इतिहास और संस्कृति के किस्से – 45 कुछ और बातें आगरा की

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 45
कुछ और बातें आगरा की

आज की पोस्ट में हम स्व0 सतीश चंद्र चतुर्वेदी जी के आगरा पर लिखे ग्रंथ आगरानामा में लिखी आगरा की कुछ और बातों की चर्चा करेंगे

आगरा के किले पर मराठों का कब्जा हो चुका था और उसका किलेदार एक डच जॉन हैंसिंग था जो 1794 से मराठों की सेवा में था। कलकत्ता में फोर्ट विलियम बनाने के बाद अंग्रेजों ने अपने को और मजबूत किया तथा अपनी विस्तारवादी नीति पर अमल करना शुरू कर दिया। सतीश चंद्र चतुर्वेदी जी ने आगरानामा में लिखा है कि अंग्रेजों ने योजना बना कर दिल्ली से सेना भेज कर आगरा किले के अमर सिंह दरवाजे पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों के 5 हजार सैनिक थे और जनरल लेक के गोपनीय प्रयासों से किले के ढाई हजार सैनिक भी अंग्रेजों से मिल गए और 17 अक्टूबर 1803 को शाम को किले की शेष सेना को जानमाल की सलामती का आश्वासन देकर किले ओर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। किलेदार हैंसिंग का निधन 1803 में आगरा किले में ही हुआ। अंग्रेजों के हाथ 25 लाख रुपया,162 बंदूकें और पीतल की विशाल तोप लगी। ये वही ऐतिहासिक तोप थी जिसको अंग्रेजों ने अपनी जीत की खुशी में ब्रिटेन के राजा जार्ज तृतीय को भेंट किया था। कनिंघम को आगरा का प्रथम कलैक्टर बनाया गया। आगरा में 1803 में बारिश कम हुयी थी और 1804 में आगरा में अकाल भी पड़ा था। 1803 में ही आगरा में दीवानी अदालत का गठन हुआ था।
सन 1806 में मिर्जा गालिब आगरा में अपने नाना के घर पीपल मंडी की हवेली कलाँ में आकर बस गए थे। ग़ालिब की पैदाइश भी आगरा में इसी हवेली की थी। ग़ालिब के बचपन का एक खूबसूरत हिस्सा आगरा के इसी इलाके में बीता था। ग़ालिब अपने बचपन के दिनों में इसी हवेली की छत पर राजा बलवान सिंह के साथ पतंग के पेंच लड़ाया करते थे। ये राजा बलवान सिंह काशी के राजा चेत सिंह के पुत्र थे और उन दिनों आगरा में ही रह रहे थे। आगरा में वह स्थान फिर छत्ता राजा काशी के नाम से जाना जाने लगा।
सन 1809 में आगरा में एक भयंकर भूकम्प आया था जिसका वर्णन मियां नजीर ने, जो आगरा के एक लोकप्रिय कवि थे, इस भूकम्प के लिए लिखा था कि,
“पत्ता सा थरथरा गया पत्ताल का जिगर
वाहम किवाड़ लड़ पड़े जंजीरें हल गयीं।
कड़ियाँ कड़क-कड़क के छतों से निकल गईं 
दीवारें झूम-झूम के पंखे से झल गयीं।।
सतीश चंद्र जी ने अपनी पुस्तक में अंग्रेजों से सम्बंधित एक बहुत मजेदार बात लिखी है कि आगरा में जब अंग्रेज दिखने लगे तो लोग उनको देखकर बहुत आश्चर्यचकित होते थे। एक बार की बात है सन 1814 में ताजमहल के पास कोई मेला हो रहा था तो एक वृद्ध औरत ने किसी से कहा कि एक टापू में साहब लोग एक पेड़ पर अंडों से पैदा होते हैं।
आगरा धीरे-धीरे शिक्षा के एक बड़े केंद्र के रूप में भी विकसित हो रहा था। ईरान से मुल्ला अब्दुस्समद नाम के एक विद्वान सन 1810 में आगरा आये थे जो फारसी भाषा के मदरसा मुहम्मद मुअज्जम में पढ़ाने लगे थे और मजे की बात यह है कि ग़ालिब ने इन्हीं मुल्ला अब्दुस्समद से फारसी भाषा सीखी थी। आगरा की पीपल मंडी में ही काला महल में मुफीद ए आम मदरसा भी था। 
आगरा में सन 1823 में आगरा कॉलेज की स्थापना ‘मदरसा ए सरकारी’ नाम से राइट साहब की कोठी में हुई थी। इस विद्यालय की शुरुआत सिर्फ 18 विद्यार्थियों से हुई थी और बाद में इस संस्था से अनेकों विद्वान जैसे फिरोजाबाद के रायसाहब पूरनमल चौबे,के डी पालीवाल, सर तेजबहादुर सप्रू आदि पढ़ कर निकले और अपना नाम रोशन किया।

आज की पोस्ट में बस इतना ही
अगली पोस्ट में फिर मिलेंगे किसी नए किस्से के साथ।

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