शिर्डी, नासिक, श्री त्रयंबकेश्वर और पंचवटी यात्रा 28,29 और 30 जुलाई 2025
अभी हाल ही में नासिक जाने का संयोग बना तो पहले दिल्ली से शाम को लगभग 4 बजे शिरडी पहुँचे और वहाँ सीधे श्री साईं बाबा के मंदिर जाना हुआ। मैंने कभी शिरडी जाने का न सोचा था और न कभी प्लान ही किया था किंतु अचानक ये प्रोग्राम बना और ऐसा बना कि सबसे पहले शिरडी जाना हुआ। मंदिर पहुँचने पर भी लग रहा था कि इतनी भीड़ होती है वहाँ और उस दिन तो सावन माह का सोमवार भी था। मैंने अपने और पत्नी के लिए पास तो ऑनलाइन बनवा लिया था किंतु वहाँ के दुकानदार ने हमको सीनियर सिटीज़न वाली एंट्री पर ले जाकर खड़ा कर दिया। मालूम नहीं क्या हुआ मुझको तो लगा कि साईं बाबा का आशीर्वाद ही था कि हम लोगों को सिक्योरिटी वाले रास्ता बताते गए और मुश्किल से 5-7 मिनट में हम हॉल में साईं बाबा की मूर्ति के सामने उनका आशीर्वाद ले रहे थे जबकि लाइन में दर्शनार्थियों की अपार भीड़ थी।
इसके बाद हमारा टैक्सी वाला जिसका नाम गणेश था हमको नासिक की तरफ ले गया। रास्ते में एक स्थान पर रुकना हुआ जहाँ हमने बहुत अच्छी भेलपूरी खायी और बढ़िया गरमागरम चाय पी।
हमारा रुकने का नासिक और श्री त्रयंबकेश्वर के बीच ग्रेप काउंटी रिसोर्ट में था जो एक बेहद ख़ूबसूरत स्थान है। वहाँ पहुँचने के रास्ते में नासिक में रहने वाले श्री संजय चतुर्वेदी से बात हो गयी थी और रात का खाना ग्रेप काउंटी रिसोर्ट में साथ खाना भी तय हो गया। होटल में पहुँचे तो हल्की रिमझिम बारिश हो रही थी और मौसम बहुत खुशगवार था। कुछ देर में हम लोगों ने होटल के डाइनिंग हॉल में जाकर डिनर ऑर्डर किया और थोड़ी देर में ही संजय भाई भी वहीं आ गए। होटल के डाइनिंग हॉल की टैरेस से बाहर का दृश्य बहुत ही शानदार था।संजय चतुर्वेदी जी को मैंने अपनी पुस्तक “सियाहत मेरी स्याही से” भी भेंट की।
सुबह 4 बजे उठ कर शीघ्र ही तैयार हो कर पौने छै बजे तक हम लोग कार से त्रयंबकेश्वर को निकल लिए। सूर्योदय का समय था, हल्की-हल्की रिमझिम बारिश थी और सह्याद्रि पहाड़ियों का दृश्य ऐसा था कि बस उसी को देखते रहो। रास्ते में हमारे ड्राइवर गणेश ने बताया कि बाएं हाथ पर जो एक सुंदर सी पहाड़ी दिख रही है उस स्थान को आंजनीरा या अंजनीरा कहते हैं और एक मान्यता के अनुसार हनुमान जी का जन्म वहीं हुआ था। गणेश ने बताया कि वहाँ ऊपर जाकर अंजना माई का मंदिर भी है। हमने भी मन ही मन माँ अंजना और अपने इष्टदेव आंजनेय हनुमान जी को प्रणाम किया और गंतव्य त्रयंबकेश्वर की ओर बढ़ चले।
त्रयम्बकेश्वर जिसको वहाँ के लोग त्रम्बक कहते हैं में बाहर की गाड़ियां शहर में जाने की रोक थी तो उस स्थान से हमने एक ऑटो पकड़ा और मंदिर के पास पंडित जी के पहुँच गए। पंडित जी ने कहा कि पहले पास के कुशावर्त कुंड में हाथ मुँह धो आइए। त्रयंबकेश्वर के इस कुशावर्त कुंड का और इसमें जल आचमन/ स्नान करने का पुराणों में भी बहुत महत्व बताया गया है। वहाँ पहुँच कर रचना ने हाथ मुँह धोए और मैं बहुत से लोगों को नहाते देख खुद भी कुंड में डुबकी लगाने के लोभ का संवरण नहीं कर सका हाँलाँकि वहाँ उस समय बारिश हो रही थी जिससे पत्थरों पर फिसलन थी, नाग पंचमी का दिन होने के कारण अपार भीड़ भी थी पर फिर भी स्नान के बाद मन अच्छा हुआ। वहाँ पर ही एक मंदिर में स्थित शिवलिंग पर हमने पुष्प और दूध चढ़ाया हाँलाँकि पुजारी जी ने कहा कि भाई ये दूध सब कैमिकल का आ रहा है इसलिए ज्यादा मत चढ़ाओ। कैमिकल के दूध और मिलावट के विषय पर फिर कभी अलग से चर्चा करूंगा।
यहाँ से स्नान आदि करके और पंडित जी के पूजा करके फिर हमने श्री त्रयंबकेश्वर जी के दर्शन की इच्छा पंडित जी से जाहिर की। पहले तो उन्होंने बहुत ना-नुकुर की कि वो लोग दर्शन नहीं कराते पर अंततः हमारे अनुरोध को वह मान गए और उनके साथ जाकर हमने दर्शन किये जिसमें 10 मिनट का भी समय नहीं लगा ऐसी बाबा त्रयंबकेश्वर जी की कृपा हुयी अन्यथा ऑनलाइन पास वालों की लाइन में उस समय भी लगभग डेढ़ हजार से ज्यादा लोग दिख रहे थे।
दर्शन पूजा आदि करके हम लोग अपने होटल लौटे। वहाँ हम लोगों ने कुछ जलपान आदि किया, फिर रिसोर्ट की गोल्फकार्ट में बैठ कर वहाँ की एक राइड ली और पूरा रिसोर्ट घूमा। नासिक के बाहरी हिस्से में बना यह ग्रेप काउंटी रिसोर्ट एक बहुत अच्छी तरह से डिवेलप की हुई प्रोपर्टी लगी जिसमें पर्यटकों हेतु बोटिंग, हॉर्स राइडिंग आदि अनेकों सुविधाएं हैं। पहाड़ियों के बीच खूब हरियाली से आच्छादित यह रिसोर्ट वाकई बहुत मनोरम स्थल लगा।
इसके बाद होटल/रिसोर्ट से चैक आउट करके हमने अपने ड्राइवर गणेश से कहा कि भाई 1 बज रहा है और हमारी ट्रेन 6:20 पर है तो उस बीच हमको पंचवटी तथा नासिक के कुछ अन्य दर्शनीय स्थल दिखा दो।
ड्राइवर सबसे पहले हमको गोदावरी नदी के तट पर ले गया जहाँ थोड़ी देर बैठे और जल का आचमन भी किया। यहाँ बैठे हुए मुझको अपनी माँ की बहुत याद आयी जो बचपन में हमको नहलाते हुए जब हमारे ऊपर पानी डालतीं तो कहती जातीं “गंगे-गंगे गोदावरी, पाप काटे देवेश्वरी।”
इसके बाद ड्राइवर हमको पंचवटी स्थित सीता गुफा ले गया जहाँ बहुत भीड़ तथा लंबी लाइन थी तो हमने बाहर से ही दर्शन किये।
इसके बाद हम तपोवन गए जहाँ एक तो भगवान राम की अत्यंत विशाल 121 फिट ऊँची मूर्ति के दर्शन किये। वहीं पास में ही वह स्थान है जहाँ बताते हैं कि लक्ष्मण जी ने सूर्पनखा की नाक काटी थी, वहाँ लक्ष्मण जी का एक मंदिर भी बना हुआ है जिनके दर्शन हमने किये। हम सभी लोग बचपन से भगवान राम की कथाओं को पढ़ते-सुनते आए हैं और उनमें वर्णित एक ऐसे स्थल को देखना जहाँ भगवान राम ने बहुत समय ही नहीं व्यतीत किया अपितु उनसे जुड़ी बहुत सी घटनाओं का वह स्थल गवाह रहा होगा यह सोच कर ही हमारा मन पुलकित हो जा रहा था। मैं सोच रहा था कि यही वह स्थल है जहाँ कहीं भगवान राम ने अपनी पर्णकुटी बनाई होगी जहाँ वो माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ रहे होंगे। यहीं कहीं सूर्पनखा का किस्सा हुआ होगा, कैसे उसकी लक्ष्मण जी से कहा-सुनी हुयी होगी और कैसे उसकी नाक काटी गई होगी… यहीं सीता जी ने रामचन्द्र जी से स्वर्णमृग लाने की जिद की होगी आदि। इस स्थल पर कभी भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के चरण पडते रहे होंगे यह सोचना ही मन को रोमांचित करने को काफी था।
तपोवन स्थल पर ही थोड़ा आगे “गोदावरी और कपिला” नदी का संगम स्थल था जो देखा और यहाँ पर जाकर इलाहाबाद के “गंगा-यमुना-सरस्वती” के त्रिवेणी संगम की याद न आये भला ये कैसे सम्भव था।
इसके बाद हम नासिक के प्रसिद्ध मुक्तिधाम मंदिर को देखने गए जो इलाहाबाद के सिविल लाइंस वाले हनुमान मंदिर और गोरखपुर के बाबा गोरखनाथ मंदिर की तर्ज पर बना हुआ लगा। यह मंदिर काफी अच्छा था परंतु मुझको लगा कि इलाहाबाद वाला मंदिर ज्यादा भव्य बना हुआ है।
नासिक शहर बहुत बड़ा और फैला हुआ है जहाँ मुझको लगभग सभी बड़े ब्रांडों के शो रूम भी बाजारों में नजर आए और हरियाली भी खूब दिखी किंतु साथ ही यह भी महसूस हुआ कि वहाँ शहर में रौनक की कमी थी, सफाई की कमी दिखी और जिसको कहा जाए तो ओवरऑल अम्बियेन्स में कुछ कमी खटक रही थी। हमारे फिरोजाबाद में ही आप प्रवेश करें तो अब चौड़ी साफ सड़कें और रात को रोशनी से सुंदर दिखता है, आगरा, नोएडा, लखनऊ या इलाहाबाद की ख़ूबसूरती तो और अधिक है तो उस मापदंड से नासिक पीछे लगा।
हमारी यह तीर्थयात्रा जिसमें पर्यटन भी हो रहा था अब समाप्ति की ओर थी तो एक स्थान पर हमने महाराष्ट्र की प्रसिद्ध “दाबेली” खाई जो गुजरात और महाराष्ट्र का एक लोकप्रिय व्यंजन है। यह व्यंजन दिखने में बर्गर जैसा लगता है जिसमें पाव के बीच में भेलपूरी जैसी होती है लेकिन इसका स्वाद खट्टा, मीठा, तीखा और नमकीन हैं। कहते हैं कि इसका उद्गम गुजरात के कच्छ जिले में हुआ था। दाबेली और चाय का सेवन करके हम नासिक रोड स्टेशन पहुँच गए जहाँ संजय चतुर्वेदी जी हमको विदा करने आ गए थे। ट्रेन में भी हमको कोच अटेंडेंट के रूप में एक इटावा और एक फरुक्खाबाद के कर्मचारी मिले जो विशेष खातिर करते हुए लाये। सुबह कोच में एक शानदार कुत्ता जिसकी नस्ल “रामपुर हाउंड” की थी दिखा जो भारतीय सेना के लिए ट्रेंड होकर जा रहा था। हमारा रिज़र्वेशन दिल्ली हज़रत निज़ामुद्दीन तक का था किंतु हम आगरा कैंट उतर कर टैक्सी लेकर फिरोजाबाद आ गए, इस प्रकार हमारी यह आनन्ददायक तीर्थयात्रा और पर्यटन यात्रा पूरी हुयी।
मेरा इस यात्रा के अनुभव को शेयर करने का एक विशेष कारण यह भी है कि मुझको इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा ही नहीं था कि नासिक और उसके आसपास सह्याद्रि पहाड़ियों के यह स्थल इतने मनोरम हैं जो वाकई में घूमने लायक शानदार जगह हैं।
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