इतिहास और संस्कृति के किस्से-35 औरंगज़ेब, इश्क़, शराब और संगीत
इतिहास और संस्कृति के किस्से-35
औरंगज़ेब, इश्क़, शराब और संगीत
क्या आपको पता है कि जिस औरंगज़ेब को हम कट्टर, धार्मिक असहिष्णु और कठोर राजा के रूप में जानते हैं कभी उसका दिल भी किसी के लिए धड़का था!
कभी औरंगज़ेब ने इश्क भी फरमाया था और इश्क़ में शराब का शौक भी फरमाया था।
संगीत विरोधी औरंगज़ेब के दिल के तार बज उठे थे एक नर्तकी के लिए।
एक समय ऐसा भी था जब औरंगज़ेब ने अपना नमाज पढ़ने का नियम भी बिसरा दिया था।
हम प्रायः औरंगज़ेब को केवल उसकी कठोरता और धार्मिक कट्टरता से जोड़कर देखते हैं। लेकिन समकालीन इतिहासकारों और यात्रियों ने उसकी ज़िन्दगी का एक और पहलू भी लिखा है—एक ऐसा प्रसंग, जिसने उसके व्यक्तित्व को हमेशा के लिए बदल दिया।
दरअसल औरंगज़ेब के हरम में एक नर्तकी थी जिसका नाम हीराबाई या ज़ैनबादी महल बताया गया है। मनूची ने अपनी पुस्तक में जब शाहजहाँ के पुत्रों का वर्णन किया है तो उसके तीसरे पुत्र औरंगज़ेब के विषय में भी लिखा है। वह लिखता है कि औरंगज़ेब का व्यक्तित्व थोड़ा निराशावादी किस्म का दिखता था। वह सदैव अपनेआप को किसी न किसी चीज में व्यस्त दिखाता था।
मनूची ने औरंगज़ेब के विषय में कई रोचक बातें लिखी हैं लेकिन आज बात औरंगज़ेब, इश्क़, संगीत और शराब की। पहले इसमें में पड़ा वह और फिर इसके खिलाफ हाथ धो कर पीछे पड़ गया। औरंगज़ेब को जब हीराबाई से प्रेम हुआ तो इस हद तक हुआ कि लिखा गया है कि उसके कहने पर औरंगजेब ने शराब भी पी और संगीत तो सुनता ही था। यह प्रेम जब तक पूरा परवान चढ़ता और किसी अन्जाम तक पहुँचता उस से पहले ही नर्तकी की मृत्यु हो गयी जिससे औरंगज़ेब को बहुत बड़ा झटका लगा और शायद अवसाद से ग्रसित होकर उसने शराब, संगीत सबसे तौबा कर ली।
निकोलाओ मनुच्ची ने अपनी पुस्तक Storia do Mogor, Vol. I में इस विषय में लिखा है कि
“औरंगज़ेब, जो सामान्यतः बहुत संयमी था, एक बार एक नर्तकी के प्रेम में इतना डूब गया कि (उसने) अपनी नमाज़ें और कठोर तपस्याएँ छोड़ दीं। वह संगीत और नृत्य में रम गया और यहाँ तक कि उस स्त्री के आग्रह पर शराब तक पी। किंतु नर्तकी के मरते ही औरंगज़ेब ने प्रण किया कि जीवन भर शराब को हाथ नहीं लगाएगा और न ही संगीत सुनेगा—और इस व्रत को उसने अंत तक निभाया।”
इसी प्रसंग से उसकी आगे की नीतियाँ आकार लेती हैं।
फ़्राँस्वा बर्नियर (Travels in the Mughal Empire, 1656–1668) लिखते हैं कि औरंगज़ेब ने शराब पर पाबंदी लगाई और दिल्ली में मदिरा मिलना कठिन हो गया।
मआसिर-ए-आलमगीरी (साक़ी मुस्तअइद ख़ाँ, 1710 के लगभग) में दर्ज है कि उसने शराबख़ानों को बंद करने और शराब बेचने वालों को दंड देने का हुक्म दिया। साथ ही जुए और वेश्यावृत्ति के अड्डे भी बंद कराए।
संगीत के मामले में भी यही हुआ।
सबसे बड़ा झटका पड़ा दरबार की रूह—संगीत—को। गायक-वादक निकाल दिए गए।
उसी समय का एक मशहूर वाक़या ख़फ़ी ख़ाँ (मुन्तख़ब-उल-लुबाब) में मिलता है। वह लिखता है कि संगीतकारों ने एक जनाज़ा निकाला और कहा—“संगीत मर गया।”
औरंगज़ेब ने ठंडी मुस्कान के साथ जवाब दिया—
“इसे इतनी गहराई से दफ़न कर दो कि इसकी कोई आवाज़ फिर कभी बाहर न निकले।”
इतिहास हमें बताता है कि जिस सम्राट ने इश्क़ में पड़कर शराब पी और संगीत में डूबा, वही बाद में सबसे बड़ा संयमी और कट्टर शासक बन गया। औरंगज़ेब का यह किस्सा हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि एक शासक के निजी अनुभव कैसे उसके पूरे साम्राज्य की दिशा बदल सकते हैं और उसकी ज़िन्दगी का यह प्रसंग हमें यह भी सिखाता है कि सत्ता के फ़ैसले केवल राजनीति से नहीं, बल्कि दिल के घावों से भी निकलते हैं।
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