इतिहास और संस्कृति के किस्से-9 बैरमखाँ और अब्दुर्रहीम खानखाना
इतिहास और संस्कृति के किस्से-9
आज चर्चा करेंगे बैरमखान और उनके पुत्र प्रसिद्ध कवि और अकबर के दरबार के बड़े सरदार अब्दुर्रहीम खानखाना की।
इनके विषय में मुंशी देवी प्रसाद ने लिखा है। मुंशी देवीप्रसाद के पूर्वज मूलतः दिल्ली के थे लेकिन मुगल सल्तनत के ढलान के साथ वो लोग भोपाल होते हुए टोंक राजस्थान आये और मुंशी देवी प्रसाद जोधपुर, में सन 1871 में जोधपुर के तब के रीजेंट महाराजा सर प्रताप सिंह के यहाँ नायब सरिश्तेदार की नौकरी करने लगे। उन्होंने ‘खानखाना नामा’ नामक प्रसिद्ध ग्रन्घ लिखा और इसके अतिरिक्त भी मारवाड़, सिरोही आदि रियासतों का इतिहास लिखा और फारसी के कुछ ग्रंथ भी अनूदित किये।
खानखाना नामा बैरम खां और उसके पुत्र अब्दुर्रहीम खानखाना के विषय में है। इस ग्रंथ को मूल सोर्स जैसा ग्रंथ नहीं कहा जायेगा लेकिन फिर भी इसमें बहुत अच्छी रोचक जानकारी मिलती हैं। मुंशी देवी प्रसाद ने इसको लिखने में ‘मअ सिर-उल-उमरा’ नामक ग्रंथ की भी मदद ली है।
मुंशी देवीप्रसाद लिखते हैं कि ‘मअ सिर-उल-उमरा’ में बैरम खां की जाति तुर्कमान बताई गई है और खानदान का नाम “कराकूयालू” लिखा है। तुर्कमान का अर्थ है तुर्कों की मानिंद या तुर्कों की तरह। उस समय ईरान में जन्मे(जो लोग तुर्किस्तान से आकर ईरान में बस गए थे उनकी सन्तानों को) तुर्कों को तुर्कमान कहते थे। “कराकूयलू” के मायने हैं काली बकरी वाले। ये लोग पहले काली बकरियां रखा करते थे और इनके भाई बंधु जो सफेद बकरियां रखते थे वह “आककूयलू” कहलाते थे। तुर्की बोली में ‘करा’ का अर्थ काला, ‘आक’ का अर्थ सफेद, ‘कूय’ का अर्थ बकरी और ‘लू’ का अर्थ ‘वाले’ है। यह सब पढ़ कर फिर लगता है कि काश मुझको भी फारसी और तुर्की भाषा आती तो मैं मूल ग्रंथ पढ़ सकता। इस सीरीज में आगे किसी दिन जब हैनरी बेवरिज अनूदित अकबरनामा की चर्चा करेंगे तब बताऊँगा कि मूल सोर्स की भाषा नहीं जानने से कितना कंफ्यूजन अर्थ में हो सकता है।
कराकूयलू की एक शाखा बहारलू भी थी जिसमें बैरमखान का जन्म हुआ था।
तुर्की भाषा में बेग का मतलब है सरदार और खान के मायने हैं बादशाह। बाबर तक मुगल लोग भी खान नहीं कहलाते थे चाहे उनके खानदान में तैमूर बादशाह बन चुका था। लेकिन बाबर, हुमायूँ तक ये लोग “मिरजा” कहलाते थे जो दरअसल ‘अमीरजा (अमीर का बेटा)’ शब्द है। तैमूर का खिताब ‘अमीर’ था और इसलिए उसके बेटे अमीरजा-मीरजा-मिरजा कहलाते थे।
“जब बाबर ने बादशाह का खिताब अपने लिए तजवीज किया तब दो पीढ़ी पीछे अकबर के समय में उसके बेटे शहजादे, शाह और सुल्तान कहलाने लगे और ‘मिरजा’ का खिताब बड़े अमीरों के लिए छोड़ दिया गया।”
ये बैरम खान ही था जिसको जब हुमायूँ बादशाह के मरने की खबर मिली तो वह लगभग 12 वर्ष के शहजादे अकबर अपने साथ कलानूर में ले आया और वहाँ अकबर को यह खबर बताई तथा अकबर का राज्याभिषेक कराया।
एक बहुत रोचक बात यह पढ़ने को मिली कि जब हुमायूँ शेरशाह से लड़ाई में हारकर ईरान गया तो वहाँ के शाह तहमास्प सफ़वी ने उससे कहा था कि आपने हिंदुस्तान के स्थानीय जमीन्दारों से रिश्तेदारियां नहीं कीं और अजनबी से बने रहे, अर्थात लोग आपको बाहर का समझते रहे इसी कारण से आपके पैर नहीं जमे। अब जो फिर वहाँ की बादशाही हाथ में आये तो दो काम जरूर करना। एक तो पठानों को जहाँ तक बने हुकूमत से अलग करके व्यापार में लगाना और दूसरे वहाँ के राजाओं और जमीन्दारों से रिश्तेदारी करना;इससे आपका राज्य बना रहेगा। हम बाद में मुगल बादशाहों को ऐसा करता हुआ देखते भी हैं।
बैरम खान की हत्या के बाद अब्दुर्रहीम खानखाना को अकबर ने अपने पास बुलाया और उसके बेहतरीन पालनपोषण की व्यवस्था की। आगे चलकर अब्दुर्रहीम को भी खानखाना का ओहदा मिला और उनकी कवि के रूप की प्रसिद्धि से हम वाकिफ हैं ही। रहीम की दानशीलता के किस्से भी सारे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध हैं।
अकबर के बाद जहाँगीर के समय में भी रहीम का रुतबा बरकरार रहा परन्तु जब शाहजहाँ और जहाँगीर में दूरियाँ बढ़ी तो अब्दुर्रहीम खानखाना शाहजहाँ के साथ थे और इसका एक बड़ा कारण था कि उनकी पोती शाहनवाज खां की बेटी उसको ब्याही हुयी थी।
इसका परिणाम था कि बादशाह जहाँगीर ने अब्दुर्रहीम खानखाना को नमकहराम लिखा है और उसके लिए इन शब्दों का प्रयोग किया:- “ जबकि खानखाना जैसा अमीर जो अतालीकी के ऊँचे पद को पहुँचा हुआ था, 70 वर्ष की अवस्था में अपना मुँह नमकहरामी से काला कर ले तो दूसरों से क्या गिला है। मानो शरीर ही नमकहरामी से बना था। उसके बाप ने भी अंतिम अवस्था में मेरे बाप से ऐसा ही बर्ताब किया था। सो ये भी उस उमर में बाप का अनुगामी होकर हमेशा के लिए कलंकी हुआ। भेड़िए का बच्चा आदमियों में बड़ा होकर भी अंत को भेड़िया ही होता है।”
अब्दुर्रहीम खानखाना के बहुत किस्से हैं किंतु आज की यह पोस्ट इस आखिरी बात के साथ खत्म कर रहा हूँ कि मुंशी देवीप्रसाद लिखते हैं कि, “ग्रंथकर्ता (‘मअ सिर-उल-उमरा’) ने लिखा है कि पहले (हिंदुस्तान में) खरबूजा नहीं होता था।सबसे पहले खानखाना ने ईरान और खुरासान से बीज मंगवाकर गुजरात के गांव बलकवाड़े में बुयाये। 2/3 वर्ष में ही ऐसे अच्छे खरबूजे निपजने लगे जो उलायत (विलायत) की बराबरी करते थे।”
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