इतिहास और संस्कृति के किस्से-7

इतिहास और संस्कृति के किस्से-7

फ्रेडरिक ईडन पार्जिटर एक ICS अधिकारी थे जो संस्कृत के बहुत बड़े ज्ञाता थे। पार्जिटर  1875 ईसवी में बंगाल में इंडियन सिविल सर्विस के अधिकारी बने और अंडर सेक्रेटरी, 1887 में सत्र न्यायाधीश और 1904 ईस्वी में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज बने।1906 में 54 वर्ष की आयु में इन्होंने रिटायरमेंट ले लिया। इनकी प्राचीन भारत के साहित्य, संस्कृति और इतिहास में काफी रुचि थी और इस क्षेत्र में इनका काम और योगदान बहुत बड़ा है। इनकी इस विषयक पुस्तकें हैं:-
1.मार्कण्डेय पुराण संस्कृत टेक्स्ट इंग्लिश ट्रांसलेशन विद नोट्स ऐंड इंडेक्स ऑफ वर्सेस (1904)
2.ऐनशिएंट इंडियन हिस्टोरिकल ट्रेडिशन्स (1922)
3.डायनेसटीज़ ऑफ कलि ऐज

इनमें से दो पुस्तकों का हिंदी अनुवाद मैंने पढ़ा। इनका अनुवाद श्री मुन्नालाल डाकोत और भूमिका डॉ0 श्रीकृष्ण ‘जुगनू’  Shri Krishan Jugnu जी द्वारा लिखी गयी है। मुझको आदरणीय हेरम्ब भाईसाहब Heramb Chaturvedi  जी ने कहा था कि प्राचीन भारत में पौराणिक परंपराओं और राजाओं की वंशावलियों के लिए यह बहुत अच्छी और प्रामाणिक पुस्तकें हैं। पार्जिटर साहब का यह काम न सिर्फ अद्भुत है बल्कि साथ ही भारत की प्राचीन परंपराओं को दुनिया के सामने एक प्रामाणिक रूप में लाने का अमूल्य योगदान भी है और साथ ही डॉक्टर श्रीकृष्ण ‘जुगनू’ जी और श्री मुन्नालाल डाकोत जी का इसका हिंदी भाषा में अनुवाद करना भी एक कठिन परिश्रम के द्वारा आमजन के लिए यह जानकारी उपलब्ध कराना एक बहुत बड़ा योगदान है।
आज इस पोस्ट में आपसे कुछ बातें शेयर कर रहा हूँ बाकी फिर आगे की पोस्टों में लिखी जाएंगी। इन उल्लेखों से हमको हमारी प्राचीन भारतीय परंपरा की जानकारी तो मिलेगी ही साथ ही वर्ण व्यवस्था और बाद की बनी जाति व्यवस्था के उद्भव के विषय में हमारा ज्ञानवर्धन होगा।
1.वायु और पद्मपुराण हमको बताते हैं कि वंशावलियाँ, कथाएं और उस समय की गाथाओं के गीत किस प्रकार ‘सूतों’ द्वारा संरक्षित हुए।
2.ये पुराण उन ‘सूतों’ के कर्तव्य भी बताते हैं। जिनका प्रमुख कर्तव्य था कि वे देवताओं की,ऋषियों की, प्रसिद्ध राजाओं की और महान वंयक्तियों की वंशावलियों का संरक्षण करें अथवा उनकी स्तुतियों का सम्पादन करें जिनको इतिहास और पुराणों में वर्णित किया गया है।
3.वायु पुराण में कहा गया है कि “श्रुत” का वास्तविक अर्थ है ‘परंपरा’ और हाँ ‘श्रुत’ का अर्थ यहाँ धार्मिक परंपरा  न होकर केवल परंपरा है।
4.पद्म पुराण के अनुसार ‘स्तुति’ का सामान्य अर्थ है किसी की प्रशंसा में गाथागीत।
5.यहाँ यह भी बताना उचित होगा कि जिन सूतों का यहाँ उल्लेख किया गया है वे कोई जाति नहीं हैं अपितु क्षत्रिय पिता और ब्राह्मण माता की संतान हैं। अब देखिए इस बात से पता चलता है कि प्राचीन पौराणिक काल में भारतवर्ष में अंतरवर्णीय विवाह एक सामान्य बात थी और उनसे उत्पन्न सन्तानों को समाज में एक सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। मतोब अभी जातिप्रथा की शुरुआत (जैसा कि आगे चलकर इसने रूप लिया) नहीं हुयी थी।
6. ये सूत एक किस्म के चारण थे, मागध की भांति और इनके एक ही पूर्वज थे राजा पृथु। एक प्राचीन कथा बताती है कि राजा पृथु ने अनूप क्षेत्र (बंगाल) सूत को और मगध मागधों को दे दिया। परंपरा से बताई गई कथा यह भी कहती है कि इन सूतों और बाद की उत्पन्न जाति वाले सूतों में, जो क्षत्रिय पिता और ब्राह्मण माता से उतपन्न थे, के बीच विभेद स्पष्ट था। कथा स्पष्ट करती है कि बाद वाले ‘सूत’ इसलिए कहलाये क्योंकि इन्होंने वही कर्तव्य अपनाया जो पूर्व के ‘सूतों’ ने अपनाया था। इसके साथ ही उनको दो निम्न स्तर के व्यवसाय करने की अनुमति भी दी गयी, नामत: क्षत्रियों के लिए रथ, हाथी और घोड़ों के सम्बंध में नियुक्तियां तथा दूसरा व्यवसाय था औषधियां।
7. गौरतलब बात है कि इस वजह से मूल सूतों के मुकाबले बाद वाले जातिगत सूत धीरे-धीरे अधिक प्रभावशाली होते चले गए। 8.पुराणों और प्राचीन परंपराओं के गहन अध्ययन के बाद पार्जिटर ने यह भी बताया है कि पुराणों में वर्णित सूत क्षत्रिय ब्राह्मण स्त्री से उत्पन्न सन्तान से भिन्न हैं और मागध वैश्य व क्षत्रिय स्त्री से उत्पन्न हुए। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि पौराणिक सूत और मागध सूत कौटिल्य के समय में पुराणों से ही जाने जाते थे और चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में उनका अस्तित्व लोप हो चला था।

प्राचीन इतिहास की इस गम्भीर चर्चा को आज हम यहीं रोकते हैं और बात करते हैं सम्राट अकबर द्वारा विद्वानों से चर्चा करने के एक अजीबोगरीब तरीके की।
अकबर के समय में उस समय की घटनाओं और इतिहास को संकलित और लिपिबद्ध करने वाला अबुल फजल एक बहुत बड़ा विद्वान था। अबुल फजल अकबर को ही खलीफा मानता था और उसका यह भी मानना था कि अकबर सर्वगुण सम्पन्न था और ईश्वर की उस पर विशेष और सीधी कृपा थी अर्थात उसके और परमात्मा के बीच एक सीधा और विशेष सम्बन्ध था और अकबर के समय में अबुल फजल के अनुसार कोई मुस्लिम दरवेश या फ़क़ीर उसके समान पहुँचा हुआ भगवद भक्त नहीं था। अकबर ने फतेहपुर सीकरी में जो इबादतखाना बनवाया उसमें सभी धर्मों के लोगों की खुली चर्चा होती थी, किंतु कभी-कभी बादशाह को देर रात में भी किसी विद्वान से अचानक चर्चा का मन हो जाता था। अब रात में बादशाह अपनी आरामगाह में हैं तो वह व्यक्ति वहाँ कैसे जाए और प्रोटोकॉल के भी न जाने कितने तकाजे रहे होंगे लेकिन शहंशाह का मन तो पूरा होना ही था तो उस समय क्या होता था इसका विवरण मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं ने बहुत रोचक तरीके से किया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अन्य धर्म के लोगों से अकबर का सांस्कृतिक और धार्मिक चर्चा करना बदायूनीं जैसे कट्टरपंथियों को बिल्कुल नहीं सुहाता था जो उसके इन वर्णनों में दृष्टिगोचर होता है।
बदायूनीं लिखता है कि, अकबर के दरबार में एक विद्वान था जिनका नाम ‘देवी’ था जो एक ब्राह्मण था। यह वही देवी है जो ‘महाभारत’ का एक टिप्पणीकार था। अब एक दिन देर शाम बादशाह का अचानक मन में इन्हीं देवीराम के साथ कुछ विषयों पर चर्च का हुआ तो देवीराम को बुलवाया गया। महल में/किले में बादशाह का कमरा काफी ऊँचाई पर था और उसमें बादशाह झरोखे की ओर बैठे हुये थे। उसी समय देवीराम को एक चारपाई पर बैठाया गया और फिर उस चारपाई को  रस्सियों से बाँध ऊपर के झरोखे के पास खींचा गया। अब जरा कल्पना कीजिये उस किले की दीवारों की ऊँचाई की और सोचिए उस दीवार पर  बाहर की ओर एक चारपाई हवा में लगभग 70 फीट ऊँचाई पर लटकी हुयी है और उस स्थिति में उस पर बैठे या हवा में लटके देवीराम ने बादशाह को हिंदुत्व के रहस्य बताए। मूर्तियों, अग्नि और ग्रहों की पूजा आदि के तरीकों पर चर्चा की। मुख्य देवताओं जैसे ब्रह्मा, महादेव, विष्णु, श्रीकृष्ण, राम तथ महामाया को प्रसन्न करने की विधियां बतायी और देर रात तक यह चर्चा ऐसे ही चली जिसमें बादशाह अपने महल की खिडकी या झरोखे में बैठा है जिसकी ऊँचाई बहुत है और बाहर हवा में लटकती चारपाई पर विद्वान देवी राम बैठे हुए बादशाह सलामत से इन विषयों पर चर्चा कर रहे थे।
क्या ये चर्चाएं धार्मिक अर्थ में अकबर की कट्टरता को दर्शाती हैं? या उसकी सब धर्मों के विषय में जिज्ञासु प्रवृत्ति को बताती हैं? पता नहीं….
और हाँ अकबर की पेंटरों द्वारा बनाई तस्वीरों में वह बिना दाढ़ी के भी सिर्फ मूंछों में दिखता है जो उस वक़्त के मुस्लिम धार्मिक कट्टरपंथियों को पसंद आना मुश्किल था। हर युग में, हर धर्म के कट्टरपंथी राजसत्ता पर हावी होना चाहते रहे हैं और जन-मन पर भी;कभी वह सफल होते भी हैं और जब शासक या शासन प्रोग्रेसिव और सहिष्णु हो तो उनको बदायूनीं की तरह खीझ भी होती है। यह भी देखा गया है कि जब शासक किसी रूप में अपने को कमजोर महसूस करता है तो जिन चीजों का सहारा लेता है उनमें धर्म प्रमुख है जिसका उदाहरण आधुनिक काल में हम अपने पड़ोसी देशों में देखते रहे हैं।
बदायूनीं बहुत भारी मन से यह भी लिखता है कि एक बार यज्द के मुल्ला मुहम्मद को भी इसी तरह दीवार के ऊपर तक खींचा गया और उसने भी धर्म की कट्टर बातों से इतर बेकार की बातें कीं और तीनों खलीफाओं के विरुद्ध अंटशंट बका आदि-आदि। इसी भांति शेख जमान जो सूफी मत में प्रवीण था उसको भी चारपाई वाले ब्राह्मण की भाँति एक कम्बल में बांध कर महल की दीवार तक खींचा जाता और बकौल बदायूनीं, “शहंशाह सारी रात गलीज व मूर्खतापूर्ण बातें सुना करता।”
अब आज की पोस्ट यहीं समाप्त।
अगली पोस्ट में मिलते हैं किसी नए किस्से के साथ।

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