाथी या घोड़ा रखने की अनुमति नहीं थी। ये पशु राजा की विशेष सम्पत्ति समझे जाते थे। हाथी पकड़ने को भूमि के एक खुले हिस्से में लगभग पाँच या छह स्टेडिया (उस समय के माप की कोई इकाई शायद)  की एक गहरी खाई खोदी जाती और उस पर एक पतला पुल रखा जाता था जिस पर से भीतर घेरे में जाने का रास्ता होता था। अब इस घेरे के अंदर तीन या चार सधी हुयी हथनियाँ लायी जाती थीं। मनुष्य लोग खुद आसपास के झोपड़ियों में छि...