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Showing posts from October, 2025

फिरोज़ाबाद — काँच का शहर, विरासत की आग

फिरोज़ाबाद — काँच का शहर, विरासत की आग सदियों से फिरोज़ाबाद की भट्टियों की लौ ने न जाने कितने लोगों के घरों को रोशनी दी है।  मुग़ल दरबारों से लेकर आधुनिक शो-रूम्स तक — यहाँ के शिल्पियों ने आग को सौंदर्य में और कौशल को विरासत में बदला है। पर इस जबरदस्त चमक के पीछे एक संघर्ष भी है।  आज भी अधिकांश कारीगर “देखकर सीखते” हैं — न कि किसी औपचारिक प्रशिक्षण या आधुनिक डिज़ाइन शिक्षा से और असलियत यह है कि यदि उनको उचित प्रशिक्षण मिले तो ये लोग कमाल ही कर देंगे।  हुनर पुराना है, और व्यवस्था शायद उससे भी पुरानी पड़ चुकी है। दुनिया जब वेनिस के Murano Glass की तारीफ़ करती है, तब यह समझना भी जरूरी हो जाता है कि  फिरोज़ाबाद के शिल्पकार सीमित साधनों, कच्चे माल की कमी और आधुनिक डिज़ाइन एक्सपोज़र के बिना भी अपनी कला को जीवित रखते हैं।  आधुनिक ऑटोमैटिक भट्टियाँ आईं, उत्पादन बढ़ा, लेकिन हाथ की वह नज़ाकत — वह आत्मा — जिसने इस शहर को पहचान और प्रसिद्धि दी, धीरे-धीरे खोने लगी। आज छोटे उद्योग लालफीताशाही, अनुमति, प्रक्रियाओं और भारी अनुपालनों में उलझे हैं।  ऊर्जा के रूप में गैस का उ...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 47 आज का किस्सा है भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 के घटनाक्रम का

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 47 आज का किस्सा है भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम यानी 1857 के घटनाक्रम का और उस विषय में ब्रिटेन के तत्कालीन नेता विपक्ष बेंजामिन डिसराइली के प्रसिद्ध भाषण जो उन्होंने ब्रिटिश संसद में दिया और प्रसिद्ध विचारक और चिंतक कार्ल मार्क्स के इस विषय में न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे लेख का साल था 1857 — जब भारत अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ अंगार बन उठा था।  दिल्ली, झाँसी, कानपुर, अवध, मेरठ और ग्वालियर — हर ओर विद्रोह की ज्वाला थी।  इसी समय, यूरोप में बैठा एक चिंतक Karl Marx ब्रिटिश उपनिवेशवाद की परतें उधेड़ रहा था। कार्ल मार्क्स के इस विषय पर कई लेख इंटरनेट पर भी उपलब्ध हैं।  14 अगस्त 1857 को उसने New York Daily Tribune में लंदन से  एक लेख लिखा —   “The Indian Question. उधर लंदन में ब्रिटेन की संसद में भी इस विषय पर उथल-पुथल थी। ब्रिटिश संसद और बेंजामिन डिसरेली का भाषण (27 जुलाई 1857) डिसरेली ने उस दिन प्रधानमंत्री लॉर्ड पामरस्टन की सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि  भारत में यह जो “विद्रोह” हो रहा है, वह किसी सिपाही की अवज्ञा नहीं, ...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 46 आज की इस पोस्ट में चर्चा करेंगे मुग़ल दरबार और बादशाहों से सम्बंधित कुछ और रोचक बातों की

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 46 आज की इस पोस्ट में चर्चा करेंगे मुग़ल दरबार और बादशाहों से सम्बंधित कुछ और रोचक बातों की जैसा मैं पहले बता चुका हूँ कि मुग़ल दरबार में प्रोटोकॉल तथा अन्य नियम-कायदे काफी कुछ स्पष्ट रूप ले चुके थे और उनका पालन करना ही होता था। मुग़ल बादशाह के दरबार में जो लोग मौजूद रहते थे उनके लिए वह क्या पहनेंगे, किस रंग के वस्त्र वहन सकते हैं और कौन से नहीं ये सारी बातें स्पष्ट रूप से निर्धारित थीं। लाल और पीले रंग के वस्त्र सिर्फ बादशाह ही पहन सकते थे। जो लोग दरबार में मौजूद रहते उनके सिर पर पगड़ी का बँधा होना जरूरी था और उनके पैर खाली होने चाहिए थे। दरबारियों के नाखूनों, दाढ़ी और पाजामों की लंबाई कितनी होगी यह भी तय होता था। एक बार का किस्सा है कि औरंगज़ेब के दरबार में मरहमत खान नामक व्यक्ति एक ऐसा पाजामा पहन कर चला आया जिससे कि उसके पैरों की उंगलियाँ नजर नहीं आ रही थीं। उसकी उंगलियाँ ढकी हुई थीं यह बात बादशाह की तेज नजरों से छिपी नहीं रह सकी और बादशाह ने तुरंत आदेश दिया कि उसके पाजामे को दरबार के शिष्टाचार  के मुताबिक कुछ इंच छोटा करवाया जाए और ऐसा ही किया भी गया। ल...

आसाम में चतुर्वेदी गए 16वीं शताब्दी में

कई बार बहुत से काम आप केवल अपनी खुशी (स्वान्तः सुखाय) के लिए करते हैं और ऐसे ही कोविड महामारी वाले समय में हमने भी श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय के इतिहास, संस्कृति, परंपरा आदि विषयों को समेटते हुए ‘चतुर्वेदी हैरिटेज’ नाम से एक यूट्यूब सीरीज बनाई थी जिसको देश-विदेश में फैले श्री माथुर चतुर्वेदी लोगों द्वारा काफी पसंद भी किया गया था।  अभी दो-तीन दिन पहले मेरे पास फेसबुक पर अरुण ज्योति छांगकाकोटी नाम से एक friend request आयी जिस पर मैंने पहले कोई ध्यान नहीं दिया क्योंकि एक तो मैं उनको जानता नहीं था दूसरे वह आसाम से थे जहाँ मेरा कोई विशेष सम्पर्क भी ध्यान में नहीं था। आज अरुण ज्योति की तरफ से एक मैसेज फेसबुक मैसेंजर पर आया जो मैं नीचे दे रहा हूँ। इस मैसेज को देख कर मुझको लगा कि मेरा चतुर्वेदी हैरिटेज की सीरीज बनाना कुछ सार्थक तो हुआ। अरुण ज्योति छांगकाकोटी के पूर्वज ज्योतिष के प्रकांड विद्वान थे और उस समय यानी लगभग सन 1575 में उनको तत्कालीन अहोम राजाओं ने अपनी मदद के लिए बुलाया था और इनको छांगकाकोटी की उपाधि दी (वैसे हो सकता है मथुरा का चतुर्वेदी आसाम पहुँचते-पहुँचते छांगकाकोटी हो गया ह...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 45 कुछ और बातें आगरा की

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 45 कुछ और बातें आगरा की आज की पोस्ट में हम स्व0 सतीश चंद्र चतुर्वेदी जी के आगरा पर लिखे ग्रंथ आगरानामा में लिखी आगरा की कुछ और बातों की चर्चा करेंगे आगरा के किले पर मराठों का कब्जा हो चुका था और उसका किलेदार एक डच जॉन हैंसिंग था जो 1794 से मराठों की सेवा में था। कलकत्ता में फोर्ट विलियम बनाने के बाद अंग्रेजों ने अपने को और मजबूत किया तथा अपनी विस्तारवादी नीति पर अमल करना शुरू कर दिया। सतीश चंद्र चतुर्वेदी जी ने आगरानामा में लिखा है कि अंग्रेजों ने योजना बना कर दिल्ली से सेना भेज कर आगरा किले के अमर सिंह दरवाजे पर आक्रमण कर दिया। अंग्रेजों के 5 हजार सैनिक थे और जनरल लेक के गोपनीय प्रयासों से किले के ढाई हजार सैनिक भी अंग्रेजों से मिल गए और 17 अक्टूबर 1803 को शाम को किले की शेष सेना को जानमाल की सलामती का आश्वासन देकर किले ओर अंग्रेजों का अधिकार हो गया। किलेदार हैंसिंग का निधन 1803 में आगरा किले में ही हुआ। अंग्रेजों के हाथ 25 लाख रुपया,162 बंदूकें और पीतल की विशाल तोप लगी। ये वही ऐतिहासिक तोप थी जिसको अंग्रेजों ने अपनी जीत की खुशी में ब्रिटेन के राजा जार्ज...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 44 रानादिल और औरंगज़ेब : एक स्त्री की गरिमा

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 44 रानादिल और औरंगज़ेब : एक स्त्री की गरिमा  आज का किस्सा है औरंगज़ेब के अपने बड़े भाई दारा की पत्नी पर मोहित होने का और उस पत्नी की प्रतिक्रिया का यह किस्सा इतालवी यात्री,लेखक और डॉक्टर मनूची की पुस्तक से लिया गया है। दारा शिकोह की हार के बाद दिल्ली की हवाओं में वीरान सन्नाटा था।  दारा के खून से सनी तलवारें अभी सूखी भी नहीं थीं कि औरंगज़ेब का ध्यान दारा की पत्नियों की ओर गया। दारा जिसका कत्ल कर दिया गया था उसकी पत्नियों में से एक थी बाई उदेपुरी —जो गोरी जॉर्जियन नस्ल की थ। औरंगज़ेब ने उसको हाजिर होने का सन्देश भेजा जो उसने मान लिया। औरंगज़ेब ने उससे शादी की इच्छा जताई जो उसने मान ली और उसकी शादी औरंगज़ेब से हो गयी। इस शादी से वह आगे चलकर औरंगज़ेब के पुत्र काम बख़्श की माँ बनी।  दारा की दूसरी पत्नी थी — रानादिल, इस नाम का अर्थ था “स्वच्छ हृदय”।  वह जन्म से हिंदू थी और बादशाह शाहजहाँ के दरबार में एक नर्तकी थी। उसके अप्रतिम सौंदर्य से दारा उस के प्रति बुरी तरह से आसक्त हो गया और वह उससे शादी करना चाहता था परंतु दारा की बेगम नूरमहल इससे बुरा मा...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 43 सिकन्दर के आक्रमण वाले समय के भारत में हाथीमेगस्थनीज की पुस्तक इंडिका

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 43 सिकन्दर के आक्रमण वाले समय के भारत में हाथी मेगस्थनीज की पुस्तक इंडिका  आज की पोस्ट में चर्चा है सिकन्दर के साथ आये मेगस्थनीज की इंडिका की जिसके साथ मुझको एरियन की इंडिका का पहला भाग भी इनके अंग्रेज़ी संकलन में देखने को मिला और साथ ही साथ हमको आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी द्वारा मेगस्थनीज की इंडिका के उपलब्ध हिस्सों का अनुवाद जो ‘मेगस्थनीज का भारत वर्णन’ के नाम से है उसको भी पढ़ने का सौभाग्य मिला। इस पुस्तक में मेगस्थनीज, एलियन और स्ट्रैबो इन सबके उध्दरण दिए गए हैं जिससे हमको सिकंदर के आक्रमण के समय के भारत के विषय में अच्छी जानकारी मिलती है। उस समय साधारण व्यक्ति को हाथी या घोड़ा रखने की अनुमति नहीं थी। ये पशु राजा की विशेष सम्पत्ति समझे जाते थे। हाथी पकड़ने को भूमि के एक खुले हिस्से में लगभग पाँच या छह स्टेडिया (उस समय के माप की कोई इकाई शायद)  की एक गहरी खाई खोदी जाती और उस पर एक पतला पुल रखा जाता था जिस पर से भीतर घेरे में जाने का रास्ता होता था। अब इस घेरे के अंदर तीन या चार सधी हुयी हथनियाँ लायी जाती थीं। मनुष्य लोग खुद आसपास के झोपड़ियों में छि...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 42 आज किस्सा है तसलीम कोर्निश और पाबोस का

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 42 आज किस्सा है तसलीम कोर्निश और पाबोस का जब किसी राज्य में स्थिरता आती है और मजबूती भी तो वहाँ शिष्टाचार या प्रोटोकॉल की एक व्यवस्था बनती है जो समय के साथ ही सुदृढ़ भी होती जाती है। इस शिष्टाचार की व्यवस्था के कई अंग और प्रतीक होते हैं। राजा के प्रभुत्व और उसकी महानता के प्रति अन्य सब लोगों की अधीनता को व्यक्त करने में इन शिष्टाचारी प्रतीकों का बहुत बड़ा रोल था। कूर्निश भी ऐसा ही एक शिष्टाचार था। एक ईरानी विद्वान सैय्यद हैदर शहरयार नकवी का मानना है कि हुमायूँ जब भारत से भाग कर ईरान गया और फिर वापस भारत आया तो कूर्निश तथा तसलीम वाले शिष्टाचार के ये नियम अपने साथ लाया जबकि फ्रांस्वा बर्नियर के अनुसार चापलूसी की बू से भरे ये नियम विशुद्ध भारतीय थे न कि उज़्बेक, फारसी या अरबी। शहंशाह से कोई फरमान लेते समय अथवा उनकी रसोई से भोजन लेते समय भी लेने वाले को कूर्निश का शिष्टाचार निभाना ही होता था। इसको दाहिने हाथ से करना होता था और बाएं हाथ से करने का अर्थ गम्भीर अपमान से लिया जाता था। कूर्निश करने का तरीका यह था कि दाएं हाथ की हथेली ललाट पर और सिर नीचे झुका हुआ होना...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 41 मुग़ल दरबार के कुछ और शिष्टाचार प्रोटोकॉल माँ, दादी माँ आदि

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 41 मुग़ल दरबार के कुछ और शिष्टाचार प्रोटोकॉल माँ, दादी माँ आदि जैसा हमको पता है कि मुग़ल दरबार में शिष्टाचार की एक महत्वपूर्ण परंपरा हुआ करती थी और इन तौर तरीकों में बहुत से ईरानी दरबारों के तौर-तरीकों से प्रेरित भी थे। शिष्टाचार के पालन में यद्यपि बादशाह छूट दे सकते थे किंतु उनके उल्लंघन पर कठोर दंडों की व्यवस्था भी थी। आज बात करते हैं मुग़ल बादशाहों द्वारा उनकी “माँ और दादी” को सम्मान देने के कुछ उदाहरणों की। परिवार के अंदर माँ, वृद्ध चाचियों और बुआओं का सम्मान सबसे ज्यादा था। इनको अभिवादन करके सम्मान देने के कोई स्थापित मानक नहीं बनाए गए थे किंतु सम्मान बहुत किया जाता था इसमें कोई शक नहीं है। बाबर ने बाबरनामा में सन 1507 की एक मुलाकात का जिक्र करते हुए लिखा है कि, “ सबसे पहले मैंने घुटने मोड़ कर पायन्दा-सुल्तान बेगम (बाबर की चाची) का अभिवादन किया और उनसे बातचीत की, फिर घुटने मोड़े बिना अपाक बेगम का अभिवादन किया, फिर घुटने मोड़कर खदीजा बेगम का अभिवादन कर उनसे मिला।” यहाँ यह स्पष्ट होता है कि जिनसे घुटने मोड़कर मिला जा रहा है वहाँ दोनों का दर्जा सांकेतिक रूप से...

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 40 मुग़ल बादशाहों के रक्त निकालने सम्बन्धी अनुष्ठान, नाड़ी और डॉक्टर

इतिहास और संस्कृति के किस्से – 40 मुग़ल बादशाहों के रक्त निकालने सम्बन्धी अनुष्ठान, नाड़ी और डॉक्टर मुग़ल दरबार के वैभव में केवल सत्ता और साज़िशें ही नहीं थीं, बल्कि कई ऐसे अनूठे रिवाज़ भी थे जो आज सुनकर अचरज में डाल देते हैं।  निकोलाओ मनूची – वह इतालवी यात्री और डॉक्टर (या वैद्य) जिसने शाहजहाँ और औरंगज़ेब के समय में भारत में जीवन बिताया – क़अपनी पुस्तक स्टोरिया दो मोगोर (Storia do Mogor) में कुछ ऐसे ही विचित्र प्रसंग दर्ज करता है। आज मैं जिक्र करने जा रहा हूँ ऐसी तीन घटनाओं का जो उस समय के  चिकित्सा, परंपरा और अंधविश्वास के अनोखे मेल को दर्शाती हैं। 1-शहज़ादा शाह आलम का रक्त निकालना मुग़ल राजाओं में साल में कम से कम एक बार शरीर से कुछ रक्त निकालने की परंपरा सी दिखाई देती है। उनका मानना था कि इस प्रकार शरीर का अशुद्ध रक्त निकल जाता है और उसके स्थान पर शुद्ध रक्त बनता है और हाँ यह रक्त कोई साधारण रक्त नहीं था। ये तो शाही रक्त था तो ये ऐसे ही फेंक नहीं दिया जाता था। मनूची लिखता है कि उसे एक बार शहज़ादा शाह आलम (जो आगे चलकर बहादुर शाह प्रथम बने) का इलाज़ करने बुलाया गया। उसे आदेश दिय...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-39 आज किस्सा मुग़ल बादशाहों के शुरुआती समय की कुछ बातें, कुछ किस्से शिष्टाचार के मसलों के

इतिहास और संस्कृति के किस्से-39 आज किस्सा मुग़ल बादशाहों के शुरुआती समय की कुछ बातें, कुछ किस्से शिष्टाचार के मसलों के समरकंद में एक महल हुआ करता था जिसका नाम गोकसराय था और इसको खुद तैमूर ने बनवाया था। बाबर ने बाबरनामा में लिखा है कि इस महल की एक अजब खसियत थी। बाबर लिखता है कि तैमूर के वंश का जो भी शहजादा उभरकर गद्दी लेता था वह उसी महल में आकर गद्दी पर बैठता था और  सुल्तान बनने की कोशिश में जो शहजादा नाकाम होकर मौत की सजा पाता था उसको भी यहीं लाकर मारा जाता था। इशारे में कहा जाता था कि ‘फलाने शाहजादे’ को गोकसराय ले गए। बाबर ने अपने बाबरनामा में 932 हिजरी के किस्सों के दौरान लिखा है कि जब वह सिंध से आगे बढ़ा तो उसने 'अर्रा बर्फ' यहीं देखी। अर्रा बर्फ का अर्थ है कि ऐसी बर्फ जिसने धरती को ऐसा ढक लिया हो कि बर्फ के सिवा कहीं कुछ न दिखाई पड़े। बाबर ने आगे लिखा है कि उसने हिंदुस्तान में 'गाला'(?) और 'चतियाल बर्फ' (?) भी देखी। इसमें ताज्जुब की बात यह है कि बाबर के इस लिखने पर हुमायूँ ने टिप्पणी की है कि, “आदरणीय वालिद साहब (बाबर) ठीक ही लिखते हैं कि (ये वाली बर्फ) हमने तब...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-38 ठग

इतिहास और संस्कृति के किस्से-38 ठग आज का किस्सा बड़ा अजीब है और अब तक के किस्सों से हट कर है। मैं जहाँ से पढ़ कर लिख रहा हूँ वह असलियत भी थी और  फिक्शन भी है। दरअसल सारी बातें, एक-एक घटना सच्ची थी पर पात्र और वर्णन के तरीके लेखक ने बदल दिए। मैं यह भी बताना चाहूँगा कि ऐसे घटनाक्रम हम लोग जीवन में अलग-अलग सुनते रहते हैं पर जिस किस्म की घटनाओं की और घटनाओं के अंजाम देने के जिन तरीकों की चर्चा पढ़ी तो सही कहा जाए तो रूह तक काँप गयी। भारत में 18वीं, 19वीं शताब्दी में ठगों का बहुत आतंक था। जब भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के शासक भिन्न-भिन्न हुआ करते थे तब पूरे भारत में ठगों का एक अलग नेटवर्क था। ये बेरहम ठग दरअसल में जिनको लूटते उनकी जान भी अवश्य ही लेते थे। संक्षेप में बात ये है कि सन 1812 में ठगों ने एक अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट मौंसेल की हत्या कर दी जिसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज अफसरों का ध्यान इस ओर ज्यादा गया और फिर कर्नल स्लीमैन जो नर्मदा नदी की सीमा वाले प्रांतों के पोलिटिकल एजेंट थे उन्होंने ठग उन्मूलन के बहुत प्रयास किये। कुख्यात ठग फिरंगिया को भी उन्होंने ही पकड़ा था। उन्हों...

इलाहाबाद विश्वविद्यालय और हमारा परिवार

आज 23 सितम्बर 2025 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के स्थापना दिवस पर इस पावन संस्था से जुड़े रहे और जुड़े हुए सभी लोगों को बहुत बहुत बधाई। आज फिर से मैं ये पोस्ट इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि शिक्षा के इस पावन संस्थान से मेरा और मेरे परिवार का आरंभ से ही संपर्क रहा है। हमारे परिवार का संपर्क इस विश्वविद्यालय से बहुत पुराना यानी कि कई पीढ़ियों पुराना है।मेरे बाबा के चाचा  दीवान बहादुर स्व0 जानकी प्रसाद जी चतुर्वेदी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से B.A. द्वितीय श्रेणी सन 1893 में M.A (English) प्रथम श्रेणी में और दूसरी पोजीशन के साथ सन 1895 में और फिर LLB भी प्रथम श्रेणी में सन 1896 में पास किया था।उस जमाने में एंट्रेंस और इंटर की परीक्षाएं भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय कराता था और स्व0 जानकी प्रसाद जी ने आगरा कालेज,आगरा से इलाहाबाद विश्वविद्यालय की ये परीक्षा पास की थीं अर्थात सन 1889 से हमारे परिवार का इस गौरवशाली विद्या के मंदिर से लगातार संपर्क बना रहा और ये हम लोगों के लिए बड़े गौरव और गर्व की बात है। उनके बाद मेरे पितामह स्व0 सुशील चंद्र जी चतुर्वेदी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से B.Sc. और LLB किया।उ...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-37 आज का किस्सा अकबर पर हमले का और अकबर की पालतू कुतिया महुवा का

इतिहास और संस्कृति के किस्से-37 आज का किस्सा अकबर पर हमले का और अकबर की पालतू कुतिया महुवा का किस्सा कुछ ऐसा है कि सन 1564 में जब अकबर की उम्र करीब 21-22 वर्ष रही होगी तब अकबर दिल्ली में खैर उल मनाज़िल नामक इमारत के पास से घोड़े पर बैठा हुआ गुजर रहा था। यह इमारत माहम अनगा की बनवाई हुयी थी। तभी अचानक अकबर को लगा कि  कोई पत्थर आकर उसके कंधे में लगा लेकिन दरअसल वह पत्थर नहीं एक तीर था। इस तीर से अकबर पर एक जानलेवा हमला किया गया था। ये तो अकबर की किस्मत थी कि तीर ने चोट तो पहुँचायी लेकिन अकबर की जान बच गयी। सत्ता की चकाचौंध बहुत आकर्षक तो होती है पर जो सत्ता के शीर्ष पर बैठे होते हैं उनका जीवन सुरक्षित और निष्कंटक शायद ही किसी युग में रहा हो। अकबर की हिम्मत और बहादुरी के विषय में क्या कहा जाए  कि तीर लगने पर वह बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ और घोड़े पर बैठे हुए ही वह महल वापिस आ गया। बादशाह जब महल लौटे तो हकीम बुलाए गए। हकीम ‘आइन-उल-मुल्क’ और ख्वाजा खान ने मिलकर घाव का इलाज किया। अबुल फजल के अकबरनामा में यही वह घटना है जहाँ गुलबदन बेगम के पति का नाम आखिरी बार आया है। तो इलाज के दौरान इन...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-36 आज किस्सा है मुग़ल साम्राज्य की एक ऐसी शाहजादी का जो अपने बाप से चिढ़ती थी और बड़े भाई से भी

इतिहास और संस्कृति के किस्से-36 आज किस्सा है मुग़ल साम्राज्य की एक ऐसी शाहजादी का जो अपने बाप से चिढ़ती थी और बड़े भाई से भी जिसने एक भाई का खुल कर साथ दिया तो दूसरे का सर भी कटवा दिया जिसकी निर्दयता की शायद ही कोई दूसरी मिसाल मिले आज बात शाहजहाँ की छोटी बेटी रोशनआरा बेगम की रोशनआरा बेगम जो शाहजहाँ और उसकी पत्नी बेगम मुमताज महल की छोटी बेटी थी देखने में अपनी बड़ी बहन जहाँआरा बेगम जैसी न तो खूबसूरत थी और ना ही उतनी बुद्धिमान लेकिन हाँ कुटिल बहुत थी। फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने लिखा है कि रोशनआरा बेगम भी मौजमस्ती में जीनेवाली और एक विलासिनी महिला थी। वह अपनी बड़ी बहन जहाँआरा बेगम और भाई दारा से खुलेआम ईर्ष्या रखती थी और औरंगज़ेब की पक्षधर थी। जब औरंगज़ेब राजधानी से दूर दक्कन में था तो आगरा की सारी सूचनाएं वही अपने जासूसों द्वारा औरंगज़ेब को पहुँचवाती थी। मुग़ल राजकुमारियों की शादी अमूमन नहीं की जाती थी तो उनके ऐसे-वैसे किस्से लोगों के बीच चलते रहते थे और पश्चिम से आये यात्रियों को इस किस्म की बातों में बहुत रुचि रहती थी। बर्नियर ने लिखा है कि उसको एक पुर्तगाली बुढ़िया ने, जो राजमहल में बांदियों की...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-35 औरंगज़ेब, इश्क़, शराब और संगीत

इतिहास और संस्कृति के किस्से-35  औरंगज़ेब, इश्क़, शराब और संगीत क्या आपको पता है कि जिस औरंगज़ेब को हम कट्टर, धार्मिक असहिष्णु और कठोर राजा के रूप में जानते हैं कभी उसका दिल भी किसी के लिए धड़का था! कभी औरंगज़ेब ने इश्क भी फरमाया था और इश्क़ में शराब का शौक भी फरमाया था। संगीत विरोधी औरंगज़ेब के दिल के तार बज उठे थे एक नर्तकी के लिए। एक समय ऐसा भी था जब औरंगज़ेब ने अपना नमाज पढ़ने का नियम भी बिसरा दिया था। हम प्रायः औरंगज़ेब को केवल उसकी कठोरता और धार्मिक कट्टरता से जोड़कर देखते हैं। लेकिन समकालीन इतिहासकारों और यात्रियों ने उसकी ज़िन्दगी का एक और पहलू भी लिखा है—एक ऐसा प्रसंग, जिसने उसके व्यक्तित्व को हमेशा के लिए बदल दिया। दरअसल औरंगज़ेब के हरम में एक नर्तकी थी जिसका नाम हीराबाई या ज़ैनबादी महल बताया गया है। मनूची ने अपनी पुस्तक में जब शाहजहाँ के पुत्रों का वर्णन किया है तो उसके तीसरे पुत्र औरंगज़ेब के विषय में भी लिखा है। वह लिखता है कि औरंगज़ेब का व्यक्तित्व थोड़ा निराशावादी किस्म का दिखता था। वह सदैव अपनेआप को किसी न किसी चीज में व्यस्त दिखाता था।  मनूची ने औरंगज़ेब के विषय में कई रोच...