इतिहास और संस्कृति के किस्से – 44 रानादिल और औरंगज़ेब : एक स्त्री की गरिमा
इतिहास और संस्कृति के किस्से – 44
रानादिल और औरंगज़ेब : एक स्त्री की गरिमा
आज का किस्सा है औरंगज़ेब के अपने बड़े भाई दारा की पत्नी पर मोहित होने का और उस पत्नी की प्रतिक्रिया का
यह किस्सा इतालवी यात्री,लेखक और डॉक्टर मनूची की पुस्तक से लिया गया है।
दारा शिकोह की हार के बाद दिल्ली की हवाओं में वीरान सन्नाटा था।
दारा के खून से सनी तलवारें अभी सूखी भी नहीं थीं कि औरंगज़ेब का ध्यान दारा की पत्नियों की ओर गया।
दारा जिसका कत्ल कर दिया गया था उसकी पत्नियों में से एक थी बाई उदेपुरी —जो गोरी जॉर्जियन नस्ल की थ। औरंगज़ेब ने उसको हाजिर होने का सन्देश भेजा जो उसने मान लिया। औरंगज़ेब ने उससे शादी की इच्छा जताई जो उसने मान ली और उसकी शादी औरंगज़ेब से हो गयी। इस शादी से वह आगे चलकर औरंगज़ेब के पुत्र काम बख़्श की माँ बनी।
दारा की दूसरी पत्नी थी — रानादिल, इस नाम का अर्थ था “स्वच्छ हृदय”।
वह जन्म से हिंदू थी और बादशाह शाहजहाँ के दरबार में एक नर्तकी थी। उसके अप्रतिम सौंदर्य से दारा उस के प्रति बुरी तरह से आसक्त हो गया और वह उससे शादी करना चाहता था परंतु दारा की बेगम नूरमहल इससे बुरा मानकर नाराज हो जाएगी इसलिए शाहजहाँ ने इस शादी की इजाज़त नहीं दी। उसके प्रेम में दारा घुलने लगा और उसकी तबियत इतनी खराब हुयी कि लगा मानो उसकी आखिरी साँसे ही बची थीं। आखिर में हार मानकर शाहजहाँ ने इस शादी की अनुमति प्रदान कर दी। रानादिल जितनी सुंदर थी उतना ही पवित्र उसका हृदय भी था और उसने दारा की इस बात का कि उस जैसी साधारण हैसियत की लड़की को दारा ने अपनी पत्नी बनाया, सदैव मान रखा।
तो जब औरंगज़ेब का संदेश उसके पास पहुँचा, उसने पूछा —
“बादशाह मुझे क्यों बुला रहे हैं?”
उसको बताया गया कि “क्योंकि कानून कहता है कि मृत बड़े भाई की पत्नी जीवित छोटे भाई की हो जाती है।”
रानादिल ने फिर पूछा — “क्या बादशाह को मुझमें क्या अच्छा लगा है?”
औरंगज़ेब ने कहा — “मुझे उसके बालों के प्रति आकर्षण है।”
इतना सुनते ही रानादिल मुस्कराई, फिर अपने लंबे रेशमी बाल काटे, उन्हें रेशमी कपड़े में लपेटा और भेज दिया क्रूर बादशाह औरंगजेब के पास बिना उससे खौफ खाये कहलवाया कि
“यह रहा वह सौंदर्य जिसके लिए तुम्हारा दिल मचलता है। अब मुझे एकांत का जीवन जीने दो।”
पर औरंगज़ेब कहाँ मानने वाला था!
उसने फिर कहलवाया कि “तुम्हारी सुंदरता इतनी अनुपम है कि मैं तुम्हें अपनी पत्नियों में देखना चाहता हूँ। तुम मुझमें दारा को ही देखना, तुम्हारा रानी का दर्जा और पूरा सम्मान जो था वही कायम रहेगा।”
बस, इतना सुनना था कि रानादिल अपने कक्ष में गई, एक तीखी छुरी उठाई, और आईने के सामने खड़ी होकर अपना चेहरा काट डाला। उसका चेहरा लहूलुहान हो गया और उसके रक्त से भीगा वह कपड़ा उसने दरबार में भेजा और लिखा —
“यदि मेरे सौंदर्य की तलाश थी, तो वह अब मिट चुका है;
यदि मेरे रक्त से तुम्हारी तृप्ति होती है — तो वह भी तुम्हारा है।”
रानादिल का इतना साहस देखकर स्वयं औरंगज़ेब भी निःशब्द रह गया।
इसके बाद औरंगज़ेब ने इस विषय में कोई प्रयास नहीं किया और रानादिल का पूरा सम्मान बरकरार रखा।
रानादिल, जो कभी दरबार की एक नर्तकी थी,
दारा के प्रेम से उठकर शहज़ादी बनी और अंततः अपने आत्म-सम्मान से इतिहास की अमर रानी हो गई।
आज की पोस्ट में बस इतना ही
अगली पोस्ट में फिर मिलेंगे किसी नए किस्से के साथ।
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