इतिहास और संस्कृति के किस्से-6
इतिहास और संस्कृति के किस्से-6
स्वप्न, ज्योतिष, इस्लाम के अलावा अन्य धर्मों की बातें और इनमें विश्वास
आज मैं आपसे चर्चा करूँगा कि उस समय के लेखकों की पुस्तकें पढ़ने से जानकारी मिलती है कि मुगल शासक ज्योतिष, नजूमी, स्वप्न आदि पर बहुत विश्वास रखते थे और बादशाह हुमायूँ तो खुद ज्योतिष का अच्छा ज्ञान रखता था। हुमायूँ के दरबार में एक ‘मीर जायचा' (राज्य के मुख्य ज्योतिषी) का पद भी था।
हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम ने अकबर के कहने पर उस समय की घटनाओं पर जो किताब लिखी उसको ‘हुमायूँ नामा’ के नाम से जाना जाता है। इसमें गुलबदन बेगम जिक्र करती हैं कि जब हुमायूँ ने शेर शाह सूरी को एक विनती भेजी कि मैंने तुम्हारे लिए पूरा हिंदुस्तान छोड़ दिया तुम लाहौर तो मेरे लिए छोड़ दो और उसके जवाब में शेर शाह ने कहलवाया कि मैंने तुम्हारे लिए काबुल छोड़ दिया है, तुम वहाँ चले जाओ। गुलबदन बेगम लिखती हैं कि यह मानो कयामत का दिन था।लोगों ने सजे सजाए मकान “जूं के तूं” छोड़ दिये। हर किस्म का का सामान छोड़ दिया और सिर्फ नकद रुपया साथ लेकर चल पड़े। इसके बाद रावी के तट पर शेर शाह का एलची आया और उसने हुमायूँ से मुलाकात की।इस मुलाकात के बाद हुमायूँ बहुत दुःखी हुआ और परेशानी की हालत में अफीम खाकर सो गया। उस वक़्त हुमायूँ को सपने में एक व्यक्ति दिखा जो सर से पैर तक हरे रंग के कपड़े पहने था और हाथ में लाठी लिए था। उस आदमी ने हुमायूँ से कहा कि, ‘मर्द बनो और गम न करो।’ यह कह कर उसने अपनी लाठी बादशाह हुमायूँ के हाथ में दे दी और कहा, ‘ खुदा तआला तुम्हें बेटा देगा, उसका नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर रखना।’ हुमायूँ ने उस व्यक्ति से आदरपूर्वक पूछा आपका नाम क्या है तो वह व्यक्ति बोला- ‘जिन्दाफील (खतरनाक हाथी) अहमद जान और यह कि तुम्हारा पुत्र मेरी नस्ल से होगा।’
जब हुमायूँ की हमीदा बानो बेगम से शादी की बात तय हो गयी तो उस समय के विषय में भी गुलबदन बेगम लिखती हैं कि, “ हजरत बादशाह ने अस्तरलाब (नक्षत्र यंत्र या हो सकता है इसका तातपर्य ephemeris या पंचांग से हो) अपने मुबारक हाथ पर रखकर, मुबारक घड़ी का चयन किया और मीर अबुल बका को तलब किया कि बहुत जल्द हमीदा बेगम से निकाह पढ़ा दें।”
गुलबदन बेगम अकबर के जन्म के समय का भी विवरण देते में ज्योतिषीय अर्थात नक्षत्र/सितारों की चर्चा भी करती है। वह कहती हैं, “चार तारीख माह रजबुल मुरज्ज्ब 949 हिजरी को सुबह के वक़्त हज़रत बादशाह आलमपनाह …….अकबर….की पैदाइश हुयी। इस वक़्त चाँद बुर्ज असद (सिंह राशि) में था।इस बुर्ज में चाँद हो तो जन्म बहुत मुबारक समझा जाता है।” बदायूनी ने अकबर का जन्म चौदह शाबान को हुआ लिखा है।
बदायूनीं के अनुसार अकबर इस्लाम के अलावा अन्य धर्मों की न सिर्फ जानकारी हासिल करने का प्रयास करता था अपितु उनकी बहुत सी बातों को मानता भी था। इस वजह से बदायूनीं जैसे कट्टरपंथी उसकी इन बातों को पसंद भी नहीं करते थे।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं ने अपनी पुस्तक मुन्तख़ब उत तवारीख (अनुवादक मुन्नालाल डाकोत और भूमिका श्री कृष्ण जुगनू Shri Krishan Jugnu ) में जिक्र किया है कि शहंशाह अकबर हर दिन उस दिन के ग्रह के अनुसार उसके रंग के कपड़े पहनता था।
बदायूनीं यह भी लिखता है कि बादशाह अकबर हिंदुओं के सिखाये मंत्र रात को व प्रभात में बोलता है ताकि सूर्य से उसकी मनोकामना पूरी हो सके।
अकबर ने गायों का जिबह करना व उसका गोश्त खाना बंद करवा दिया था क्योंकि हिंदू उसकी पूजा करते हैं तथा उसके गोबर को भी पवित्र मान उसका सम्मान करते हैं।
बदायूनीं लिखता है कि गुजरात के नवसारी से अग्निपूजक (पारसी) भी आये और उन्होंने दावा किया कि जरथुष्ट्र का धर्म ही वास्तविक धर्म है और अग्नि की पूजा को विशेष सम्मान पर जोर दिया। उसके अनुसार अकबर ने अग्नि के लिए अबुल फजल को प्रभारी बनाया दिया व कहा कि पारस के राजा (फारस-ईरान) की तरह जैसे अग्नि अखंड रूप (अखंड ज्योति) में जलती थी उसी तरह रात दिन जले, कभी न बुझे, क्योंकि यह ईश्वर का एक निशान है और उसके प्रकाशों में एक प्रकाश।
बदायूनीं ने यह भी लिखा है कि शहंशाह का ईसाई धर्म की बातों में भी पूरा विश्वास था, वह उसकी बातों से भी प्रभावित था।उसने शहजादा मुराद को ईसाइयत के कुछ अध्याय पढ़ने के भी आदेश दिए। उसने अबुल फजल को गॉस्पेल का अनुवाद करने को भी कहा। वह आगे यह भी कहता है कि सामान्य रूप से कहे जाने वाले “बिस्मिल्लाह इर रहमान इर रहीम” की जगह कई बार “अई नामी वे गेसू क्रिस्तु” का भी उपयोग होने लगा।
बदायूनीं लिखता है कि युवावस्था से ही अकबर अपनी हिंदू पत्नियों के साथ पूरक के रूप में (पति-पत्नी के जोड़े से) हवन और होम आदि किया करता था।
मुन्तख़ब-उत-तवारीख में जिक्र है कि अकबर सूर्य के कन्याराशि में प्रवेश के अठारह दिन बाद के उत्सव में दीवाने आम में हिंदुओं की तरह ललाट पर तिलक लगाए आया और उसके हाथ में आशीर्वाद स्वरूप ब्राहम्मणों का बाँधा रत्नजड़ित धागा भी था। उसको देख कर उसके दरबार के कुलीनों ने भी उसका अनुसरण किया। कलाई पर राखी बंधवाना आम रिवाज हो गया।
यहाँ बदायुनी एक ऐसी बात भी लिखता है जो सोचने पर मजबूर करती है कि क्या अकबर सचमुच इस्लामिक कट्टरपंथी था या सही अर्थों में सहिष्णु था… बदायूनीं जो अकबर का एक प्रमुख दरबारी था लिखता है कि हमारे धर्म (इस्लाम) के विरोध में जो भी बातें विरोधी धर्म के विद्वानों ने रखीं वह निर्णायक हुईं और उसके अपने धर्म की बातें अर्थहीन हो गयीं।आदि आदि....
अब पोस्ट फिर लंबी हो चली है तो आज बस इतना ही, अगली पोस्ट में ये चर्चा भी होगी कि अकबर का जब रात में विद्वानों से चर्चा करने का मन होता था तो उनको कैसे, किस विचित्र तरीके से चर्चा हेतु बुलाया जाता था।
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