इतिहास और संस्कृति के किस्से-4
इतिहास और संस्कृति के किस्से-4
आज मैं आपसे शेयर कर रहा हूँ बादशाह मुहम्मद तुगलक का शिकार के लिए निकलना और फिर योगी वाला किस्सा।
अपने लेखन में एक स्थान पर इब्नबतूता ने बादशाह के शिकार पर निकलने के दृश्य का विवरण दिया है। इस शिकार यात्रा में इब्नबतूता स्वयं भी बादशाह मुहम्मद बिन तुगलक के साथ था।
बादशाह की शाही सवारी और डेरा
इब्नबतूता बताता है कि इस देश की प्रथा ऐसी है कि जब बादशाह शाही सवारी पर शिकार के लिए निकलते है तो उनके सवार होते ही प्रत्येक अमीर अपनी सेना सुसज्जित कर ध्वजा, पताका, ढोल-नगाड़े, शहनाइयां आदि सहित सवार हो जाता है।सबसे आगे बादशाह की सवारी होती है। उसके आगे केवल पर्देदार और गायक/नर्तकियां तथा तबलची गले में तबले लटकाए सरना (?) बजाने वालों के साथ चलते हैं। बादशाह के दाएँ और बाएँ पंद्रह-पंद्रह चुने हुए आदमी चलते थे जिनमें वजीर, बड़े अमीर तथा परदेसी चलते थे और इब्नबतूता भी इनमें से ही एक था जो उस जुलूस में शामिल था। बादशाह के पीछे रेशमी और कामदार वस्त्र की ध्वजा-पताका और ऊंटों पर तबला आदि चलते हैं।इसके पश्चात बादशाह के भृत्यों और दासों का नम्बर आता है तत्पश्चात अमीरों और फिर जनसाधारण का।
यह कोई नहीं जानता कि विश्राम कहाँ होगा।जब कोई उपयुक्त बाग़ या छायादार स्थल मिलता तो बादशाह वहीं विश्राम की आज्ञा देता और फिर वहीं शाही डेरा डाला जाता। सबसे पहले बादशाह का ख़ेमागाह गड़ा जाता, जो सदैव मध्य में होता था। उसके चारों ओर अमीरों और सरदारों के डेरे सजते। बिना बादशाह की अनुमति कोई भी अमीर अपना डेरा नहीं गाड़ सकता था।बाद में नाजिर आकर प्रत्येक व्यक्ति को उनके डेरे लगाने का स्थान बताते हैं। बादशाह का डेरा बिल्कुल बीच में होता है।सरजामदार बादशाह पर चँवर से मक्खियां उड़ाता रहता है।
डेरे में भोजन की विशेष व्यवस्था होती। अमीरों के पुत्र स्वयं आग प्रज्वलित करते और सीखों पर मांस भूनना प्रारंभ कर देते। इब्नबतूता के अनुसार रसोई में पकते थे —
भुना हुआ मांस
बकरी का मांस
मोटी मुर्गियाँ
कराकी आदि
साथ ही कई प्रकार के शरबत भी परोसे जाते। भोज में अमीरों के पुत्र और विशेष व्यक्ति सम्मिलित होते। बादशाह इच्छानुसार व्यक्ति विशेषों के साथ बैठते, भोजन करते और हालचाल पूछता।
तो ये था बादशाह के शिकार पर निकलने का विवरण अब बात योगियों की।
इब्नबतूता लिखता है कि, “ एक दिन की बात है कि मैं राजधानी में ही था कि एक दिन बादशाह ने मुझे बुलवाया। खबर मिलते ही मैं तुरंत हाज़िर हो गया। उस समय बादशाह अकेले बैठे थे और सिर्फ़ कुछ ख़ास अमीर लोग ही उनके पास मौजूद थे। वहाँ कुछ योगी भी बैठे थे। इन योगियों का यह हाल था कि जैसे लोग कभी अपने बाल नोच डालते हैं, वैसे ही ये योगी अपने सिर और शरीर पर राख डालकर बाल उखाड़ते रहते थे (हो सकता है वो लोग जैन मत के साधु रहे हों क्योंकि उस मत में मुनि जन का केश लुंचन करते हैं जो जानकारी शायद इब्नबतूता को न रही हो या किसी अन्य मत के योगी ही रहे हों)
बादशाह ने मुझे बैठने का इशारा किया। फिर उन्होंने एक योगी से कहा — “यह आदमी दूर देश से आया है, इसे कोई अद्भुत चीज़ दिखाइए।”
बादशाह की बात सुनकर एक योगी बोला — “अच्छा!” और पद्मासन में बैठ गया। धीरे-धीरे उसका शरीर ज़मीन से ऊपर उठने लगा। यह कौतुक देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गया और वास्तव में नज़ारा सचमुच बहुत हैरान करने वाला था। यह देखते हुए थोड़ी ही देर में मेरा मन घबरा गया और मैं नीचे धरती पर ही लोट गया और बादशाह के औषधोपचार करने पर मेरा चित्त जाकर कहीं ठिकाने लगा।
इस बीच वह योगी अभी भी पूर्ववत हवा में ही बैठा हुआ था। इसके उपरान्त योगी ने अपनी खड़ाऊँ उठाई और गुस्से में कई बार ज़मीन पर पटकी। वही खड़ाऊँ उड़कर ऊपर गए योगी की गर्दन पर बार-बार लगने लगी। खड़ाऊँ के प्रहार से वह योगी धीरे-धीरे नीचे उतर आया और थोड़ी देर बाद हमारे पास ज़मीन पर बैठ गया। बादशाह ने बताया कि खड़ाऊँ फेंकने वाला उसका गुरु था और हवा में बैठा हुआ योगी उसका शिष्य। बाद में बादशाह ने बताया कि अगर मैं उस वक़्त इतना चौंक कर डर न जाता, और मेरा विश्वास डगमगाता नहीं, तो मुझे और भी अद्भुत खेल दिखाए जाते।
बाद में जब मैं वहाँ से लौटा तो मेरा मन पूरी तरह शांत हो गया और बादशाह ने जो पेय दिया था, उसे पीकर मैं बिल्कुल ठीक महसूस करने लगा।”
अब बस, आज के लिए इतना ही। उम्मीद है ये सीरीज़ आपको पसंद आ रही होगी।
अगली पोस्ट में कुछ और रोचक किस्सों के साथ मुलाकात होगी।
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