इतिहास और संस्कृति के किस्से – 47 आज का किस्सा है भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 के घटनाक्रम का
इतिहास और संस्कृति के किस्से – 47
आज का किस्सा है भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 के घटनाक्रम का और उस विषय में ब्रिटेन के तत्कालीन नेता विपक्ष बेंजामिन डिसराइली के प्रसिद्ध भाषण जो उन्होंने ब्रिटिश संसद में दिया और प्रसिद्ध विचारक और चिंतक कार्ल मार्क्स के इस विषय में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे लेख का
साल था 1857 — जब भारत अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ अंगार बन उठा था।
दिल्ली, झाँसी, कानपुर, अवध, मेरठ और ग्वालियर — हर ओर विद्रोह की ज्वाला थी।
इसी समय, यूरोप में बैठा एक चिंतक Karl Marx ब्रिटिश उपनिवेशवाद की परतें उधेड़ रहा था। कार्ल मार्क्स के इस विषय पर कई लेख इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं।
14 अगस्त 1857 को उसने New York Daily Tribune में लंदन से एक लेख लिखा —
“The Indian Question.
उधर लंदन में ब्रिटेन की संसद में भी इस विषय पर उथल-पुथल थी।
ब्रिटिश संसद और बेंजामिन डिसरेली का भाषण (27 जुलाई 1857)
डिसरेली ने उस दिन प्रधानमंत्री लॉर्ड पामरस्टन की सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि
भारत में यह जो “विद्रोह” हो रहा है, वह किसी सिपाही की अवज्ञा नहीं,
बल्कि ब्रिटिश नीतियों के अन्याय और लालच का परिणाम है।
डिसरेली ने संसद में कहा:
“The principle of adoption, the very cornerstone of Indian society, has been systematically set aside by the Government.
What man was safe throughout India?”
उन्होंने विस्तार से बताया कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने
– सतारा, नागपुर, झाँसी, बरार, और अंततः अवध जैसी रियासतों को जबरन विलय कर लिया;
– दत्तक अधिकार (Right of Adoption) — जो भारतीय समाज की आत्मा था — उसे समाप्त कर दिया;
– मंदिरों और मस्जिदों की भूमि तक को जब्त कर लिया;
– और यह सब “राजस्व सुधार” के नाम पर किया गया।
“This was confiscation by new means, but upon an extensive and shocking scale,”
उन्होंने कहा — यह लूट का नया रूप था,
जिसमें तलवार नहीं, क़ानून का मुखौटा पहना गया था।
डिसरेली ने चेतावनी दी कि यह केवल सैनिक विद्रोह नहीं,
बल्कि उस समाज का विस्फोट है जिसकी आस्था, संपत्ति और अस्मिता — तीनों पर प्रहार हुआ है।
“This is no mere mutiny; it is the outcome of a policy that has destroyed the confidence of the people.”
न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून में मार्क्स ने लिखा:
“The present Indian disturbance is not a military mutiny, but a national revolt,
of which the Sepoys are the acting instruments only.”
उन्होंने बताया कि ब्रिटिश साम्राज्य ने पहले “Divide et Impera” —
फूट डालो और राज करो — की नीति से शासन किया,
पर 1848 के बाद उसने इससे भी आगे बढ़कर नई नीति अपनाई —
“Destroy the nationalities of India.”
यानी भारत की राष्ट्रीय संरचना को ही मिटा दो।
मार्क्स ने अपने लेखों में विस्तार से बताया कि कैसे
– रियासतों का विलय हुआ,
– दत्तक अधिकार का अंत किया गया,
– धार्मिक संस्थानों की ज़मीनें छीनी गईं,
– और यहां तक कि वादे के अनुसार पेंशनें तक रोकी गईं।
उन्होंने लिखा:
“What man was safe? What feudatory, what freeholder who had not a child of his own loins was safe throughout India?”
“This was confiscation by new means — upon an extensive, startling, and shocking scale.”
मार्क्स ने ब्रिटिश नीतियों को भारत की सामाजिक संरचना पर सीधा प्रहार बताया —
और लिखा कि सिपाही केवल मुखर माध्यम हैं, असल में यह भारत की जनता की आत्मा का विद्रोह है।
“The revolt of the Indian army is but the visible form of a deeper national awakening.”
दरअसल मार्क्स के यह लेख बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मार्क्स के ये लेख उस युग का पहला यूरोपीय साक्ष्य था,
जिसने भारत के आंदोलन को केवल “Mutiny” नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के रूप में स्वीकार किया।
इस लेख ने पश्चिमी जगत को बताया कि भारत कोई अंधविश्वासी या जड़ समाज नहीं,
बल्कि एक सजीव सभ्यता है जो अपने अधिकारों के लिए उठ खड़ी हुई है।
अपने एक लेख में (17 जुलाई 1857 को लंदन से लिखा और 4 अगस्त को न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून में छपा) में मार्क्स ने लिखा है कि फ्रांस के पत्रों से खबर मिली है कि 4000 अंग्रेज सिपाही तो सिर्फ भीषण गर्मी के कारण अपने प्राणों से हाथ धो बैठे हैं। दिल्ली के पतन का समाचार अब किसी भी दिन मिल सकता है; पर उसके बाद क्या? यदि विद्रोहियों का एक महीने तक भारत साम्राज्य के पारंपरिक केंद्र पर अधिकार बंगाल सेना को तोड़ने, कलकत्ता से पंजाब और राजपूताना तक विद्रोह फैलाने तथा ब्रिटिश सत्ता हिलाने का कारण बना, तो यह मानना भूल होगी कि दिल्ली का पतन विद्रोह को शांत या शासन को पुनः स्थापित कर देगा।
कार्ल मार्क्स ने एक और बहुत ही महत्वपूर्ण बात लिखी जिससे भारत के देशी सैनिकों की एकता की भावना का सबूत मिलता है।
मार्क्स ने लिखा है कि बंगाल की देशी सेना लगभग 80,000 की थी — जिनमें 28,000 राजपूत, 23,000 ब्राह्मण, 13,000 मुसलमान, 5,000 नीची जातियों के हिंदू और शेष यूरोपीय थे। इनमें से 30,000 सैनिक विद्रोह, पलायन या बर्खास्तगी से गायब हो चुके हैं। बाकी कई रेजिमेंटों ने कहा है कि वे ब्रिटिश सत्ता का साथ देंगी, पर विद्रोही देशी सैनिकों के खिलाफ नहीं जाएँगी, बल्कि अपने “भाइयों” की मदद करेंगी।
कलकत्ता से लेकर हर स्थान तक यह देखा गया — देशी रेजिमेंटें पहले शांत रहीं, पर जैसे ही वे शक्तिशाली हुईं, उन्होंने विद्रोह कर दिया। The London Times के एक भारतीय संवाददाता ने स्पष्ट किया है कि जिन रेजिमेंटों या देशी निवासियों ने अभी तक पक्ष नहीं लिया, उनकी “निष्ठा” संदिग्ध है।
भारत की इस ऐतिहासिक घटना पर ये दो आवाज़ें जो उठीं एक आवाज़ ब्रिटिश संसद के भीतर से — बेंजामिन डिसराइली की और दूसरी, यूरोप की कलम से — कार्ल मार्क्स की।
दोनों ने स्वीकार किया कि 1857 केवल “सिपाही विद्रोह” नहीं था,
बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना का प्रथम विस्फोट था —
जिसने साम्राज्य की नींव हिला दी।
इतिहास की सबसे बड़ी सच्चाई यही है कि जब अन्याय सीमाएँ पार करता है,तो साम्राज्य ढहते हैं और राष्ट्र जन्म लेते हैं।
आज की पोस्ट में बस इतना ही
जल्द ही मुलाकात होगी एक नयी पोस्ट में किसी और नए किस्से से
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