इतिहास और संस्कृति के किस्से – 41 मुग़ल दरबार के कुछ और शिष्टाचार प्रोटोकॉल माँ, दादी माँ आदि
इतिहास और संस्कृति के किस्से – 41
मुग़ल दरबार के कुछ और शिष्टाचार प्रोटोकॉल
माँ, दादी माँ आदि
जैसा हमको पता है कि मुग़ल दरबार में शिष्टाचार की एक महत्वपूर्ण परंपरा हुआ करती थी और इन तौर तरीकों में बहुत से ईरानी दरबारों के तौर-तरीकों से प्रेरित भी थे। शिष्टाचार के पालन में यद्यपि बादशाह छूट दे सकते थे किंतु उनके उल्लंघन पर कठोर दंडों की व्यवस्था भी थी। आज बात करते हैं मुग़ल बादशाहों द्वारा उनकी “माँ और दादी” को सम्मान देने के कुछ उदाहरणों की।
परिवार के अंदर माँ, वृद्ध चाचियों और बुआओं का सम्मान सबसे ज्यादा था। इनको अभिवादन करके सम्मान देने के कोई स्थापित मानक नहीं बनाए गए थे किंतु सम्मान बहुत किया जाता था इसमें कोई शक नहीं है। बाबर ने बाबरनामा में सन 1507 की एक मुलाकात का जिक्र करते हुए लिखा है कि, “ सबसे पहले मैंने घुटने मोड़ कर पायन्दा-सुल्तान बेगम (बाबर की चाची) का अभिवादन किया और उनसे बातचीत की, फिर घुटने मोड़े बिना अपाक बेगम का अभिवादन किया, फिर घुटने मोड़कर खदीजा बेगम का अभिवादन कर उनसे मिला।” यहाँ यह स्पष्ट होता है कि जिनसे घुटने मोड़कर मिला जा रहा है वहाँ दोनों का दर्जा सांकेतिक रूप से समान है जबकि घुटने न मोड़ने वाली स्थिति में दर्जे में वरीयता है।
बाबर जब 1526 में हिंदुस्तान का बादशाह बन गया और उसके बाद 1527 में उसके परिवार की औरतें हिंदुस्तान आयीं तो आगरा में उसकी बेटी गुलबदन बेगम जो उम्र में छोटी थी, उसको बाबर की मुलाजमत करने अर्थात दरबारियों की भांति अपने आप को बादशाह के सम्मुख पेश करने का अवसर मिला और फिर बाबर ने अपनी उस छोटी सी बेटी गुलबदन को अपने अंक में भरकर उसको खूब प्यार किया था। जब हुमायूँ के शासनकाल में उसके परिवार की महिलाएं उससे मिलीं तो उन सभी महिला रिश्तेदारों को शहंशाह के पाँव चूमने का सौभाग्य मिला था। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर हरबंस मुखिया ने इस संदर्भ में लिखा है कि इस प्रकार बाबर के समय में घुटने मोड़कर मिलने और मुलाजिमत करने से लेकर हुमायूँ के समय के पाँव चूमने तक पारिवारिक सम्बन्धों को पुनरपारिभाषित करने में काफी दूरी तय हो चुकी थी।
अकबर अपनी माँ का बहुत सम्मान करता था और उसके सामने अभिवादन वैसे ही करता था जैसा स्वयं बादशाह के प्रति उसके दरबार में किया जाता था। जहाँगीर भी जब अपनी माँ से मिलने एक नाव में सवार होकर दाहर नामक गाँव गया तो उसने भी अपनी माँ के आगे साष्टांग दण्डवत (कोर्निश और सजदा) की थी। जहाँगीर ने जब इस घटना जिक्र किया है तो अपनी माँ से विदा लेने की अनुमति लेने की भाषा भी बिल्कुल वैसी ही थी जैसी किसी बादशाह से विदा लेने में होती थी। शाहजहाँ ने भी एक मौके पर अपनी सास को “माँ” कह कर सम्बोधित किया था।
मुग़ल बादशाहों के हरम में माँ की हैसियत सबसे बड़ी हुआ करती थी। हरम का मतलब था स्त्रियों के रहने का इलाका या महिलाओं के आवास वाला क्षेत्र। अनेकों इतिहासकारों के वर्णन से पता चलता है कि सबसे ताकतवर शासक भी अपनी दादी और माँ के समक्ष एक सहमे हुए बच्चे के समान खड़े हुआ करते थे। बाबर एक बार अपनी दादी माँ शाह बेगम के पास गया और उनसे कहा कि वो बहुत दिनों से सोया नहीं है और बहुत दूर की यात्रा करके आ रहा है। इसके बाद उनकी गोद में अपनासर रखकर सो गया।
एक बार अकबर की माँ हमीदा बानो बेगम लाहौर से आगरा के बीच पालकी से जा रही थी तो अकबर ने पालकी अपने कंधों पर ले ली और अपने बड़े से बड़े उमरा को भी ऐसा ही करने को कहा। इसी प्रकार से सलीम और उसके पिता अकबर के बीच एक बार अकबर की माँ ने ही सुलह-सफाई कराई थी और सलीम का सर अकबर के पैरों पर रखवाया था जिसके बाद अकबर ने सलीम को अपने सीने से लगा लिया था। अकबर अपनी माँ का दर्जा ‘ईश्वर के सदृश्य’ ही मानता था। औरंगज़ेब तक ने अपने एक बेटे को विद्रोह के रास्ते से वापस लौटाने को उसकी माँ की मदद ली थी। अगली किसी पोस्ट में चर्चा होगी तस्लीम,कोर्निश या कूर्निश और पाबोस आदि के विषय में।
आज की पोस्ट में बस इतना ही
जल्द ही मुलाकात होगी एक नयी पोस्ट में कुछ और किस्सों के साथ
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