चिट्ठी भैया को मिले, आगरा

"चिट्ठी भैया को मिले
आगरा"

भारतीय डाक विभाग ने अपनी एक प्रमुख सेवा रजिस्टर्ड पोस्ट को बंद कर दिया है।
यह सेवा पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से उपयोग में थी और इसे भरोसेमंद, किफायती और कानूनी रूप से मान्य सेवा के रूप में जाना जाता था।
इस समाचार को देख कर डाक विभाग से जुड़ा एक पुराना किस्सा याद आ गया। बात 1900 के दशक की है यानी ईस्वी सन 1900 से 1910 के बीच की कभी की। यह किस्सा मुझको मेरे बाबा स्व0 सुशील चन्द्र जी ने अनेकों बार सुनाया था। उस समय हमारे बाबा और उनके बड़े भाई स्व0 सुरेश चंद्र जी (जज साहब) आगरा में अपनी माँ के साथ रह कर पढ़ाई कर रहे थे। 
हम लोग मूलतः फिरोजाबाद के रहने वाले हैं परन्तु रीवा राज्य से हम लोगों का सन 1880/90 के दशक से निकट का सम्बंध रहा है और हमारे परिवारीजन तभी से रीवा में भी रहते आये हैं। हमारे बाबा के चाचा स्व0 रोशन लाल चतुर्वेदी जिनको उनकी हष्ट-पुष्ट काया के कारण परिवार में भीम चच्चा के नाम से जाना जाता था (वह 1000 चक्र-दंड रोज करते थे) और जो रीवा राज्य में एक उच्च पद पर आसीन थे, उनकी पुत्री यानी बाबा की छोटी बहन सरस्वती बुआजी उस समय रीवा में थीं और बहुत छोटी उम्र की थीं। सरस्वती बुआजी ने बाबा को एक पत्र लिखा जिस पर उन्होंने पता लिखा, “भैया को मिले, आगरा”, बस यही पूरा पता उस समय छोटी बच्ची रहीं सरस्वती बुआजी ने लिखा था।
अब देखिए उस समय के डाक विभाग का कमाल कि जब वह पत्र आगरा पहुँचा तो वहाँ के डाक विभाग के जो भी लोग थे वो इस पते को देख कर चकित हुए और परेशान भी फिर उनके जो भी अधिकारी/पोस्टमास्टर साहब वहाँ थे उन्होंने सभी डाकियों से कहा कि देखो इस चिट्ठी पर भेजने के स्थान की मुहर साफ दिख रही है जो रीवा की है। अब बताओ कि रीवा से कहाँ चिट्ठी ज्यादा आती हैं। आज के हिसाब से उस जमाने में आगरा भी छोटा ही शहर था तो लोगों को जानकारी रहती थी पर ये मामला जानकारी से ज्यादा sincerity का है और देखिए एक डाकिया बोला कि हाँ एक जगह रीवा से रेग्युलर चिट्ठियाँ आती हैं और वह पता हमारे बाबा का ही था। इस प्रकार वह चिट्ठी जिसका पता मात्र इतना ही था कि, “भैया को मिले, आगरा” और डाक विभाग ने वह पत्र सही जगह पहुँचा दिया, यह थी डाक विभाग की सिनसीएरिटी और कार्यकुशलता।

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