इतिहास और संस्कृति के किस्से-38 ठग
इतिहास और संस्कृति के किस्से-38
ठग
आज का किस्सा बड़ा अजीब है और अब तक के किस्सों से हट कर है। मैं जहाँ से पढ़ कर लिख रहा हूँ वह असलियत भी थी और फिक्शन भी है। दरअसल सारी बातें, एक-एक घटना सच्ची थी पर पात्र और वर्णन के तरीके लेखक ने बदल दिए।
मैं यह भी बताना चाहूँगा कि ऐसे घटनाक्रम हम लोग जीवन में अलग-अलग सुनते रहते हैं पर जिस किस्म की घटनाओं की और घटनाओं के अंजाम देने के जिन तरीकों की चर्चा पढ़ी तो सही कहा जाए तो रूह तक काँप गयी।
भारत में 18वीं, 19वीं शताब्दी में ठगों का बहुत आतंक था। जब भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के शासक भिन्न-भिन्न हुआ करते थे तब पूरे भारत में ठगों का एक अलग नेटवर्क था। ये बेरहम ठग दरअसल में जिनको लूटते उनकी जान भी अवश्य ही लेते थे।
संक्षेप में बात ये है कि सन 1812 में ठगों ने एक अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट मौंसेल की हत्या कर दी जिसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज अफसरों का ध्यान इस ओर ज्यादा गया और फिर कर्नल स्लीमैन जो नर्मदा नदी की सीमा वाले प्रांतों के पोलिटिकल एजेंट थे उन्होंने ठग उन्मूलन के बहुत प्रयास किये। कुख्यात ठग फिरंगिया को भी उन्होंने ही पकड़ा था। उन्होंने इस विषय में बहुत विवरण लिखा है और फिर अमीर अली ठग की जीवनी या प्रश्न उत्तर के माध्यम से उसकी आत्मकथा जैसी कन्फेशन ऑफ अ ठग (एक ठग की दास्तान) फिलिप मिडोज़ टेलर ने लिखी जो उपन्यास की शैली में एक अद्भुत कृति है। यह किताब सन 1830 के दशक में लिखी गयी है और ठग अमीर अली से लेखक की जेल में हुयी बातचीत पर आधारित है। हाँलाँकि टेलर की किताब के अमीर अली में अमीर अली, फिरंगिया, अमन सूबेदार आदि अनेक ठगों की झलक है। अमीर अली कोई बहुत बड़ा ठग नहीं था, उसने सिर्फ 719 लोगों को गला घोंट कर मार दिया फिर भी उसका दिल नहीं भरा था और कम से कम 1000 की गिनती की तो उसकी इच्छा थी।
मुझको याद आ रहा है कि अपने बचपन में हमने अपने बाबा, पापा आदि लोगों से सुना है कि 100-150 साल पहले के जमाने में कलकत्ता, मध्य प्रदेश आदि इलाकों में ‘गला घोंट’ कम्पनियाँ हुआ करती थीं जिनके सदस्य वैसे अपने घरों में सामान्य रूप से रहते थे और बीच-बीच में गायब हो जाते थे या कहिए अपने काम पर (?!!) चले जाते थे। इन लोगों के विषय में लोग दबी जुबान से बात करते थे और अमूमन उनसे कन्नी काटते थे पर जिनके विषय में पता ही नहीं होता था वे तो बिल्कुल सामान्य जीवन जीते ही थे।
अब बात ठगों के क्रिया कलाप की।
उन रास्तों पर मौत का जो सन्नाटा बैठता था — वह किसी कहानी जैसा नहीं था, बल्कि संगठित, सुनियोजित और बोलती हुई दुनिया थी। Confessions of a Thug और तत्कालीन रिपोर्ट्स पढ़िए — ठग उस तरह के राक्षस थे जिनका पेशा ही लूट और क़त्ल था।
वे अपने आप में एक भाषा रखते थे — नाम, कूटशब्द और पद-संरचना ताकि उनकी बर्बर योजना कभी उजागर न हो। आज मैं उन्हीं शब्दों को वही अर्थ देकर लिख रहा हूँ ताकि आप को भी उन रातों की सिहरन कैसी होती थी इसका अहसास हो:
लुधाइ / लुढ़ाई - कब्र खोदने वाले
भुट्टोरे या भुटियारे — (अर्थ: गला घोंटने वाले कातिल; वे चुपके से हाथ में रूमाल लेकर वार करते थे)।
भिल्ल — (अर्थ: कब्र; जहाँ लाशें दफ़न कर दी जाती थीं)।
भिल्ल मंझे? — ( गड्ढा खुद गया/गड्ढा या कब्र तैयार है?)
मंझे- तैयार है।
जमादार या जेमादार (jemadar) — गिरोह का नेता/निर्देशक
ऐसे अनेक शब्दों की पूरी भाषा थी।
ठगों की सफलता का मूल था प्रणाली — दोस्ती बनाओ, मुसाफ़िरों का विश्वास जीत लो, तब रात के सन्नाटे में भुटियारे का काम पूरा। और अगर छोटी-सी आवाज़ भी उठती, तो वही जमादार आदेश दे देता: “दबाओ” — और फिर सन्नाटा। यह विधि इतनी विशिष्ट थी कि गवाह कम से कम रहते और इतिहास के पन्ने पर केवल गिनती बची: कुछ, अमीर अली, फिरंगिया जैसे नाम केवल, सर्द आँकड़े नहीं — इनके पीछे सैकड़ों किन्तु-सन्नाटों वाली कहानियाँ थीं।
सोचिए: एक गाँव के पास बाहर की तरफ कुछ शानदार, ख़ूबसूरत बाग-बगीचे हैं उनमें बहुत सारे मुसाफिर ठहरे हुए हैं जिनमें कुछ बहुत रईस हैं बाकी के व्यापारी और उनके सुरक्षा कर्मचारी जो दरअसल ठगों का गिरोह है और फिर वह अपना शिकार टारगेट करते हैं। उसको अपनी सुरक्षा में यात्रा में चलने का न्यौता/मौका देते हैं और फिर बस ‘भिल्ल मंझे’ यानी कब्र तैयार थी।
मारने का सबसे बड़ा हथियार एक रुमाल होता था जिसके एक कोने में चांदी का सिक्का या चांदी का टुकड़ा बंधा होता था। इसका वार खाली नहीं जाता था। अब कल्पना कीजिए — एक शांत रात; यात्रा के थके हुए मुसाफिरों ने आग के चारों ओर कुछ गप्प शप्प चल रही है, कुछ हुक्के के कश, नींद की झपकियां… और एक आवाज आई “तम्बाकू लाओ” या “जय काली” और फिर शिकार के पीछे तैयार बैठे भुटियारे के रूमाल की जकड़ शिकार की गर्दन पर। भुट्टोरे की सुनामी इतनी ताज़ा और अचानक कि कोई सिसक भी न सके। बूँद-बूँद खून सीप-सीप कर उस मिट्टी की कब्र में मिलाया जाता है जिसे वे “भिल्ल” कहते थे। कुछ लुधाई चुपचाप मिट्टी खसकाते हैं — हाथों में लाशें और फिर मिट्टी — और सब कुछ ऐसा दबा दिया जाता है कि सालों बाद भी कोई निशान न मिले। और हाँ दबाने के पहले सभी लाशों का पेट फाड़ दिया जाता था जिससे शरीर के फूल जाने पर कब्र दिखने न लगे।
जब ठग पकड़े जाने लगे तो उनकी निशानदेही पर इन बाग-बगीचों और अन्य स्थानों से हजारों की संख्या में शव निकले थे। यह organized crime का एक ऐसा मसला था जिसमें वीभत्सता, घृणा, जुगुप्सा, भय सभी का समावेश था।
यह ठग लोग शगुन का बहुत विचार करते थे। उल्लू का बोलना, गधे का रेंकना सब जबरदस्त अच्छे शगुन थे इनके लिए। ठगों के गिरोह मानते थे कि वह सारा काम ईश्वरीय आदेश से कर रहे हैं और उसमें हिन्दू,मुस्लिम सब होते थे और काम के पहले ठगों का लीडर देवी की स्तुति करता था चाहे वह होता मुसलमान था।
इन ठगों में से बहुत से लोग अपने इलाकों में बहुत प्रतिष्ठित और सम्मानित व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे तथा उनके असली कार्य के विषय में उनके इलाके के लोगों और कई बार खुद उनके परिजनों को भी कोई खबर नहीं होती थी लेकिन कुछ मामले ऐसे भी थे कि अनेक खानदानी जमीन्दार तथा ग्राम प्रधान (पटेल) पीढ़ियों से ठगों के साथ सम्बन्ध बनाये हुए थे और उनके इन आपराधिक कारनामों से आँखें मूँदे रह कर एक तरह से उन्हें हत्या करने की सहूलियतें प्रदान करते थे, उनको शरण भी देते थे जिसके बदले उनको लूट के माल में कुछ हिस्सा मिल जाता था और कई बार उनके घरों पर कर लगा दिया जाता था जिसे ठग प्रसन्नता से भरते थे।
एक बात और कई बड़े राजे-महाराजे भी अपने राज्यों में इन ठगों को संरक्षण देते थे और पीढ़ियों से ये ठग अपने संरक्षण के बदले पीढ़ी दर पीढ़ी बड़ी रकमें अपने इन राजसी संरक्षकों को देते थे।
इस घटनाक्रम का एक पहलू यह भी था कि इन ठगों की आड़ में अंग्रेज सरकार ने अपने बहुत से शत्रुओं को ठिकाने लगाया था यानी जो ठग नहीं थे लेकिन उनको भी ठग कह कर अंग्रेजों ने जेल भेज दिया या फांसी पर चढ़ा दिया था।
इतिहास की किताबों में यह लिखित है कि कैसे सख्त अभियान चलाकर कुछ गिरोहों को पकड़ा गया; पर उन अनगिनत आत्माओं की चीखें जिनको लुधाइ ने भिल्ल में मौन कर दिया था — वे आज भी हवा में गूंजती हैं।
यह पोस्ट भय का नहीं, सच की याद दिलाने का प्रयत्न है — ताकि इतिहास की इन अँधेरी परछाइयों से सीख लें कि कैसे मानव की शक्ल में राक्षस छुप सकते हैं: मुस्कान में, साथी के रूप में, और अंततः रूमाल के एक घूँट में। ठगों की दुनिया के बहुत से किस्से हैं जो फिर किसी दिन बताऊँगा।
आज की पोस्ट में बस इतना ही
अगली पोस्ट में मुलाकात होगी एक और किस्से के साथ
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