इतिहास और संस्कृति के किस्से – 40 मुग़ल बादशाहों के रक्त निकालने सम्बन्धी अनुष्ठान, नाड़ी और डॉक्टर
इतिहास और संस्कृति के किस्से – 40
मुग़ल बादशाहों के रक्त निकालने सम्बन्धी अनुष्ठान, नाड़ी और डॉक्टर
मुग़ल दरबार के वैभव में केवल सत्ता और साज़िशें ही नहीं थीं, बल्कि कई ऐसे अनूठे रिवाज़ भी थे जो आज सुनकर अचरज में डाल देते हैं।
निकोलाओ मनूची – वह इतालवी यात्री और डॉक्टर (या वैद्य) जिसने शाहजहाँ और औरंगज़ेब के समय में भारत में जीवन बिताया – क़अपनी पुस्तक स्टोरिया दो मोगोर (Storia do Mogor) में कुछ ऐसे ही विचित्र प्रसंग दर्ज करता है। आज मैं जिक्र करने जा रहा हूँ ऐसी तीन घटनाओं का जो उस समय के चिकित्सा, परंपरा और अंधविश्वास के अनोखे मेल को दर्शाती हैं।
1-शहज़ादा शाह आलम का रक्त निकालना
मुग़ल राजाओं में साल में कम से कम एक बार शरीर से कुछ रक्त निकालने की परंपरा सी दिखाई देती है। उनका मानना था कि इस प्रकार शरीर का अशुद्ध रक्त निकल जाता है और उसके स्थान पर शुद्ध रक्त बनता है और हाँ यह रक्त कोई साधारण रक्त नहीं था। ये तो शाही रक्त था तो ये ऐसे ही फेंक नहीं दिया जाता था।
मनूची लिखता है कि उसे एक बार शहज़ादा शाह आलम (जो आगे चलकर बहादुर शाह प्रथम बने) का इलाज़ करने बुलाया गया। उसे आदेश दिया गया कि शहज़ादे की नस से रक्त निकाला जाए। आज के ज़माने में यह केवल चिकित्सकीय उपचार लगता है, लेकिन उस दौर में यह एक शाही रस्म थी। इसके लिए बाकायदा हाथ की नस में एक चीरा लगा कर उस विशिष्ट व्यक्ति के शरीर से एक तय मात्रा में खून निकाला जाता था।
मनूची ने जब रक्त निकाला, तो उसे इसके बदले चार सौ रुपये, एक सरोपा और एक घोड़ा इनाम में मिला। इतना ही नहीं, उसे यह भी हुक्म था कि वह सम्राट को बाक़ायदा बताए कि कितनी मात्रा में रक्त निकला। हर बूंद का हिसाब रखना जैसे सत्ता का प्रतीक था। बाद में यही प्रक्रिया शहज़ादे के पुत्रों पर भी लागू हुई और हर बार मनुच्ची को दो सौ रुपये, एक सरोपा और एक घोड़ा उपहार में मिलता।
लेकिन असली दिलचस्प पहलू था रक्त का निस्तारण। शाही सेवक चीनी मिट्टी का बर्तन लेकर खड़े रहते। उसमें रक्त इकट्ठा किया जाता और फिर उसे घर ले जाकर ज़मीन में गाड़ दिया जाता। वजह थी डर—कि कहीं यह रक्त किसी के हाथ न लग जाए और उसका दुरुपयोग जादू-टोने में न हो। इस तरह शाही रक्त का भी एक तरह से “संस्कार” होता था।
2-धागे से नाड़ी देखना
मनूची एक और परंपरा का ज़िक्र करता है। दरबार में स्त्रियों का हाथ सीधे पकड़ना शिष्टाचार के विरुद्ध था। पर्दे की परंपरा इतनी कड़ी थी कि वैद्य भी राजकुमारी या बेग़म का हाथ नहीं पकड़ सकते थे और तकलीफ होती थी तो उसकी जाँच और इलाज भी होना ही था।
तब उपाय निकाला गया— धागे से नाड़ी देखना। राजकुमारी या राजपरिवार की जो भी महिला अस्वस्थ हो उसकी कलाई पर रेशमी धागा बाँधा जाता और उसका सिरा बाहर निकालकर वैद्य को दिया जाता। मनूची भी इसी प्रकार से उस बाहर लटकते धागे को पकड़कर उसके कंपन से नाड़ी का अनुमान लगाता और कमाल की बात ये है कि इस तरीके से वैद्य जाँच और सफल इलाज कर भी लेते थे। यह दृश्य जितना अजीब लगता है, उतना ही गम्भीर भी था—क्योंकि इसमें विज्ञान और सामाजिक मर्यादा का संगम था।
3-मानसिक रोग का इलाज़
मनूची ने अपने संस्मरणों में एक शाही महिला के मानसिक रोग का भी वर्णन भी किया है। वह अचानक हँस पड़ती, रोने लगती या गुस्से में चिल्लाने लगती। दरबार में लोग इसे “जिन्न का असर” मानते थे। कोई इसे पागलपन कहता, तो कोई झाड़-फूँक की सलाह देता।
लेकिन मनूची ने इसे बीमारी माना। उसने यूरोपीय औषधियाँ दीं और कहा कि महिला को शांत वातावरण और कोमल देखभाल दी जाए। यह बात दरबार के लिए नई थी, क्योंकि उस समय मानसिक रोग को प्रेत-आत्मा से जोड़ना आम बात थी।इन तीनों घटनाओं से हमें मुग़ल दरबार का एक अलग ही रूप दिखाई देता है।
आज हम विज्ञान और तर्क के युग में हैं। रक्तदान जीवन बचाने का पुण्य कार्य है, नाड़ी सीधे पकड़कर देखी जाती है और मानसिक रोगों का आधुनिक इलाज़ उपलब्ध है। लेकिन इतिहास हमें याद दिलाता है कि इंसान का व्यवहार, उसकी धारणाएँ और उसके डर हमेशा समय और सत्ता से प्रभावित रहे हैं लेकिन साथ ही साथ हर युग में व्यक्ति अपनी समझ के अनुसार शरीर और मानसिक सभी किस्म की समस्याओं की गम्भीरता को समझते हुए और उनसे जूझते हुए उनको जीतने को प्रयासरत रहा है।
आज की पोस्ट में इतना ही
अगली पोस्ट में मिलेंगे किसी नए किस्से के साथ
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