इतिहास और संस्कृति के किस्से-37 आज का किस्सा अकबर पर हमले का और अकबर की पालतू कुतिया महुवा का
इतिहास और संस्कृति के किस्से-37
आज का किस्सा अकबर पर हमले का और अकबर की पालतू कुतिया महुवा का
किस्सा कुछ ऐसा है कि सन 1564 में जब अकबर की उम्र करीब 21-22 वर्ष रही होगी तब अकबर दिल्ली में खैर उल मनाज़िल नामक इमारत के पास से घोड़े पर बैठा हुआ गुजर रहा था। यह इमारत माहम अनगा की बनवाई हुयी थी। तभी अचानक अकबर को लगा कि कोई पत्थर आकर उसके कंधे में लगा लेकिन दरअसल वह पत्थर नहीं एक तीर था। इस तीर से अकबर पर एक जानलेवा हमला किया गया था। ये तो अकबर की किस्मत थी कि तीर ने चोट तो पहुँचायी लेकिन अकबर की जान बच गयी। सत्ता की चकाचौंध बहुत आकर्षक तो होती है पर जो सत्ता के शीर्ष पर बैठे होते हैं उनका जीवन सुरक्षित और निष्कंटक शायद ही किसी युग में रहा हो।
अकबर की हिम्मत और बहादुरी के विषय में क्या कहा जाए कि तीर लगने पर वह बिल्कुल भी विचलित नहीं हुआ और घोड़े पर बैठे हुए ही वह महल वापिस आ गया। बादशाह जब महल लौटे तो हकीम बुलाए गए। हकीम ‘आइन-उल-मुल्क’ और ख्वाजा खान ने मिलकर घाव का इलाज किया। अबुल फजल के अकबरनामा में यही वह घटना है जहाँ गुलबदन बेगम के पति का नाम आखिरी बार आया है। तो इलाज के दौरान इन लोगों ने अकबर के सूखी पट्टियाँ बाँधीं, दवाइयाँ दीं और सिर्फ़ सात दिन में बादशाह फिर पहले जैसा स्वस्थ हो उठा। मानो किस्मत ने हार मान ली हो।
उधर हमला होते ही हमलावर पकड़ लिया गया था और जैसा अबुल फजल ने लिखा है कि अकबर ने हमलावर को तुरंत मार देने का आदेश दे दिया था ताकि इस मुद्दे पर उसके वफादार लोगों पर किसी किस्म के संदेह की बातों की चर्चा न शुरू हो जाये। बादशाह का आदेश हुआ और कुछ पलों में ही हमलावर के टुकड़े-टुकड़े हो चुके थे।
खोजबीन करने पर पता चला कि हमला करने वाला एक गुलाम क़तलाक फ़ौलाद था, जिसे बग़ावत के लिए शरफ़ुद्दीन हुसैन मिर्ज़ा ने भेजा था।
बदायूनीं का कहना है कि इस हमले के पीछे अकबर का स्थानीय जमीन्दारों आदि के शादी-सम्बन्ध करना था जिसका लोगों में बहुत विरोध और असंतोष था। ऐसी एक शादी की चर्चा मैंने किस्सों की इस सीरीज के भाग 16 में की भी है।
अकबर के ऊपर इस जानलेवा हमले के साथ ही एक और किस्सा इससे जुड़ा हुआ है और वह है अकबर की वफादार कुतिया ‘महुवा’ का।
अबुल फ़ज़ल ने किखा है कि उस समय अकबर की एक प्रिय कुतिया थी जो अकबर से बहुत हिली-मिली हुई थी और इसका नाम था ‘महुवा’ (Mahuwa)।
जब बादशाह अकबर पर तीर से हमले की यह घटना दिल्ली में हुयी तो महुवा आगरा में थी। उधर दिल्ली में ये घटना हुयी इधर आगरा में महुवा ने खाना-पीना छोड़ दिया और बहुत उदास हो गयी। उसने सात दिन तक न खाना खाया, न पानी पिया। केवल आंसुओं और चुप्पी में डूबी रही। यह दृश्य हर किसी को हैरत में डाल देता। कुत्ते तो वफ़ादारी के लिए जाने जाते हैं, लेकिन महुवा के इस किस्से ने इस बात को साबित भी कर दिया।
आज की पोस्ट में बस इतना ही
अगली पोस्ट में मुलाकात होगी किसी नए किस्से के साथ।
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