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Showing posts from August, 2025

इतिहास और संस्कृति के किस्से-16आज का किस्सा है मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं की लिखी किताब मुन्तख़ब-उत-तवारीख से अकबर की शादी

इतिहास और संस्कृति के किस्से-16 आज का किस्सा है मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं की लिखी किताब मुन्तख़ब-उत-तवारीख से। बदायूनीं लिखता है कि यह उस वक़्त की बात है जब बादशाह अकबर के दिमाग में खुद को शादी के रिश्ते में जोड़ने का ख्याल आया। कव्वालों (वे व्यक्ति जो लड़की के पिता को शादी के लिए राजी करते थे-पुराने नाइयों की तरह) तथा हिजड़ों को इस काम की जिम्मेदारी दी गयी। इन लोगों ने कुलीनों के हरमों में जानकारी करना शुरू कर दिया। उस समय का यही तरीका था और ऐसा करने से पूरे शहर में आतंक फैल जाता था जो हुआ भी। आगरा के मौतबीर शेख बदाह के एक पुत्र की मृत्यु हो चुकी थी और उनकी पुत्रवधु विधवा थी।इस विधवा पुत्रवधु के अपनी दर्जिन के माध्यम से पड़ोसी बुजुर्ग अधम ख़ाँ के भाई बाकी खाँ से अनैतिक सम्पर्क थे लेकिन बाद में इन सम्बन्धों की परिणित विवाह में हुई । यह विधवा महिला जब उत्सवों में जाती तो शेख बदाह की अन्य पुत्रवधु को भी लाती जिसका पति जीवित था और उसका नाम अब्द-उल-वासी था।  इस अब्द-उल-वासी की पत्नी बेहद खूबसूरत थी। संयोग से या कह सकते हैं कि वासी के दुर्भाग्य से एक दिन शहंशाह अकबर की दृष्टि उस महिला पर पड़...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-15. हसन खाँ गंगू जो गंगू ब्राह्मण का भक्त था उसकी कहानी फरिश्ता की जबानी

इतिहास और संस्कृति के किस्से-15 हसन खाँ गंगू जो गंगू ब्राह्मण का भक्त था उसकी कहानी फरिश्ता की जबानी मुहम्मद कासिम हिंदू शाह ‘फरिश्ता’ मध्ययुगीन भारत का इतिहास लिखने वाला एक प्रसिद्ध इतिहासकार हुआ है। फ़िरिश्ता का जन्म कैस्पियन सागर के तटीय नगर अस्त्राबाद में गुलाम अली हिन्दू शाह के घर सन 1570 में हुआ था। अपने बचपन में ही फ़िरिश्ता अपने पिता के संग भारत में अहमदनगर आ बसे। वहां के निज़ाम के शहज़ादे मिरान हुसैन निज़ाम शाह को फ़ारसी पढ़ाने का न्यौता इसके पिता को मिला था, जिसके साथ फ़रिश्ता ने भी अपनी पढ़ाई की। फरिश्ता की काबिलियत  से प्रभावित होकर बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिलशाह सानी या इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय ने उससे ‘हिंदुस्तान में इस्लामी शासन काल’ का इतिहास लिखने को कहा जिसके लिए पहले तो फरिश्ता मना करता रहा फिर बहुत जोर देने पर उसने नमूने के कुछ पृष्ठ लिख कर बादशाह के सामने पेश किए। इसमें फरिश्ता ने जानबूझ कर इब्राहिम के पिता अली आदिलशाह प्रथम के समय का इतिहास लिखा और उसकी हत्या की घटना को जैसा का तैसा लिख कर पेश कर दिया। दरअसल यह फरिश्ता का बहुत बड़ा साहस था क्योंकि फरिश्ता न...

हुमायूँ के लालों (Ruby) की ईरान में चोरी इतिहास और संस्कृति के किस्से-14

इतिहास और संस्कृति के किस्से-14 हुमायूँ के लालों (Ruby) की ईरान में चोरी आज जो किस्सा मैं आपसे शेयर करने जा रहा हूँ यह बादशाह हुमायूँ से सम्बंधित है और इसको हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम ने अपनी पुस्तक ‘हुमायूँ नामा’ में लिखा है। यह उस समय की बात है जब शेर शाह सूरी के हाथों हार का सामना कर और अपना राज्य गंवा कर हुमायूँ ईरान के शहंशाह तहमास्प के यहाँ अपने परिवार के साथ एक शरणार्थी का जीवन गुजार रहा था। उस समय हुमायूँ के आर्थिक हालात भी काफी खराब से ही थे। हुमायूँ ने अपने पास कुछ अत्यंत कीमती माने जानेवाले जवाहरात ‘लाल’ (Ruby) सम्हाल कर रखे हुए थे जिनके विषय में या तो उसको पता था या उसकी पत्नी हमीदा बानो बेगम (अकबर की माँ) को। उन लाल को हुमायूँ अपने तोमार (सोने या चांदी की तावीजदानी जो गले में पहनी जाती थी) में रखता था और जब नहाने या कहीं जाता तो तोमार हमीदा बानो के सुपुर्द कर के जाता था। ऐसे ही एक दिन जब हमीदाबानो नहाने गयीं तो वह तोमार को एक पोटली में बांध कर बादशाह के बिस्तर पर छोड़ गयीं। इसी बीच मौका पाकर उनके यहाँ काम करने वाले ‘रोशन कोके’ ने उसमें से पाँच लाल निकाल लिए और अपने साथी ख्व...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-13

इतिहास और संस्कृति के किस्से-13 एक आम व्यक्ति की दृष्टि से मुगल काल का खुद की सोच-समझ से वर्णन:-  जौनपुर शहर का वर्णन; शाहजादे सलीम का आना  अकबर की मृत्यु के समाचार का वर्णन आज हमारे इतिहास का जो किस्सा मैं लिखने जा रहा हूँ वो मैंने ‘अर्ध कथानक’ नामक पुस्तक से पढ़ा है जिसके लेखक बनारसीदास हैं। यह एक अद्भुत और अपने प्रकार की एक ही कृति है और आपको बताता हूँ कि मैं ऐसा क्यों कहा रहा हूँ। दरअसल यह हिंदी में लिखी हुई पहली आत्मकथा मानी जाती है। बनारसीदास जैन ने अपनी यह आत्मकथा सन 1641, जी सही पढ़ रहे हैं आप सन 1641 ईस्वी, में अपनी पचपन वर्ष की आयु में लिखी थी। जैन मत और वैसे भी बहुत से लोग मनुष्य का जीवनकाल 100-110 वर्ष का मानते हैं और इसीलिए उम्र के पचपन वर्ष पर लिखी अपने जीवन की कहानी को बनारसीदास ने ‘अरध कथान’ कहा है परंतु दरअसल यह उनका पूर्णकथानक साबित हुई क्योंकि ‘अर्ध-कथानक’ लिखने के 2-3 वर्षों के भीतर ही उनका जीवन पूर्ण हो गया था। बनारसी दास का जन्म जैन धर्म मानने वाले श्रीमाल परिवार के खरगसेन के यहाँ सन 1586 में हुआ। उनका बचपन जौनपुर, उत्तर प्रदेश में बीता बाद में व्यवसाय के स...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-12

इतिहास और संस्कृति के किस्से-12 जहाँआरा बेगम का किस्सा इतिहास और संस्कृति के किस्सों की कड़ी में एक और किस्सा पेश है।  जैसा मैं पहले बता भी चुका हूँ और आप सब जानते ही होंगे कि भारत में प्राचीनकाल से विदेशी यात्रियों का आना-जाना लगा रहा है और उन विदेशी यात्रियों ने अपनी-अपनी यात्राओं के अनुभव अपने देशों में जाकर, अपनी-अपनी भाषाओं में लिखे। उन यात्रियों द्वारा लिखे गए यह यात्रा वृतांत आज हमारे लिए न सिर्फ उनकी यात्रा के समय का समाज, व्यवस्था, संस्कृति के बल्कि उस समय के इतिहास को भी जानने के अमूल्य ‘मूल-स्त्रोत’ हैं। मैं पिछले लेखों में इब्नबतूता और मनूची की चर्चा कर चुका हूँ। आज चर्चा में एक और यात्री के लेखन का भी जिक्र करूंगा। इस यात्री का नाम था फ्रांसुआ बर्नियर और यह फ्रांस का रहने वाला था। इसका जन्म सन 1620 में फ्रांस के ‘जूए’ कस्बे में हुआ था। इसको नए-नए देश देखने, वहाँ के लोगों से मिलने और उनकी संस्कृति को समझने का बड़ा शौक था। इसने फ्रांस के प्रसिद्ध विद्वान और दार्शनिक गेसन्डी से शिक्षा प्राप्त की। 1652 में इसने मौंतपेलियर विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ मेडिसिन की शिक्षा भी प्राप...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-11

इतिहास और संस्कृति के किस्से-11 इटली का यात्री निकोलाओ मनूची और मुगल सम्राट शाहजहाँ के दरबार के किस्से आज के लेख में चर्चा है मुगल बादशाह शाहजहाँ के समय के किस्सों की। शाहजहाँ के समय के कुछ बहुत रोचक वृतांत  वेनिस, इटली से आये एक यात्री जिसका नाम निकोलाओ मनूची (Niccolao Manucci) था उसने दिए हैं। मनूची एक लेखक और चिकित्सक था, जिसने 17वीं सदी में मुगल साम्राज्य का प्रत्यक्षदर्शी वृत्तांत लिखा था. वह लगभग 16 साल की उम्र में भारत आया और अपनी पुस्तक "स्टोरियो डू मोगोर" (Storia do Mogor) में मुगल साम्राज्य के इतिहास, रीति-रिवाजों और सामाजिक जीवन का विस्तृत विवरण दिया. उसने दारा शिकोह, राजा जय सिंह और कई अन्य महत्वपूर्ण हस्तियों के लिए चिकित्सक के रूप में भी काम किया था। मनूची ने शाहजहाँ के दरबार के किस्से भी अपनी पुस्तक में लिखे हैं। वह लिखता है कि एक अजीब मामला दिहली (दिल्ली) में हुआ। वहाँ चार व्यापारी थे, जिनकी एक दुकान में बराबर हिस्सेदारी थी। उस दुकान में एक बिल्ली भी थीं। तय हुआ कि वे बारी-बारी से दुकान पर बैठा करेंगे। जिस दिन जिसकी बारी होगी, वह दीपक के लिए तेल और दुकान में र...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-10 बादशाह अकबर और हाथी

इतिहास और संस्कृति के किस्से-10 बादशाह अकबर और हाथी इस सीरीज के भाग 6 में हमने आपसे चर्चा की थी हुमायूँ बादशाह के एक स्वप्न की जिसमें उसको एक व्यक्ति ने अकबर के जन्म के विषय में अपना एक प्रकार से आशीर्वाद दिया था और कहा था कि उसका होने वाला पुत्र उस व्यक्ति की नस्ल से होगा। स्वप्न में दिखे उस व्यक्ति ने अपना नाम बताया था ‘जिन्दाफील’। फारसी भाषा में ‘फील या फिल’ का अर्थ होता है ‘हाथी’। तो आज की इस पोस्ट में अकबर और हाथियों के कुछ किस्सों की ही चर्चा है। बादशाह अकबर को हाथियों का बहुत शौक था और वह बेखौफ होकर हाथियों की न सिर्फ सवारी करता था अपितु बिगड़े हाथी से भी उसको कोई डर नहीं लगता था। हाथी कैसा भी हो अकबर को उसको अपने वश में करना आता था। अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है कि अकबर ऐसे मस्त हाथी पर चढ़ जाता था जो आदमियों को मार देता था, महावतों को गिरा देता था और जिसको देख कर लोगों के दिल बैठ जाते थे। एक बार एक मस्त हाथी ने अपने महावत तथा और कई लोगों को जान से मार दिया और बिगड़ गया। सारे शहर में हंगामा हो गया। अकबर मुस्कुराते हुए उसके एक दांत पर पैर रखकर न सिर्फ उस पर चढ़ गया बल्कि उसको दूस...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-9 बैरमखाँ और अब्दुर्रहीम खानखाना

इतिहास और संस्कृति के किस्से-9 आज चर्चा करेंगे बैरमखान और उनके पुत्र   प्रसिद्ध कवि और अकबर के दरबार के बड़े सरदार अब्दुर्रहीम खानखाना की।  इनके विषय में मुंशी देवी प्रसाद ने लिखा है। मुंशी देवीप्रसाद के पूर्वज मूलतः दिल्ली के थे लेकिन मुगल सल्तनत के ढलान के साथ वो लोग भोपाल होते हुए टोंक राजस्थान आये और मुंशी देवी प्रसाद जोधपुर, में सन 1871 में जोधपुर के तब के रीजेंट महाराजा सर प्रताप सिंह  के यहाँ नायब सरिश्तेदार की नौकरी करने लगे। उन्होंने ‘खानखाना नामा’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्घ लिखा और इसके अतिरिक्त भी मारवाड़, सिरोही आदि रियासतों का इतिहास लिखा और फारसी के कुछ ग्रंथ भी अनूदित किये। खानखाना नामा बैरम खां और उसके पुत्र अब्दुर्रहीम खानखाना के विषय में है। इस ग्रंथ को मूल सोर्स जैसा ग्रंथ नहीं कहा जायेगा लेकिन फिर भी इसमें बहुत अच्छी रोचक जानकारी मिलती हैं। मुंशी देवी प्रसाद ने इसको लिखने में ‘मअ सिर-उल-उमरा’ नामक ग्रंथ की भी मदद ली है। मुंशी देवीप्रसाद लिखते हैं कि ‘मअ सिर-उल-उमरा’ में बैरम खां की जाति तुर्कमान बताई गई है और खानदान का नाम “कराकूयालू” लिखा है। तुर्कमान का...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-8

इतिहास और संस्कृति के किस्से-8 आज चर्चा पुराणों के अनुसार पार्जिटर की इतिहास संजोने की कोशिश की। पुराणों में लिखी वंशावलियों और परंपराओं का अध्ययन करना एक बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक कार्य है। पार्जिटर महोदय ने जन सारे तथ्यों को गहरी रिसर्च करके बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से लिखा है। पुराणों में मत्स्य पुराण और वायु पुराण दोनों पौरव (या हेला) वंश की वंशावली को पांडवों से अभिमन्यु, परीक्षित और जनमेजय तक लाते हैं। आगे ये पुराण इस वंशावली को राजा अधिसीम कृष्ण तक निरन्तर रखते हैं और बताते हैं कि इस राजा के समय में 12 वर्ष का यज्ञ किया गया और इसी समय में पुराणों को गेय रूप मिला या गाया गया (कह सकते हैं कि रूप मिलना शुरू हुआ)। ये वही काल है जब ऋषिगण ने ‘सूत’ लोगों को कलिकाल का पूर्ण विवरण देने को कहा। इसके आगे राजाओं के नाम, उनमें वंश और शासनावधि कि चर्चा है। विस्तृत विवरण में न जाकर हम देखें तो पता चलता है कि इनमें निम्नलिखित प्रमुख राजवंशों, उनके राजाओं और शासनावधि का विवरण है:- 1.पौरव राजवंश (अभिमन्यु से वंशावली शुरू है और परीक्षित से होते हुए 29 राजाओं के नाम हैं)। 2.इक्ष्वाकु वंश (बृहद बल से श...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-7

इतिहास और संस्कृति के किस्से-7 फ्रेडरिक ईडन पार्जिटर एक ICS अधिकारी थे जो संस्कृत के बहुत बड़े ज्ञाता थे। पार्जिटर  1875 ईसवी में बंगाल में इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी बने और अंडर सेक्रेटरी, 1887 में सत्र न्यायाधीश और 1904 ईस्वी में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज बने।1906 में 54 वर्ष की आयु में इन्होंने रिटायरमेंट ले लिया। इनकी प्राचीन भारत के साहित्य, संस्कृति और इतिहास में काफी रुचि थी और इस क्षेत्र में इनका काम और योगदान बहुत बड़ा है। इनकी इस विषयक पुस्तकें हैं:- 1.मार्कण्डेय पुराण संस्कृत टेक्स्ट इंग्लिश ट्रांसलेशन विद नोट्स ऐंड इंडेक्स ऑफ वर्सेस (1904) 2.ऐनशिएंट इंडियन हिस्टोरिकल ट्रेडिशन्स (1922) 3.डायनेसटीज़ ऑफ कलि ऐज इनमें से दो पुस्तकों का हिंदी अनुवाद मैंने पढ़ा। इनका अनुवाद श्री मुन्नालाल डाकोत और भूमिका डॉ0 श्रीकृष्ण ‘जुगनू’  Shri Krishan Jugnu जी द्वारा लिखी गयी है। मुझको आदरणीय हेरम्ब भाईसाहब Heramb Chaturvedi  जी ने कहा था कि प्राचीन भारत में पौराणिक परंपराओं और राजाओं की वंशावलियों के लिए यह बहुत अच्छी और प्रामाणिक पुस्तकें हैं। पार्जिटर साहब का यह काम न सिर्फ अद्भ...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-6

इतिहास और संस्कृति के किस्से-6 स्वप्न, ज्योतिष, इस्लाम के अलावा अन्य धर्मों की बातें और इनमें विश्वास आज मैं आपसे चर्चा करूँगा कि उस समय के लेखकों की पुस्तकें पढ़ने से जानकारी मिलती है कि मुगल शासक ज्योतिष, नजूमी, स्वप्न आदि पर बहुत विश्वास रखते थे और बादशाह हुमायूँ तो खुद ज्योतिष का अच्छा ज्ञान रखता था। हुमायूँ के दरबार में एक ‘मीर जायचा' (राज्य के मुख्य ज्योतिषी) का पद भी था। हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम ने अकबर के कहने पर उस समय की घटनाओं पर जो किताब लिखी उसको ‘हुमायूँ नामा’ के नाम से जाना जाता है। इसमें गुलबदन बेगम जिक्र करती हैं कि जब हुमायूँ ने शेर शाह सूरी को एक विनती भेजी कि मैंने तुम्हारे लिए पूरा हिंदुस्तान छोड़ दिया तुम लाहौर तो मेरे लिए छोड़ दो और उसके जवाब में शेर शाह ने कहलवाया कि मैंने तुम्हारे लिए काबुल छोड़ दिया है, तुम वहाँ चले जाओ। गुलबदन बेगम लिखती हैं कि यह मानो कयामत का दिन था।लोगों ने सजे सजाए मकान “जूं के तूं” छोड़ दिये। हर किस्म का का सामान छोड़ दिया और सिर्फ नकद रुपया साथ लेकर चल पड़े। इसके बाद रावी के तट पर शेर शाह का एलची आया और उसने हुमायूँ से मुलाकात की।इस मुला...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-5

इतिहास और संस्कृति के किस्से-5 मिर्ज़ा कामरान को अंधा किया जाने का आँखों देखा हाल आज मैं आपसे शेयर कर रहा हूँ मुगल बादशाह हुमायूँ के सेवक जौहर आफ़ताबची द्वारा लिखी पुस्तक “तज़किरातुल वाक़िआत” से एक प्रसंग। पहले तज़किरातुल वाक़िआत और जौहर आफ़ताबची के विषय में बता दूँ; तज़किरातुल वाक़िआत जौहर आफ़ताबची के उन संस्मरणों का संग्रह है जो हुमायूँ से सम्बंधित हैं तथा सम्राट अकबर के आदेशानुसार जौहर ने हुमायूँ के मरने के तीन दशक के बाद फारसी भाषा में लिखे। जौहर आफ़ताबची जैसा कि नाम से पता चलता है कि हुमायूँ का आफ़ताबची अर्थात पानी का लोटा उठाने वाला था। बादशाह के प्रयोग में आने वाली हर तरल (liquid) वस्तु की व्यवस्था करना उसकी जिम्मेदारी थी फिर वो पीने का पानी हो, वुजू करने या नहाने को पानी हो या कोई और पेय पदार्थ उसकी व्यवस्था करना आफ़ताबची का कर्तव्य था। इसके लिए उसको हर समय सोते-जागते, दरबार हो या यात्रा, युद्ध हो या शांति हर समय बादशाह के साथ उसको रहना ही होता था। इसलिए वह हर समय बादशाह के साथ रहता था, उसका अत्यधिक विश्वासपात्र था, अत्यंत घनिष्ट और वफादार भी था। जौहर हुमायूँ के साथ हर समय रहा चाहे जब वो हि...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-4

इतिहास और संस्कृति के किस्से-4 आज मैं आपसे शेयर कर रहा हूँ बादशाह मुहम्मद तुगलक का शिकार के लिए निकलना और फिर योगी वाला किस्सा। अपने लेखन में एक स्थान पर इब्नबतूता ने बादशाह के शिकार पर निकलने के दृश्य का विवरण दिया है। इस शिकार यात्रा में इब्नबतूता स्वयं भी बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक के साथ था। बादशाह की शाही सवारी और डेरा इब्नबतूता बताता है कि इस देश की प्रथा ऐसी है कि जब बादशाह शाही सवारी पर शिकार के लिए निकलते है तो उनके सवार होते ही प्रत्येक अमीर अपनी सेना सुसज्जित कर ध्वजा, पताका, ढोल-नगाड़े, शहनाइयां आदि सहित सवार हो जाता है।सबसे आगे बादशाह की सवारी होती है। उसके आगे केवल पर्देदार और गायक/नर्तकियां तथा तबलची गले में तबले लटकाए सरना (?) बजाने वालों के साथ चलते हैं। बादशाह के दाएँ और बाएँ पंद्रह-पंद्रह चुने हुए आदमी चलते थे जिनमें वजीर, बड़े अमीर तथा परदेसी चलते थे और इब्नबतूता भी इनमें से ही एक था जो उस जुलूस में शामिल था। बादशाह के पीछे रेशमी और कामदार वस्त्र की ध्वजा-पताका और ऊंटों पर तबला आदि चलते हैं।इसके पश्चात बादशाह के भृत्यों और दासों का नम्बर आता है तत्पश्चात अमीरों और फिर ज...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-3इब्नबतूता और दिल्ली का दयालु? दानशील, न्यायप्रिय? बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक

इतिहास और संस्कृति के किस्से-3 इब्नबतूता और दिल्ली का दयालु? दानशील, न्यायप्रिय? बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक आज मैं आपसे बात करूँगा प्रसिद्ध यात्री इब्नबतूता और उसकी भारत यात्रा के एक अनुभव की। इब्नबतूता के अरबी भाषा मे लिखे यात्रा वृतांत ‘रिहला’ की मूल प्रति तो किसी म्यूज़ियम में है और उसके अनेकों भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। मैंने जब इब्न बतूता का अनुवादित यात्रा वृतांत पढ़ा तो इससे उस समय के जीवन को समझने में मदद मिली और बहुत जानकारी भी मिली तथा यह विचार पुख्ता हुआ कि ओरिजिनल सोर्स (अनुवादित ही सही) पढ़ने का मजा ही कुछ और है। इब्नबतूता मोरक्को देश का रहने वाला था और जीवन पर्यंत वह दुनिया के विभिन्न देशों की यात्रा करता रहा। वह 13वीं शताब्दी में भारत आया और दिल्ली में लगभग 9 वर्षों तक विभिन्न बादशाहों के दरबार में कार्य करता रहा और उस समय के अनुभव उसने बाद में लिपिबद्ध किये जो आज भी भारत के उस काल के शासन प्रणाली आदि के विषय में प्रमाणिक माने जाते हैं, उनसे उस समय की बहुत जानकारी मिलती है और रोचक तो हैं ही। इब्नबतूता के विवरण से जानकारी मिलती है कि:- -गंगा नदी को उस समय भी मोक्षदायनी माना जा...

इतिहास और संस्कृति के किस्से-2 बौहरे बसंतराय और मुगल शहजादा जिसने पैसे उधार लिए

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इतिहास और संस्कृति के किस्से-2 हाल ही में मैंने बूटा सिंह जी, फारसी भाषा, इतिहास के मूल सोर्स पढ़ना और अकबर बादशाह आदि से सम्बंधित एक पोस्ट की थी जिसको काफी लोगों ने पसंद किया और कुछ लोगों ने मुझसे संपर्क करके भी कहा कि इतिहास,संस्कृति आदि से सम्बंधित और भी किस्से में लिखना शुरू करूँ तो आज एक ऐसा ही किस्सा और पेश है। आज मैं आपसे जो किस्सा शेयर करने जा रहा हूँ इसमें चर्चा है एक ऐसे मुगल राजकुमार की जिसने कुछ व्यापारियों से रुपये उधार लिए और जब वो हिंदुस्तान का शहंशाह बना तो उसने वो पैसे वापिस भी किये। पहले मैं बताता हूँ कि यह किस्सा मेरी जानकारी में कैसे आया। कोविड के दौरान मैंने सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत से विषयों पर फेसबुक लाइव किया और इसमें बहुत से विषय ऐसे थे जिनके लिए मुझको काफी रिसर्च करनी पड़ी। इसी दौरान आदरणीय हेरम्ब भाईसाहब की पुस्तक  “चतुर्वेदियों का इतिहास” से प्रेरणा लेकर मेरे मन में आया कि मैं भी श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय के इतिहास और संस्कृति के विषय में जानकारी करूँ और इस कार्य में मुझको गाइड करने को हेरम्ब भाईसाहब तो मौजूद थे ह...

इतिहास की दृष्टि और सरदार बूटा सिंह

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आज मैं आपसे जो किस्सा शेयर करने जा रहा हूँ वह एक ऐसे राजनीतिक व्यक्ति से जुड़ा है जिन्होंने मुझको इतिहास पढ़ने में एक नयी दृष्टि दी और रुचि भी बढ़ाई। किस्सा कुछ यूँ है कि कांग्रेस के प्रसिद्ध नेता और भारत सरकार के गृह मंत्री रहे स्व0 सरदार बूटा सिंह जी के मेरे पापा स्व0 श्री अशोक चतुर्वेदी जी से काफी घनिष्ठ सम्बन्ध थे और उनका हमारे घर फिरोजाबाद कई बार आना हुआ था। चूँकि सरदार बूटा सिंह जी को Z+ सुरक्षा मिली हुयी थी तो उनका आना काफी सुरक्षा बलों के साथ तो होता ही था जिसमें सबसे विचित्र लगता था उनकी गाड़ी के पीछे एक खुली गाड़ी में Light machine gun जिसका मुँह पीछे की दिशा में होता था और उस पर बैठे एक चुस्त-दुरुस्त सरदार सिपाही! साथ में लोकल अमला और ताम-झाम भी बहुत रहता था जैसे डॉक्टर, एम्बुलेंस इत्यादि। बूटा सिंह जी को खाने-पीने को वही चीज दी जा सकती थी जिसको उनकी सुरक्षा में इस विषयक लगे लोग स्वयं चखकर ओके कर दें। मथुरा-गोवर्धन क्षेत्र में एक बहुत प्रसिद्ध और सिद्ध संत हुए हैं स्वामी कंचन दास जी महाराज; वह एक बहुत उच्च कोटि के पहुँचे हुए संत थे पर मेरे पिता...

चिट्ठी भैया को मिले, आगरा

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"चिट्ठी भैया को मिले आगरा" भारतीय डाक विभाग ने अपनी एक प्रमुख सेवा रजिस्टर्ड पोस्ट को बंद कर दिया है। यह सेवा पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से उपयोग में थी और इसे भरोसेमंद, किफायती और कानूनी रूप से मान्य सेवा के रूप में जाना जाता था। इस समाचार को देख कर डाक विभाग से जुड़ा एक पुराना किस्सा याद आ गया। बात 1900 के दशक की है यानी ईस्वी सन 1900 से 1910 के बीच की कभी की। यह किस्सा मुझको मेरे बाबा स्व0 सुशील चन्द्र जी ने अनेकों बार सुनाया था। उस समय हमारे बाबा और उनके बड़े भाई स्व0 सुरेश चंद्र जी (जज साहब) आगरा में अपनी माँ के साथ रह कर पढ़ाई कर रहे थे।  हम लोग मूलतः फिरोजाबाद के रहने वाले हैं परन्तु रीवा राज्य से हम लोगों का सन 1880/90 के दशक से निकट का सम्बंध रहा है और हमारे परिवारीजन तभी से रीवा में भी रहते आये हैं। हमारे बाबा के चाचा स्व0 रोशन लाल चतुर्वेदी जिनको उनकी हष्ट-पुष्ट काया के कारण परिवार में भीम चच्चा के नाम से जाना जाता था (वह 1000 चक्र-दंड रोज करते थे) और जो रीवा राज्य में एक उच्च पद पर आसीन थे, उनकी पुत्री यानी बाबा की छोटी बहन सरस्वती बुआजी उस समय रीवा में थीं और बहुत ...

शिर्डी, नासिक, श्री त्रयंबकेश्वर और पंचवटी यात्रा 28,29 और 30 जुलाई 2025

अभी हाल ही में नासिक जाने का संयोग बना तो पहले दिल्ली से शाम को लगभग 4 बजे शिरडी पहुँचे और वहाँ सीधे श्री साईं बाबा के मंदिर जाना हुआ। मैंने कभी शिरडी जाने का न सोचा था और न कभी प्लान ही किया था किंतु अचानक ये प्रोग्राम बना और ऐसा बना कि सबसे पहले शिरडी जाना हुआ। मंदिर पहुँचने पर भी लग रहा था कि इतनी भीड़ होती है वहाँ और उस दिन तो सावन माह का सोमवार भी था। मैंने अपने और पत्नी के लिए पास तो ऑनलाइन बनवा लिया था किंतु वहाँ के दुकानदार ने हमको सीनियर सिटीज़न वाली एंट्री पर ले जाकर खड़ा कर दिया। मालूम नहीं क्या हुआ मुझको तो लगा कि साईं बाबा का आशीर्वाद ही था कि हम लोगों को सिक्योरिटी वाले रास्ता बताते गए और मुश्किल से 5-7 मिनट में हम हॉल में साईं बाबा की मूर्ति के सामने उनका आशीर्वाद ले रहे थे जबकि लाइन में दर्शनार्थियों की अपार भीड़ थी। इसके बाद हमारा टैक्सी वाला जिसका नाम गणेश था हमको नासिक की तरफ ले गया। रास्ते में एक स्थान पर रुकना हुआ जहाँ हमने बहुत अच्छी भेलपूरी खायी और बढ़िया गरमागरम चाय पी। हमारा रुकने का नासिक और श्री त्रयंबकेश्वर के बीच ग्रेप काउंटी रिसोर्ट में था जो एक बेहद ख़ूबसूरत स्...