इतिहास और संस्कृति के किस्से-3इब्नबतूता और दिल्ली का दयालु? दानशील, न्यायप्रिय? बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक

इतिहास और संस्कृति के किस्से-3

इब्नबतूता और दिल्ली का दयालु? दानशील, न्यायप्रिय? बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक

आज मैं आपसे बात करूँगा प्रसिद्ध यात्री इब्नबतूता और उसकी भारत यात्रा के एक अनुभव की। इब्नबतूता के अरबी भाषा मे लिखे यात्रा वृतांत ‘रिहला’ की मूल प्रति तो किसी म्यूज़ियम में है और उसके अनेकों भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। मैंने जब इब्न बतूता का अनुवादित यात्रा वृतांत पढ़ा तो इससे उस समय के जीवन को समझने में मदद मिली और बहुत जानकारी भी मिली तथा यह विचार पुख्ता हुआ कि ओरिजिनल सोर्स (अनुवादित ही सही) पढ़ने का मजा ही कुछ और है।
इब्नबतूता मोरक्को देश का रहने वाला था और जीवन पर्यंत वह दुनिया के विभिन्न देशों की यात्रा करता रहा। वह 13वीं शताब्दी में भारत आया और दिल्ली में लगभग 9 वर्षों तक विभिन्न बादशाहों के दरबार में कार्य करता रहा और उस समय के अनुभव उसने बाद में लिपिबद्ध किये जो आज भी भारत के उस काल के शासन प्रणाली आदि के विषय में प्रमाणिक माने जाते हैं, उनसे उस समय की बहुत जानकारी मिलती है और रोचक तो हैं ही।
इब्नबतूता के विवरण से जानकारी मिलती है कि:-
-गंगा नदी को उस समय भी मोक्षदायनी माना जाता था। मृत्यु के उपरांत लोग मृतक की अस्थियां पवित्र गंगाजल में उस समय भी प्रवाहित करते थे।
-उस समय भारत के दिल्ली के सुल्तानों की प्रसिद्धि विद्वानों को बहुत दान देने की थी इसलिए खुरासान, मध्य एशिया और अरब इत्यादि देशों से मुस्लिम लोगों के भारत में प्रवेश करते ही बादशाह को उस समय के नियमानुसार सूचना दी जाती थी और बादशाह द्वारा अनेकों उपहार आदि देकर उनको प्रलोभित किया जाता था जिससे वो लोग भारत में ही रुक जाएं। अलबत्ता इब्नबतूता का कहना है कि उनमें से कुछ  तो ऐसे अयोग्य थे कि उनके अपने देश में यदि वो रहे होते तो शायद भीख मांग रहे होते।
लेकिन ये एक प्रमुख कारण था जिससे शायद उस समय के समस्त इस्लामिक देशों में दिल्ली के बादशाह मुहम्मद तुगलक की दानशीलता की धूम मची हुयी थी।
-किसी को सती होने के लिए बादशाह की अनुमति लेनी होती थी हाँलाँकि ऐसे अधिकांश मामलों में बादशाह हस्तक्षेप नहीं करता था और अनुमति दे ही देता था।
-भारत के रहने वाले लोग अमूमन आने सिर में कडुवा तेल (सरसों का तेल) लगाते थे और ऊसर भूमि की रेत जिसको रेह कहते हैं उससे अपने बालों को धोते थे।
-भोजन बनाने में कोयले का व्यवहार नहीं दिखता बल्कि लकड़ियां जलाकर ही भोजन पकाया जाता था।
-उस समय कोई भी व्यक्ति राजा की आज्ञा के बिना न तो झंडा लेकर चल सकता था और ना ही डंके पर चोट करता हुआ चल सकता था।
-बादशाह के अलावा किसी और के द्वार पर नौबत नहीं बज सकती थी।

इब्नबतूता के विवरण में प्रसिद्ध बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक की काफी विस्तार से चर्चा है। इससे मालूम पड़ता है कि एक तरफ मुहम्मद बिन तुगलक बहुत बड़ा दानवीर और विद्वानों का आदर करने वाला था तो दूसरी तरफ इतना क्रूर भी था कि क्रूरता खुद शर्मा जाए। बादशाह बहुत तर्कशील, मृदुभाषी और सद्व्यवहारी था तो दूसरी ओर अत्यंत क्रोधी और कह सकते हैं सनकी था। एक तरफ इस्लाम के अलावा हिन्दू संतों, योगियों का भी सम्मान करता था तो दूसरी ओर उसने कई मुसलमान विद्वानों का भी वध करवाया।
इब्नबतूता के विवरण के अनुसार बादशाह मुहम्मद तुगलक को लोगों का वध करवाने और उनकी खाल खिंचवा कर उसमें भुस भरवाने का बहुत शौक था। ऐसा कहा जा सकता है कि मुहम्मद तुगलक द्वि-ध्रुवी विकार से ग्रसित एक व्यक्तिव था। उसने कई ऐसे निर्णय लिए जो वक़्त के हिसाब से आगे की सोच के थे और उस समय उसको उन निर्णयों के परिणाम में सफलता हाथ नहीं आयी और अपयश भी मिला।

-जब मुहम्मद बिन तुगलक को अपने ही यहाँ के विद्रोही ऐन-उल-मुल्क से युध्द को जाना पड़ा तो उसने अपनी सेना के सैनिकों के लिए 2 कोड वर्ड बनाये थे। ये थे ‘दिल्ली’ और ‘गजनी’। इब्नबतूता लिखता है कि “हमारी सेना का सैनिक किसी दूसरे सैनिक से मिलता तो ‘दिल्ली’ कहता और उसके उत्तर में दूसरे सैनिक द्वारा ‘गजनी’ न कहने पर शत्रु समझ कर उसका वध कर दिया जाता था।”

-इब्नबतूता कहता है कि बादशाह की सत्कार करने की आदत, प्रजावात्सल्य, और दयाशीलता की आदतों के अलावा उसके व्यक्तित्व का जो दूसरा पहलू था उसमें बादशाह को रूधिर बहाना बहुत पसंद था।शायद ही कोई दिन ऐसा जाता था जब द्वार के सामने किसी व्यक्ति का वध न होता हो।

-एक बार मुहम्मद बिन तुगलक ने दो मौलवियों पर आरोप लगाया कि वह उनके प्रांत के अमीर का धन हड़पना चाहते हैं।मौलवियों ने कहा कि हे अख़बन्द आलम (संसार के प्रभु) हमारे मन में ऐसी कोई बात नहीं है यह हम ईश्वर को साक्षी करके कहते हैं किंतु बादशाह नहीं माना और उनको यंत्रणा देने वाले व्यक्ति शैख़जादह नहाबन्दी के हवाले कर दिया।उसने दोनों मौलवियों को समझाया कि तुम अपना गुनाह कबूल कर लो बादशाह तुम्हारा वध करना चाहता है।गुनाह कबूल करने से यंत्रणा से बच जाओगे पर मौलवियों ने उसकी बात नहीं मानी। इस पर बादशाह ने कहा कि इनको यंत्रणाओं का कुछ सुख दिलवाओ और यह आज्ञा होते ही उनको सीधा लिटा कर उनके वक्षस्थल पर तपते लोहे की शिला रखकर उठा ली गयी जिससे उनकी खाल चिपटी हुयी ऊपर चली आयी। इसके बाद उनके घावों पर मूत्र मिश्रित राख डाल दी गयी। इसके बाद मौलवियों ने अपनी गलती स्वीकारी कि बादशाह जो कह रहे हैं वही सही है उनको सही पता है कि हमारे मन में क्या था। हम गुनाहगार हैं और वध करने योग्य हैं। इस पर दयालु और न्यायप्रिय बादशाह को उन पर दया आ गयी और उसने उनको आगे कोई तकलीफ दिए बिना तुरंत उनका वध करवा दिया।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि मुहम्मद बिन तुगलक को अरबी, फारसी, हिन्दवी/उर्दू जैसी, संस्कृत आदि भाषाओं का ज्ञान था।
वह ग्रीक तर्कशास्त्र और दर्शन की जानकारी भी रखता था।

-मुहम्मद तुग़लक़ मुस्लिम शासक होने के बावजूद हिन्दू धर्म के प्रति सहनशील भी था।
उसने अपने दरबार मे होली खेलना शुरू किया और यह करने वाला दिल्ली का वह पहला मुस्लिम शासक था। 

आशा है आपको इतिहास और संस्कृति से सम्बंधित यह किस्से पसंद आ रहे होंगे। अगली कड़ी में आपसे जिक्र करूँगा इब्नबतूता, दिल्ली के बादशाह मुहम्मद-बिन-तुगलक और दिल्ली के दो योगियों के अद्भुत किस्से का जो आपस में गुरु और शिष्य भी थे।

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