इतिहास और संस्कृति के किस्से – 42 आज किस्सा है तसलीम कोर्निश और पाबोस का
इतिहास और संस्कृति के किस्से – 42
आज किस्सा है तसलीम कोर्निश और पाबोस का
जब किसी राज्य में स्थिरता आती है और मजबूती भी तो वहाँ शिष्टाचार या प्रोटोकॉल की एक व्यवस्था बनती है जो समय के साथ ही सुदृढ़ भी होती जाती है। इस शिष्टाचार की व्यवस्था के कई अंग और प्रतीक होते हैं। राजा के प्रभुत्व और उसकी महानता के प्रति अन्य सब लोगों की अधीनता को व्यक्त करने में इन शिष्टाचारी प्रतीकों का बहुत बड़ा रोल था। कूर्निश भी ऐसा ही एक शिष्टाचार था। एक ईरानी विद्वान सैय्यद हैदर शहरयार नकवी का मानना है कि हुमायूँ जब भारत से भाग कर ईरान गया और फिर वापस भारत आया तो कूर्निश तथा तसलीम वाले शिष्टाचार के ये नियम अपने साथ लाया जबकि फ्रांस्वा बर्नियर के अनुसार चापलूसी की बू से भरे ये नियम विशुद्ध भारतीय थे न कि उज़्बेक, फारसी या अरबी।
शहंशाह से कोई फरमान लेते समय अथवा उनकी रसोई से भोजन लेते समय भी लेने वाले को कूर्निश का शिष्टाचार निभाना ही होता था। इसको दाहिने हाथ से करना होता था और बाएं हाथ से करने का अर्थ गम्भीर अपमान से लिया जाता था। कूर्निश करने का तरीका यह था कि दाएं हाथ की हथेली ललाट पर और सिर नीचे झुका हुआ होना चाहिए था।
अभिवादन का एक और तरीका तसलीम हुमायूँ का बनाया हुआ था। इस ‘तसलीम’ के शुरू होने का किस्सा बड़ा मनोरंजक है। आइन ए अकबरी में इसका जिक्र किया गया है। अकबर के खुद के हवाले से यह किस्सा कुछ ऐसा है कि शहंशाह हुमायूँ ने अपने पुत्र अकबर को अपना एक ताज दिया जिसको अकबर ने पहन लिया। चूँकि यह ताज या टोपी शाहजादे अकबर के सर से कुछ बड़ी थी तो उसको अकबर ने दाहिने हाथ से पकड़ा और अपने सिर को झुकाकर कूर्निश वाले तरीके से सलाम किया। बादशाह को यह तरीका बहुत पसंद आया और उसने कूर्निश और तसलीम के लिए इस तरीके कोनपनाने का आदेश दिया। तसलीम करने में व्यक्ति अपनी दाईं हथेली के पिछले भाग को जमीन पर रखता है और उसको धीरे-धीरे उठाता है। सीधे खड़े होते हुए वह अपनी हथेली को सिर के आगे के भाग पर रखता है। इस ख़ूबसूरत तरीके से जब वह बादशाह को प्रणाम करते हुए अपना सम्मान प्रकट करता है तो इसको तसलीम करना कहा जाता है।
सम्मान जताने के एक और तरीका पाबोस यानी बादशाह के चरण चूमने वाले तरीके की शुरुआत पहली बार भारत के राजाओं के दरबार में दिल्ली के सुल्तान बलबन द्वारा शुरू की गयी। जब बादशाह की हैसियत बहुत बढ़ गयी तो इसका स्थान जमीन चूमने की परंपरा ने ले लिया। अपनी प्रसन्नता को व्यक्त करने को शहंशाह कई बार उसके कंधे के ऊपर हाथ भी रखते थे। कभी-कभी विशेष परिस्थितियों में उसको बादशाह का पैर चूमने का सौभाग्य भी मिलता था जैसा औरंगज़ेब ने अपने बेटे मुअज़्ज़म को इजाज़त दी थी अथवा शाहजहाँ के ससुर आसफखां को बादशाह के पैर उंगली का नाखून चूमने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
दरबार के अहाते के बाहर यदि बादशाह घोड़े पर सवार होते थे उस स्थिति में उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए अभिवादन स्वरूप घोड़े की रकाब या शाहंशाह की जांघ को चूमने का विधान था। अकबर ने अपने समय में सजदा को एक नया रूप देकर पुनर्जीवित किया और उसको ‘ज़मीन बोस’ का नाम दिया। कहते हैं कि सजदा या साष्टांग प्रणाम का आविष्कार वैसे बदख्शां के निज़ाम ने किया था।
दरबार में शिष्टाचार के और तरीकों के किस्से बहुत हैं पर आज की पोस्ट में इतना ही।
अगली पोस्ट में मिलेंगे एक नए किस्से के साथ।
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