इतिहास और संस्कृति के किस्से-36 आज किस्सा है मुग़ल साम्राज्य की एक ऐसी शाहजादी का जो अपने बाप से चिढ़ती थी और बड़े भाई से भी
इतिहास और संस्कृति के किस्से-36
आज किस्सा है मुग़ल साम्राज्य की एक ऐसी शाहजादी का जो अपने बाप से चिढ़ती थी और बड़े भाई से भी
जिसने एक भाई का खुल कर साथ दिया तो दूसरे का सर भी कटवा दिया
जिसकी निर्दयता की शायद ही कोई दूसरी मिसाल मिले
आज बात शाहजहाँ की छोटी बेटी रोशनआरा बेगम की
रोशनआरा बेगम जो शाहजहाँ और उसकी पत्नी बेगम मुमताज महल की छोटी बेटी थी देखने में अपनी बड़ी बहन जहाँआरा बेगम जैसी न तो खूबसूरत थी और ना ही उतनी बुद्धिमान लेकिन हाँ कुटिल बहुत थी।
फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने लिखा है कि रोशनआरा बेगम भी मौजमस्ती में जीनेवाली और एक विलासिनी महिला थी। वह अपनी बड़ी बहन जहाँआरा बेगम और भाई दारा से खुलेआम ईर्ष्या रखती थी और औरंगज़ेब की पक्षधर थी। जब औरंगज़ेब राजधानी से दूर दक्कन में था तो आगरा की सारी सूचनाएं वही अपने जासूसों द्वारा औरंगज़ेब को पहुँचवाती थी।
मुग़ल राजकुमारियों की शादी अमूमन नहीं की जाती थी तो उनके ऐसे-वैसे किस्से लोगों के बीच चलते रहते थे और पश्चिम से आये यात्रियों को इस किस्म की बातों में बहुत रुचि रहती थी।
बर्नियर ने लिखा है कि उसको एक पुर्तगाली बुढ़िया ने, जो राजमहल में बांदियों की तरह रहती थी, रोशनआरा सम्बन्धी एक वृतांत बताया था। बुढ़िया ने बताया कि रोशनआरा बेगम ने पहले तो एक युवा पुरुष को कई दिन तक अपने पास छिपाए रखा और दोनों आनन्द उठाते रहे और फिर एक दिन उसको रात के अंधेरे में महल के बाहर निकाल देने के लिए अपनी बांदियों के सुपुर्द कर दिया। वह औरतें पकड़े जाने के डर से इस काम को नहीं कर सकीं और इस व्यक्ति को छोड़ कर भाग गयीं। यह व्यक्ति महल के बागों में डरा, घबराया और परेशान सा घूमता हुआ पकड़ा गया। महल के सुरक्षा कर्मचारी उसको बादशाह यानी औरंगज़ेब के पास ले गए। वहाँ बहुत पूछने और धमकाने पर भी उसने कुछ कबूला नहीं बस इतना कहा कि मैं दीवार फांद कर आया हूँ। इस पर औरंगज़ेब ने आज्ञा दी कि ये जैसे आया था वैसे ही यानी इसको दीवार से ही वापिस भेज दिया जाए। बर्नियर लिखता है कि ख्वाजासराओं ने उसको दीवार से गिरा दिया।
एक ऐसे ही किस्से का जिक्र बर्नियर ने और किया है उस मामले में भी औरंगज़ेब ने उस व्यक्ति को फाटक से आया बताने पर फाटक से बाहर छुड़वा दिया था। हाँ, बादशाह ने ख्वाजासराओं को अवश्य दंडित किया क्योंकि उनकी चौकसी हल्की थी। बर्नियर ने यह भी लिखा है कि इन मामलों से औरंगज़ेब रोशनआरा बेगम से रूष्ट हो गया किंतु चूँकि बादशाह के लिए मामला केवल संदेह का था इसलिए जल्द ही भाई बहन के सम्बंध फिर सामान्य हो गए। हाँ, इन प्रेमियों के साथ औरंगज़ेब ने वह व्यवहार नहीं किया था जो शाहजहाँ ने किया था। हाँलाँकि एक और जगह पर औरंगज़ेब द्वारा ऐसे पकड़े गए व्यक्ति को हाथी से कुचलवा देने का भी जिक्र है।
बर्नियर ने लिखा है कि जब शाहजहाँ ने अशर्फियों से लदे हाथी दारा शिकोह की मदद के लिए भेजे थे जब उसने देहली की ओर बढ़ना शुरू किया था तो इसकी खबर भी औरंगज़ेब को रोशनआरा बेगम ने ही भेजी थी।
जब शाहजहाँ ने औरंगज़ेब से किले में आकर मिलने को कहा था तो रोशनआरा बेगम ने ही उसको सावधान किया था कि यदि तुम किले में आये तो शाहजहाँ की सुरक्षा में लगी तातारी बांदियाँ जो बहुत शक्तिशाली हैं वह तुम पर आक्रमण करेंगी।
ये भी चर्चा थी कि शाहजहाँ के द्वारा दारा को लिखे कुछ पत्र भी औरंगज़ेब के हाथ लगे थे।
मनूची ने रोशनआरा बेगम के विषय में लिखा है कि मुग़ल दरबार में औरंगज़ेब की राजनीति की सबसे भरोसेमंद साथी उसकी अपनी बहन रोशनआरा बेग़म थी। वह देखने में बहुत सुंदर नहीं थी, पर बेहद चतुर और छल-छुपाव में निपुण थी। हाज़िरजवाब, हँसमुख, मज़ाक और मनोरंजन में अपनी बहन बेग़म साहिबा (जहाँआरा) से भी आगे थी। फिर भी उसका दर्ज़ा अपनी बड़ी बहन जैसा नहीं था।
वह बहुत कट्टर नहीं थी और जब कहीं से शराब मिल जाती तो पी लेती थी लेकिन उसे अपनी बहन जैसी स्वतंत्रता या पिता शाहजहाँ का वैसा विश्वास हासिल नहीं था। न ही वह वैसी ताक़त रखती थी, क्योंकि वह अपने पिता के हरम की परिधि के भीतर ही रहती थी।
छिपाने की अपनी कला के बावजूद, यह सबके सामने स्पष्ट था कि वह दारा शिकोह और बेग़म साहिबा की घोषित दुश्मन थी।
और चूँकि वह महल के भीतर रहती थी, उसे महत्वपूर्ण मामलों की जानकारी आसानी से मिल जाती थी। इन तमाम ख़बरों को वह गुप्त रूप से अपने भाई औरंगज़ेब तक पहुँचाती थी, और औरंगज़ेब उसी आधार पर अपने सियासी कदम उठाता था।
टैवर्नियर ने लिखा है कि औरंगज़ेब का बादशाह बनने के बाद रोशनआरा बेगम को बड़ी बहन जहाँआरा बेगम ‘पादशाह बेगम’ के स्थान पर मुख्य सम्मान का स्थान ‘चा बेगम’ बनाने का था जो कुछ दिन को उसने निभाया भी।
जब दारा को जिंदा रखा जाए या मार दिया जाए विषय पर औरंगज़ेब अपने सलाहकारों से चर्चा कर रहा था तो दारा को मौत की सजा दी जाए इसकी सबसे बड़ी वकालत रोशनआरा बेगम ने ही की थी क्योंकि वह भले ही उनकी बहन थी लेकिन जहाँआरा बेगम और दारा की वह घोषित और कट्टर शत्रु भी थी।
रोशनआरा बेगम कितनी निर्दयी थी इसका भी उदाहरण मनूची ने लिखा है। दारा शिकोह की हत्या और नादिरा बानो बेग़म (दारा शिकोह की पत्नी) की जहर खाकर आत्महत्या के बाद उनकी बेटी और बेटे शाहजादे सिपहर शिकोह को रोशनआरा बेग़म उस स्थान पर ले गयी जहाँ दारा के सिंहासन पर औरंगज़ेब यानी उन के पिता का हत्यारा बैठा हुआ था। जो बच्चे कभी साम्राज्य के गौरव थे, वे अब ताज के सामने काँपते हुए खड़े थे — अपने पिता की हत्या देख चुके अनाथ।
अपने पिता का कटा सर देख कर राजकुमारी शोक और भय से काँपती हुई ज़मीन पर गिर पड़ी, अपना चेहरा घूँघट से ढँक लिया और फूट-फूटकर रोने लगी और सिपहर शिकोह अपनी बहन से लिपट गया।
औरंगज़ेब ने ठंडी नज़रों से यह सब देखा और आदेश दिया कि इन्हें ले जाओ।
इसके बाद राजकुमारी को रोशनआरा की निगरानी में भेज दिया गया और सिपहर को पहरे में रखा गया। शाहजादी को रोशनआरा के हरम में रखा गया पर वहाँ उसे राजकुमारी जैसा सम्मान नहीं मिला, बल्कि रोशनआरा ने उसके साथ दासी जैसा व्यवहार किया। उसको अच्छे कपड़े पहनने की मनाही थी और अच्छा भोजन नसीब नहीं था बल्कि खाने तक की दिक्कत हो जाती थी।
उसके लिए कोई सेविका नहीं थी। उसको अपने कमरे स्वयं झाड़ने होते थे और पानी भरकर लाने को मजबूर थी। दुर्व्यवहार का हाल यहाँ तक कि कई बार पीटा और गालियाँ भी दीं। मनुची लिखता है कि रोशनआरा इस यातना में आनंद लेती थी, क्योंकि उसे सुख मिलता था यह देखकर कि दारा की बेटी, जो कभी वैभव और ऐश्वर्य में पली थी, अब एक दासी के स्तर पर गिर गई है।
लेकिन जब यह बात दरबार और औरंगज़ेब तक पहुँची, तो उसने हस्तक्षेप किया। उसने अपनी बहन रोशनआरा को फटकारा और दारा की इस पुत्री को जहाँआरा बेग़म की निगरानी और संरक्षण में भेज दिया।
जहाँआरा अपनी उदारता और करुणा के लिए प्रसिद्ध थी। उसने दारा की बेटी को अपने पास रखकर उसकी स्थिति सुधारी और उसे सम्मान व सुरक्षा प्रदान की।
उपरोक्त घटनाएं बताती हैं कि स्त्री केवल ममता और करुणा का रूप ही नहीं अपितु मुग़ल इतिहास में ऐसी कठोर और निर्दयी स्त्री भी हुयी है जिसके किस्से सुनकर मन खराब हो जाता है।
इस प्रकार, रोशनआरा बेग़म केवल एक राजकुमारी भर नहीं रही। वह सत्ता-संघर्ष की सक्रिय खिलाड़ी, एक निर्दयी महिला और अपने पिता शाहजहाँ और बहन जहाँआरा की प्रतिद्वन्द्वी, और औरंगज़ेब की गुप्तचरी व राजनीतिक सलाहकार के रूप में इतिहास में दर्ज है।
आज की पोस्ट में इतना ही
अगली पोस्ट में मिलेंगे कुछ नए किस्सों के साथ
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