इतिहास और संस्कृति के किस्से-5

इतिहास और संस्कृति के किस्से-5

मिर्ज़ा कामरान को अंधा किया जाने का आँखों देखा हाल

आज मैं आपसे शेयर कर रहा हूँ मुगल बादशाह हुमायूँ के सेवक जौहर आफ़ताबची द्वारा लिखी पुस्तक “तज़किरातुल वाक़िआत” से एक प्रसंग।
पहले तज़किरातुल वाक़िआत और जौहर आफ़ताबची के विषय में बता दूँ; तज़किरातुल वाक़िआत जौहर आफ़ताबची के उन संस्मरणों का संग्रह है जो हुमायूँ से सम्बंधित हैं तथा सम्राट अकबर के आदेशानुसार जौहर ने हुमायूँ के मरने के तीन दशक के बाद फारसी भाषा में लिखे। जौहर आफ़ताबची जैसा कि नाम से पता चलता है कि हुमायूँ का आफ़ताबची अर्थात पानी का लोटा उठाने वाला था। बादशाह के प्रयोग में आने वाली हर तरल (liquid) वस्तु की व्यवस्था करना उसकी जिम्मेदारी थी फिर वो पीने का पानी हो, वुजू करने या नहाने को पानी हो या कोई और पेय पदार्थ उसकी व्यवस्था करना आफ़ताबची का कर्तव्य था। इसके लिए उसको हर समय सोते-जागते, दरबार हो या यात्रा, युद्ध हो या शांति हर समय बादशाह के साथ उसको रहना ही होता था। इसलिए वह हर समय बादशाह के साथ रहता था, उसका अत्यधिक विश्वासपात्र था, अत्यंत घनिष्ट और वफादार भी था। जौहर हुमायूँ के साथ हर समय रहा चाहे जब वो हिंदुस्तान में था या हारने के बाद हिंदुस्तान के बाहर और फिर से हिंदुस्तान में। इसी कारण से जौहर आफ़ताबची का विवरण सही (authentic) तो है ही साथ ही बहुत रोचक भी है। अब आते हैं इस सीरीज के आज के किस्से पर।
यह किस्सा है हुमायूँ के छोटे भाई मिर्ज़ा कामरान के बार-बार विद्रोह करने पर जब अंततः हुमायूँ ने उसको अंधा करने का आदेश दिया है तो उसको अंधा किये जाने के वक़्त का एक प्रकार से आँखों देखा हाल है ये। पढ़कर मन खराब होगा, रूह भी काँप सकती है और ये सोचने पर मजबूर भी होंगे कि सत्ता न जाने क्या-क्या कराती आयी है और सच्चाई ये भी है कि दरअसल सत्ता का रूप सदैव से ऐसा ही रहा है बस तरीके बदल जाते हैं, कभी पराजित शत्रु की आँख जाती है तो कभी फाँसी होती है, कभी नरसंहार होता है तो कभी बमों और मिसाइलों की मार। इसमें कौन सही है और कौन गलत था ये मत सोचिएगा क्योंकि हर किसी का अपना नजरिया, अपना स्वार्थ, अपने हित और अपना भाग्य था। इसके अलावा सबसे बड़ी बात “सत्ता बहुत ही निर्मम और निष्ठुर होती है।” जंगल में जो मार देता है वही जीवित रहा है पर अफसोस की बात है कि मनुष्य भी जंगल के बाशिंदों जैसा व्यवहार करने लगता है सत्ता और स्वार्थ के लिए।
यह घटनाक्रम उस समय का है जब हुमायूँ बादशाह के छोटे भाई मिर्ज़ा कामरान (जो कि कई बार हुमायूँ के विरूद्ध विद्रोह आदि कर चुका था) को सुल्तान आदम ने पकड़ कर हुमायूँ के हवाले कर दिया था। 
बादशाह के आदेश से जौहर आफ़ताबची, खंजर बेग, आरिफ बेग, अली दोस्त तथा सैय्यद मोहम्मदी बेकना मिर्ज़ा कामरान के डेरे में गए।
मिर्ज़ा कामरान ने जौहर आफ़ताबची से पूछा कि, “ए दास! तेरा नाम क्या है?
जौहर आफ़ताबची लिखता है कि, “मैंने उत्तर दिया कि सेवक का नाम जौहर है।”
कामरान ने पूछा, “तू सेवा करना जानता है?”
सेवक जौहर ने जवाब दिया, “ हाँ, अपने सामर्थ्य के अनुसार।”
 फिर पूछा गया – "क्या तू मिर्ज़ा असकरी की सेवा में भी रहा?"
 जौहर ने कहा – "नहीं।"
 जलाल नाम का एक दास उसके साथ था।
कामरान ने जौहर से कहा – "60 हिजरी में हमारे रोजे छूट गये थे। तू हमारी ओर से रोजा रख सकता है?"
 तुच्छ जोहर ने कहा – "हाँ, लेकिन मिर्ज़ा को अपने रोज़े खुद रखने चाहिए।"
फिर मिर्ज़ा कामरान ने पूछा – "यदि मुझको मार दिया जाये तो?"
 जौहर ने उत्तर दिया– "कोई व्यक्ति अपने हाथ को आप नहीं तोड़ता। हज़रत बादशाह हुमायूँ तो अत्यंत सहनशील और ध्यान रखने वाले हैं।”
अगले दिन हिंदुस्तान की ओर कूच किया जा रहा था और बादशाह मिर्ज़ा कामरान को अंधा करने का हुक्म देकर प्रस्थान कर गया।
बादशाह तो चला गया लेकिन कोई भी यह काम करने को तैयार नहीं था। सुल्तान अली बख्शी ने अली दोस्त ईशक आका खां से कहा, “तू नश्तर मार।”
अली दोस्त ने उत्तर दिया कि, "हज़रत बादशाह के आदेश के बिना केवल तेरे कहने से यह कार्य कैसे कर सकता हूँ? कल अगर हज़रत बादशाह ने प्रश्न किया कि यह काम तूने क्यों किया और हमारे भाई को अंधा और बेकार कर दिया, तो क्या मैं उस समय यह उत्तर दूँगा कि सुलतान अली ने कहा था? यह मुझसे नहीं हो सकता।"
सब आपस में यही चर्चा करने लगे क्योंकि उनमें से कोई भी इस कार्य को करने की मंशा नहीं रखता था।
 जोहर  ने कहा –
 "मैं जाकर बादशाह को इसकी सूचना देता हूँ।"
अली दोस्त ने भी तुर्की भाषा में बादशाह से याचना की –
 "ऐ बादशाह! आज्ञाकारी होते हुए भी कोई व्यक्ति यह कार्य नहीं करना चाहता।"
हज़रत बादशाह ने तुर्की भाषा में ही गाली देकर फरमाया –
 "तुझको क्या हो गया है? तू मेरा आदेश क्यों नहीं मानता? यह आदेश है कि मिर्ज़ा कामरान की आँखों पर चाकू चलाया जाये।"
मिर्ज़ा कामरान के पास पहुँच कर गुलाम अली ने मिर्ज़ा को बादशाह का आदेश सुनाया।
मिर्ज़ा ने यह सुना तो कहा –
 "मुझे मार डालो।"
गुलाम अली ने उत्तर दिया –
 "हे स्वामी! आपको कौन मार सकता है?"
अब आदेश का पालन करने की तैयारी हुई।
उनके हाथ में एक रूमाल था उसका गोला बनाया था उस फ़र्राश ने जिसने मिर्ज़ा को पकड़ने को हाथ बढ़ाया था। मिर्ज़ा के मुँह में रूमाल ठूंस दिया गया। उसके बाद मिर्ज़ा के हाथ को पकड़कर तंबू से बाहर लाया गया और ज़मीन पर लिटा दिया गया।
फिर उसकी आँखों पर चाकू लगाया गया। जौहर आफ़ताबची लिखता है कि मिर्ज़ा कामरान की आंखों पर पचास नश्तर मारे गए परंतु उस वीर पुरुष (मिर्ज़ा कामरान ) ने दम भी न मारा, उफ भी न की।
 उस समय एक बलवान पुरुष (कामरान को काबू में करने के लिए) उसकी जाँघों पर बैठ गया।
 मिर्ज़ा ने उससे कहा –
 "तू मेरी जाँघों पर क्यों बैठा है? जब तक तुम लोग संतुष्ट न हो जाओगे, मुझे नहीं छोड़ोगे।"
इसके बाद उसकी आँखें फोड़ दी गईं। कर्दी बेवादार ने उसकी आँखों में नमक डाला।
उस असहनीय पीड़ा में मिर्ज़ा ने भगवान का नाम लिया और कहा –
 "हे भगवान! संसार में जो कुछ मैंने किया, उसका दंड मुझे मिल गया। किंतु उस संसार (परलोक) में मैं तेरी क्षमा का प्रार्थी हूँ।"
इसके बाद मिर्ज़ा को घोड़े पर बैठाकर सेना स्थल पर लाया गया।
आज बस इतना ही बाकी अगली पोस्ट में मिलेंगे original source (अनुवादित) से पढ़े एक और किस्से के साथ।

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