इतिहास और संस्कृति के किस्से-39 आज किस्सा मुग़ल बादशाहों के शुरुआती समय की कुछ बातें, कुछ किस्से शिष्टाचार के मसलों के
इतिहास और संस्कृति के किस्से-39
आज किस्सा मुग़ल बादशाहों के शुरुआती समय की कुछ बातें, कुछ किस्से शिष्टाचार के मसलों के
समरकंद में एक महल हुआ करता था जिसका नाम गोकसराय था और इसको खुद तैमूर ने बनवाया था। बाबर ने बाबरनामा में लिखा है कि इस महल की एक अजब खसियत थी। बाबर लिखता है कि तैमूर के वंश का जो भी शहजादा उभरकर गद्दी लेता था वह उसी महल में आकर गद्दी पर बैठता था और सुल्तान बनने की कोशिश में जो शहजादा नाकाम होकर मौत की सजा पाता था उसको भी यहीं लाकर मारा जाता था। इशारे में कहा जाता था कि ‘फलाने शाहजादे’ को गोकसराय ले गए।
बाबर ने अपने बाबरनामा में 932 हिजरी के किस्सों के दौरान लिखा है कि जब वह सिंध से आगे बढ़ा तो उसने 'अर्रा बर्फ' यहीं देखी। अर्रा बर्फ का अर्थ है कि ऐसी बर्फ जिसने धरती को ऐसा ढक लिया हो कि बर्फ के सिवा कहीं कुछ न दिखाई पड़े। बाबर ने आगे लिखा है कि उसने हिंदुस्तान में 'गाला'(?) और 'चतियाल बर्फ' (?) भी देखी। इसमें ताज्जुब की बात यह है कि बाबर के इस लिखने पर हुमायूँ ने टिप्पणी की है कि, “आदरणीय वालिद साहब (बाबर) ठीक ही लिखते हैं कि (ये वाली बर्फ) हमने तब तक (भारत में) नहीं देखी थी। पर बाद में हम जान गए कि ज्यादा अधिक पड़ने पर बर्फ यहाँ (हिंदुस्तान में) भी जम जाती है। मेरी (हुमायूँ की) गुजरात विजय के साल (1535 ई0) में धौलपुर और ग्वालियर के बीच हाथ भर से भी अधिक मोटी बर्फ जम गयी थी।” धौलपुर और ग्वालियर में हाथ भर की बर्फ जम जाए यह आज सोच भी नहीं सकते।
जब मुग़ल सल्तनत हिंदुस्तान में अपने पैर जमा रही थी तो उसके साथ ही साथ धीरे-धीरे राज्य और दरबार के नियम भी अपना रूप ले रहे थे। उनके शिष्टाचार के नियम (प्रोटोकॉल) भी कड़ा रूप ले रहे थे। बादशाह की उम्र छोटी होने से कोई हमेशा दरबार के प्रोटोकॉल को नकार नहीं सकता था और यदि वह राजपरिवार का जुड़ाव नहीं रखता था तब तो ऐसा कतई सम्भव नहीं था। सन 1526 की बात है। एक बूढ़ा अफ़ग़ान व्यक्ति था, जिसका नाम गाज़ी खान था और जिसे किसी एक समय पर बाबर ने ‘बाबा’ कह कर सम्बोधित किया था। उसने बाबर के आगे झुकने में अवज्ञा सी करते हुए अनिच्छा जताई जबकि बाबर अब हिंदुस्तान का बादशाह बन चुका था तो ये होने देना भी सम्भव नहीं था तो हुआ ऐसा कि जब वह बाबर की ओर बढ़ा तो बाबर ने अपने मातहतों को इशारा किया जिन्होंने उस कालीन को जिस पर वह चल रहा था अथवा गाज़ी खान के पैरों को ही खींच दिया जिससे वह बादशाह बाबर के आगे घुटनों के बल हुआ।
दरअसल प्रोटोकॉल का यह मामला इतना महत्वपूर्ण था कि जब हुमायूँ ईरान के बादशाह के यहाँ निर्वासन में था तो एक बार वे लोग कहीं मनोरंजन को गए। इस विषय में तज़किरातुल वाक़ियात के लेखक जौहर आफ़ताबची ने लिखा है कि वहाँ से चलते समय हुमायूँ बादशाह ईरान के शाह से मिलने गया। वहाँ देखा कि जिस कालीन पर ईरान के शाह बैठे थे उसको तीन तहों में करकर इतना छोटा कर दिया गया था कि उस पर हुमायूँ के बैठने के लिए कोई जगह बचे ही नहीं। ऐसा इसलिए किया गया कि हुमायूँ को यह अवश्य ध्यान रहे कि वह परदेसी है और ईरान के बादशाह से मदद मांगने आया हुआ है।
जिस बर्तन में बादशाह अपने हाथ धोता था उसी बर्तन में हाथ धोने की आज्ञा मिल जाना बादशाह के भाइयों तक के लिए एक बहुत बड़ी और अद्भुत घटना थी। एक बार की बात है कि हुमायूँ रात्रिभोज पर अपने भाइयों कामरान, अस्करी और हिन्दाल के साथ था और साथ उनके साथ उनके चाचा मुर्ज़ा सुलेमान भी थे। हाथ धोने का पात्र पहले बादशाह हुमायूँ के पास लाया गया और उसके बाद कामरान के पास। इसके बाद अपने चाचा की उम्र का लिहाज करते हुए दोनों छोटे भाइयों ने उसको अपने चाचा के पास ले जाने का इशारा किया उसके बाद उन्होंने अपने हाथ धोए। इसी बीच सुलेमान मिर्ज़ा ने बहुत गंवारू और भद्दे तरीके से अपनी नाक छिनकी और सिड़की। अस्करी और हिन्दाल यह देखते ही बहुत अधिक गुस्सा होते हुए अपने आपे से बाहर हो गए और बोले, “यह क्या गँवारूपन है?” वह बोले, “पहली बात तो शहंशाह के सामने अपने हाथ धोने का हमको कोई अधिकार ही नहीं है लेकिन अपनी उदारता के कारण बादशाह ने इसकी इजाजत दे दी लेकिन यह कौन सा शिष्टाचार है जो आप अपनी नाक से कर रहे हैं।”
आज की पोस्ट में इतना ही
ऐसे अनेकों किस्से हैं जो आगे की पोस्टों में आपके सामने प्रस्तुत करेंगे।
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