इतिहास और संस्कृति के किस्से – 46 आज की इस पोस्ट में चर्चा करेंगे मुग़ल दरबार और बादशाहों से सम्बंधित कुछ और रोचक बातों की

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 46

आज की इस पोस्ट में चर्चा करेंगे मुग़ल दरबार और बादशाहों से सम्बंधित कुछ और रोचक बातों की

जैसा मैं पहले बता चुका हूँ कि मुग़ल दरबार में प्रोटोकॉल तथा अन्य नियम-कायदे काफी कुछ स्पष्ट रूप ले चुके थे और उनका पालन करना ही होता था। मुग़ल बादशाह के दरबार में जो लोग मौजूद रहते थे उनके लिए वह क्या पहनेंगे, किस रंग के वस्त्र वहन सकते हैं और कौन से नहीं ये सारी बातें स्पष्ट रूप से निर्धारित थीं। लाल और पीले रंग के वस्त्र सिर्फ बादशाह ही पहन सकते थे। जो लोग दरबार में मौजूद रहते उनके सिर पर पगड़ी का बँधा होना जरूरी था और उनके पैर खाली होने चाहिए थे। दरबारियों के नाखूनों, दाढ़ी और पाजामों की लंबाई कितनी होगी यह भी तय होता था। एक बार का किस्सा है कि औरंगज़ेब के दरबार में मरहमत खान नामक व्यक्ति एक ऐसा पाजामा पहन कर चला आया जिससे कि उसके पैरों की उंगलियाँ नजर नहीं आ रही थीं। उसकी उंगलियाँ ढकी हुई थीं यह बात बादशाह की तेज नजरों से छिपी नहीं रह सकी और बादशाह ने तुरंत आदेश दिया कि उसके पाजामे को दरबार के शिष्टाचार  के मुताबिक कुछ इंच छोटा करवाया जाए और ऐसा ही किया भी गया।
लेकिन यहाँ ये बात भी उल्लेखनीय है कि अपने कर्मों के कारण अकबर महान के रूप में जाना जाने वाला बादशाह अकबर वाकई में सबसे कुछ अलग ही था। फ्रांसिस मैनज़रेट के हवाले से एक घटना का उल्लेख प्रोफेसर हरबंस मुखिया ने किया है जो बहुत अद्भुत और मजेदार है। अकबर भीड़ में लोगों के बीच चला जाता था। कभी-कभी काम कर रहे मजदूरों के साथ मिलकर अकबर पत्थरों के खनन का काम खुद करने लगता था तो कभी किसी साधारण शिल्पकार को मूर्ति बनाते देख कर खुद कलाकृति बनाने लगता था। जो लोग उससे मिलना चाहते थे उनके लिए वह खुद को सुलभ बना देता था जो उस युग के लिए एक आश्चर्यजनक बात हुआ करती थी। शीराज़ी नामके एक ईरानी व्यक्ति ने उस समय के अपने ब्यौरों में बताया है कि एक बार अकबर बादशाह ईरान के शाह तहमास्प के राजदूत से मिलने वाला था। राजदूत के स्वागत-सत्कार के लिए एक बहुत बड़ा शामियाना लगवाया गया था। इस कार्यक्रम में शीराज़ी खुद भी शामिल था। शीराज़ी ने इससे पहले बादशाह सलामत को कभी रू ब रू नहीं देखा था। शीराज़ी वहाँ घूम ही रहा था कि अचानक चारों तरफ से बादशाह सलामत की आवाज़ें आने लगीं। शीराज़ी ने अपने दाएं और बाएं ओर देखा किंतु उसको राजसी वेशभूषा में कोई नजर नहीं आया। शीराज़ी ने लिखा है कि जब वह घूमा तो उसको लगभग बीस वर्षीय एक युवक वहाँ खड़ा दिखा उसका सर अपने एक हाथ पर टिका था और हाथ साथ खड़े एक व्यक्ति के कंधे पर था। फिर शीराज़ी ने अनुमान लगाया कि वही शहंशाह अकबर था। यह दृश्य देख कर शीराज़ी को बहुत ताज्जुब हुआ और उसने पूछा कि क्या इस देश में राजा के प्रति सम्मान नहीं प्रकट किया जाता? तब उसको पता चला कि सम्राट को सम्मान देने की यहाँ एक पूरी प्रक्रिया तय है लेकिन सम्राट अकबर एक बहुत अनौपचारिक व्यक्ति हैं। वह अक्सर अपने निजी कक्ष से अनौपचारिक वेशभूषा में लोगों के बीच निकल आते हैं और बिना किसी भेदभाव के परिचित-अपरिचित सबसे मिलते हैं।
एक बार शीराज़ी ने सम्राट अकबर को लुंगी पहने अपने कक्ष की छत से पतंग उड़ाते देखा। पतंग उड़ाते वक़्त बादशाह का सर भी नंगा था वह टोपी आदि कुछ नहीं पहने था। अकबर की सादगी का एक रूप ये भी था हाँलाँकि यह अकबर बादशाह का ही समय था जब दरबार और सरकारी नियम,कायदे और प्रोटोकॉल अपना रूप ग्रहण कर रहे थे जिनकी चर्चा पहले की भी है।

अब आज की पोस्ट में बस इतना ही
अगली पोस्ट में मुलाकात होगी किसी और किस्से के साथ।

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