इतिहास और संस्कृति के किस्से-8
इतिहास और संस्कृति के किस्से-8
आज चर्चा पुराणों के अनुसार पार्जिटर की इतिहास संजोने की कोशिश की।
पुराणों में लिखी वंशावलियों और परंपराओं का अध्ययन करना एक बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक कार्य है। पार्जिटर महोदय ने जन सारे तथ्यों को गहरी रिसर्च करके बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से लिखा है।
पुराणों में मत्स्य पुराण और वायु पुराण दोनों पौरव (या हेला) वंश की वंशावली को पांडवों से अभिमन्यु, परीक्षित और जनमेजय तक लाते हैं। आगे ये पुराण इस वंशावली को राजा अधिसीम कृष्ण तक निरन्तर रखते हैं और बताते हैं कि इस राजा के समय में 12 वर्ष का यज्ञ किया गया और इसी समय में पुराणों को गेय रूप मिला या गाया गया (कह सकते हैं कि रूप मिलना शुरू हुआ)। ये वही काल है जब ऋषिगण ने ‘सूत’ लोगों को कलिकाल का पूर्ण विवरण देने को कहा। इसके आगे राजाओं के नाम, उनमें वंश और शासनावधि कि चर्चा है। विस्तृत विवरण में न जाकर हम देखें तो पता चलता है कि इनमें निम्नलिखित प्रमुख राजवंशों, उनके राजाओं और शासनावधि का विवरण है:-
1.पौरव राजवंश (अभिमन्यु से वंशावली शुरू है और परीक्षित से होते हुए 29 राजाओं के नाम हैं)।
2.इक्ष्वाकु वंश (बृहद बल से शुरू होकर इसमें भी 29 राजाओं के नाम हैं जो सुमित्र तक जाते हैं)। इसके लिए ‘सूर्यवंश’ का सम्बोधन भी आता है। इस वंशावली का जिक्र रामायण में दो बार किया गया है। यहाँ उल्लेखनीय है कि रामायण की सूची में भगवान ‘राम’ तक 35 राजाओं के नाम हैं जबकि पुराण इस अवधि में 63 राजाओं के नाम बताते हैं। (पुस्तक:-Ancient Indian Historical Tradition by Judge F.E.Pargiter ICS प्राचीन भारत की ऐतिहासिक अनुश्रुति और दूसरी किताब The Purana Text of the Dynasties of the Kali Age कलिकाल में राजवंश और राजाओं की वंशावलियाँ अनुवाद और भूमिका मुन्नालाल डाकोत और डॉ0 श्रीकृष्ण ‘जुगनू’)
3.बार्हद्रथ गण (यह साम्राज्य वसु वैदयो परिचर के पुत्र वृहद्रथ द्वारा स्थापित किया गया।उसने और उसके नौ वंशजों ने महाभारत युद्ध के होने से पूर्व तक राज्य किया। इसके कुल 32 राजाओं का विवरण है 10 महायुद्ध के पहले और 12 युद्ध के बाद।
4.प्रद्योत गण कुल 138 वर्ष की सत्ता
5.शिशुनाग साम्राज्य ( 360 वर्ष 10 राजा)
6.इस शीर्षक में पुराणों के अनुसार पार्जिटर ने समकालीन अन्य कुछ राजाओं (राजवंशों) की चर्चा की है जो 24 इक्ष्वाकु,27 पांचाल,24 काशी के,28 हैहय,32 कलिंग,25 अश्मक,36 कुरु (पौरव),28 मैथिल गण, 23 शूरसेन गण, और 20 वीति होत्र गण हैं।इसके बाद जिक्र है कि महानन्दिन की शूद्रा से उत्पन्न संतान राजा का और महापद्म (नंद) का जो सभी क्षत्रियों को राज्यच्युत कर देगा।वह पूर्ण सम्राट हुआ और उसने सभी को अपने शासनाधीन किया। उसने 88 वर्ष तक धरा का उपभोग किया।उसके आठ पुत्र हुए जिनमें पहला सुकल्प था और महापद्म उत्तरोत्तर 12 वर्ष तक राजा रहे। एक ब्राह्मण कौटिल्य ने इस राजसत्ता को निर्मूल किया। 100 वर्षों के भोग के बाद यह राजसत्ता मौर्यों के पास चली जायेगी या चली गयी।
पोस्ट लंबी होजाने के कारण इसके आगे की वंशावलियों का विवरण आज नहीं लिख रहा हूँ लेकिन इस को पढ़ने पर ये बात काफी कुछ स्पष्ट होती है कि हमारे यहाँ प्राचीन काल के इतिहास के बहुत सारे प्रमाण मौजूद हैं बस अभी उन पर वैज्ञानिक तरीके से काम होना बाकी है। आगे चल कर ये भी चर्चा करेंगे कि पुराणों के मुख्य विषय क्या थे, पुरानी परंपराएं और सोलह चक्रवर्ती सम्राट ‘षोडश- राज्ञीक’ कौन थे? आदि
यहाँ मैं यह अवश्य कहना चाहूँगा कि इन पुस्तकों के पढ़ने से प्राचीन इतिहास, हमारी संस्कृति और परंपराओं के विषय में बहुत अद्भुत जानकारी मिली है और इसके लिए आदरणीय हेरम्ब भाईसाहब Heramb Chaturvedi जी को फिर से धन्यवाद देना तो बनता ही है साथ ही श्रीकृष्ण जुगनू Shri Krishan Jugnu जी और मुन्नालाल डाकोत जी को भी।
हमारे ग्रंथो में हमारा पूरा इतिहास सम्भवतः मौजूद है लेकिन चूंकि वह कहीं उत्खनन आदि किसी अन्य चीज से सम्पुष्ट नहीं होता जिस कारण से उनकी गणना मिथक रूप में होती है। हमको इस विषय में इजिप्ट (मिस्र), इंडोनेशिया (जहाँ देश के इतिहास/परंपराओं का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है) जैसे देशों से प्रेरणा लेनी चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि देश में उत्खनन और ऐतिहासिक तथ्यों के ऊपर वैज्ञानिक प्रक्रिया और दृष्टिकोण से कार्य किया जाए।
यदि आप लोगों को प्राचीन काल का यह विवरण और लेख रोचक लगा हो तो बताइएगा तो फिर मैं इसका और विवरण आगे प्रस्तुत करूंगा।
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