इतिहास और संस्कृति के किस्से – 43 सिकन्दर के आक्रमण वाले समय के भारत में हाथीमेगस्थनीज की पुस्तक इंडिका
इतिहास और संस्कृति के किस्से – 43
सिकन्दर के आक्रमण वाले समय के भारत में हाथी
मेगस्थनीज की पुस्तक इंडिका
आज की पोस्ट में चर्चा है सिकन्दर के साथ आये मेगस्थनीज की इंडिका की जिसके साथ मुझको एरियन की इंडिका का पहला भाग भी इनके अंग्रेज़ी संकलन में देखने को मिला और साथ ही साथ हमको आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी द्वारा मेगस्थनीज की इंडिका के उपलब्ध हिस्सों का अनुवाद जो ‘मेगस्थनीज का भारत वर्णन’ के नाम से है उसको भी पढ़ने का सौभाग्य मिला। इस पुस्तक में मेगस्थनीज, एलियन और स्ट्रैबो इन सबके उध्दरण दिए गए हैं जिससे हमको सिकंदर के आक्रमण के समय के भारत के विषय में अच्छी जानकारी मिलती है।
उस समय साधारण व्यक्ति को हाथी या घोड़ा रखने की अनुमति नहीं थी। ये पशु राजा की विशेष सम्पत्ति समझे जाते थे। हाथी पकड़ने को भूमि के एक खुले हिस्से में लगभग पाँच या छह स्टेडिया (उस समय के माप की कोई इकाई शायद) की एक गहरी खाई खोदी जाती और उस पर एक पतला पुल रखा जाता था जिस पर से भीतर घेरे में जाने का रास्ता होता था। अब इस घेरे के अंदर तीन या चार सधी हुयी हथनियाँ लायी जाती थीं। मनुष्य लोग खुद आसपास के झोपड़ियों में छिप जाते थे। जंगली हाथी दिन में इस फंदे के निकट नहीं आते किंतु रात को एक-एक करके इसके भीतर चले जाते थे और उसके बाद इसका दरवाजा बंद कर दिया जाता था। इसके बाद सबसे तगड़े (trained) हाथियों को उसके अंदर ले जाकर इन जंगली हाथियों से लड़ाया जाता था और उनको भूखा भी रखा जाता था। जब लगता कि वो जंगली हाथी अशक्त हो गए तो जानकार मनुष्य इन जंगली हाथियों के पेट के नीचे जाकर उनके पैर कसके बाँध देते थे। जब जंगली हाथी बिल्कुल थक जाते थे तो जंगली और घरेलू पालतू हाथियों की गर्दनों को एक साथ बैल के गीले चमड़े के पट्टों से बांध दिया जाता है। इस सबसे जंगली हाथियों के गर्दनों में घाव हो जाते थे। इस घाव और चमड़े के पट्टे के पड़े होने से उतपन्न पीड़ा उन हाथियों को बेड़ियां सहन करने और चुपचाप पड़े रहने को मजबूर करती थी। इसके बाद धीरे-धीरे उनकी भूख में राहत देने को नरकटों और घास को खिला कर उनको पालतू बनाया जाता है। इसके बाद यही हाथी इतने पालतू और प्रशिक्षित हो जाते हैं कि अपने फीलवान के लिए वह एक मजबूत साथी हो जाते हैं और यदि कभी किसी दुर्घटनावश वे अपने प्रशिक्षक या फीलवान को मार देते हैं तो फिर वो हाथी खुद भी अपना खाना पीना छोड़ देता है। हाथी माँ अपने बच्चे को छह वर्षों तक दूध पिलाती है और हाथी की आयु कभी-कभी तो 200 वर्ष के ऊपर की भी होती थी।
हाथियों को रोग भी कई किस्म के होने का खतरा रहता है और इनको ठीक होने में बहुत समय लगता था। इंडिका में लिखा है कि हाथी की आंख के रोगों के लिए गाय के दूध से धोना उसकी दवा है। उनके घावों को अच्छा करने हेतु उनको मक्खन से मला जाता था और उनके घावों को सुअर के मांस से सेका भी जाता था। हाथियों को अन्य रोगों के लिए काली मदिरा पिलायी जाती थी।
किताब के खंड 37 में एक और बहुत मजेदार बात लिखी है। जब जंगली हाथी को पालतू बनाया जा रहा होता है तो बीच-बीच में वह बहुत कुपित रहता है या उसका मूड बहुत खराब रहता है। ऐसे में उसको साधने के काम में लगे भारतवासी उसके पास अपने गानों के देसी राग गाते हैं और उसको एक प्रचलित वाद्ययंत्र जो स्किनडिप्सस Skindapsos कहलाता है और जिसमें चार तार लगे रहते हैं उसकी ध्वनि से प्रसन्न करते हैं। इस पर हाथी अपने कान उठाता है और उस मनोरंजक आलाप के वश में हो जाता है।
इस पुस्तक में जीव जंतुओं की चर्चा से ऐसा प्रतीत हुआ कि भारतवर्ष की भूमि केवल ऋषियों, कवियों और सम्राटों की नहीं रही — यह उन संवेदनशील आत्माओं की भी रही है जिन्होंने मनुष्य और पशु के बीच की दूरी को करुणा से पाट दिया।
प्राचीन यूनानी इतिहासकारों ने जब भारत को देखा, तो उनके लिए यह केवल एक “पूर्व का देश” नहीं था — यह एक ऐसी सभ्यता थी जहाँ संगीत, विज्ञान और दया एक ही सूत्र में बंधे थे।
मेगस्थनीज़ अपनी पुस्तक “Indica” में लिखता है —
“भारतवासी अपने पशुओं के साथ उसी दया और अनुशासन से व्यवहार करते हैं जैसे वे अपने परिवार के साथ करते हैं।
पशु को अनावश्यक रूप से मारना पाप माना जाता है।
राजाओं के अस्तबलों में हाथियों को देवता समान सम्मान दिया जाता है।”
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने “मेगस्थनीज़ की इंडिया” के अपने अनुवाद में इस अंश पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि
“मेगस्थनीज़ के भारत में मनुष्य और पशु के बीच का सम्बन्ध श्रद्धा का है, भय का नहीं।
यहाँ दया ही धर्म है, और धर्म ही संस्कृति।”
जब यूनान और रोम में पशु केवल शिकार या मनोरंजन का माध्यम थे, भारत में वही हाथी संगीत का श्रोता, सेवा का पात्र, और राज्य का साथी था।
यह वही भारत है जहाँ “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” — का अर्थ केवल मनुष्यों के लिए नहीं, बल्कि सृष्टि के प्रत्येक जीव के लिए था।
एरिअन के शब्दों में भारत संगीत से क्रोधित हाथी को शांत करने वाला देश था,
और मेगस्थनीज़ के शब्दों में भारत अपने पशुओं को देवता समान मानने वाला राष्ट्र था।
आज की पोस्ट में बस इतना ही
अगली पोस्ट में मिलेंगे किसी नए किस्से और मजेदार जानकारी के साथ।
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