इतिहास और संस्कृति के किस्से-2 बौहरे बसंतराय और मुगल शहजादा जिसने पैसे उधार लिए



इतिहास और संस्कृति के किस्से-2


हाल ही में मैंने बूटा सिंह जी, फारसी भाषा, इतिहास के मूल सोर्स पढ़ना और अकबर बादशाह आदि से सम्बंधित एक पोस्ट की थी जिसको काफी लोगों ने पसंद किया और कुछ लोगों ने मुझसे संपर्क करके भी कहा कि इतिहास,संस्कृति आदि से सम्बंधित और भी किस्से में लिखना शुरू करूँ तो आज एक ऐसा ही किस्सा और पेश है।

आज मैं आपसे जो किस्सा शेयर करने जा रहा हूँ इसमें चर्चा है एक ऐसे मुगल राजकुमार की जिसने कुछ व्यापारियों से रुपये उधार लिए और जब वो हिंदुस्तान का शहंशाह बना तो उसने वो पैसे वापिस भी किये।

पहले मैं बताता हूँ कि यह किस्सा मेरी जानकारी में कैसे आया। कोविड के दौरान मैंने सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत से विषयों पर फेसबुक लाइव किया और इसमें बहुत से विषय ऐसे थे जिनके लिए मुझको काफी रिसर्च करनी पड़ी। इसी दौरान आदरणीय हेरम्ब भाईसाहब की पुस्तक  “चतुर्वेदियों का इतिहास” से प्रेरणा लेकर मेरे मन में आया कि मैं भी श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय के इतिहास और संस्कृति के विषय में जानकारी करूँ और इस कार्य में मुझको गाइड करने को हेरम्ब भाईसाहब तो मौजूद थे ही साथ ही और बहुत से लोगों ने आगे बढ़ कर मुझको जानकारी उपलब्ध कराईं तो मैंने इस काम को शुरू किया और Chaturvedi Heritage शीर्षक से एक यूट्यूब श्रृंखला बनाई। इस कार्य को करने के दौरान श्री माथुर चतुर्वेदी समुदाय के इतिहास और संस्कृति से जुड़े बहुत से विस्मयकारी और रोचक तथ्य मेरे सामने आए। वर्तमान किस्सा उनमें से ही एक है। 

किस्सा कुछ ऐसा है कि हम जानते हैं कि मथुरा एक समय में बहुत शक्तिशाली राज्य हुआ करता था पर विदेशी आक्रमणों तथा अन्य कारणों से जब मथुरा की शक्ति कम होने लगी और कन्नौज शक्तिशाली हो चला था तो जैसा कि होता भी है लोगों का पलायन मथुरा से कन्नौज की तरफ भी शुरू हुआ। इसके बाद आगे चलकर 13वीं शताब्दी में जब कन्नौज पर हमले बढ़े  तो कन्नौज से भी पलायन शुरू हुआ और उस समय बहुत से माथुर चतुर्वेदी लोगों ने भी इन इलाकों से राजस्थान को पलायन शुरू किया और चित्तौड़गढ़ के महाराणा ने उनको आने यहाँ स्थान दिया। हाँलाँकि सम्राट पृथ्वीराज चौहान की बहन के विवाह के समय सबसे पहले माथुर चतुर्वेदियों के राजस्थान जाने-बसने के प्रमाण मिलते हैं पर वह किस्सा फिर कभी।

तो जब मैं इन विषयों पर खोजबीन में/रिसर्च में लगा था तो एक दिन मेरी बात राजस्थान के बड़े नेता रहे-मंत्री रहे स्व0 ललित किशोर चतुर्वेदी जी के पुत्र श्री लोकेश चतुर्वेदी जी से बात हुई और उन्होंने मेरा सम्पर्क श्री ललित किशोर चतुर्वेदी जी (उनके पिता नहीं अपितु अन्य व्यक्ति और अब स्वर्गीय) से मेरा सम्पर्क कराया जो इत्तफाक से ये रिश्ते में मेरे फूफाजी निकले जो R.A.S. से रिटायर्ड अफसर थे। ललित किशोर जी ने मुझको बताया कि बून्दी के प्रख्यात कविवर जगन्नाथ चतुर्वेदी ने “बसन्त विलास” नाम से एक पुस्तक लिखी थी जो प्रसिद्ध म्यो कॉलेज अजमेर में टीचर रहे और बाद में बनारस राजघराने के राजगुरु पुरषोत्तम चतुर्वेदी जी से इनको मिली। ललितकिशोर जी ने खड़ी बोली में इस पुस्तक को फिर से “मुगलों के बौहरे-चौबे बसंतराय” नाम से लिखा। उन्होंने यह पुस्तक मुझको भेजी जो इसी किस्से को वर्णित करती है।

जनवरी 1303 में अलाउद्दीन खिलजी ने जब चित्तौड़ पर आक्रमण किया तो उसके बाद वहाँ से बहुत से लोगों ने आसपास के इलाकों में पलायन किया जिनमें उपरोक्त वर्णित चतुर्वेदी लोग भी थे। कुछ माथुर चतुर्वेदी पहले चाकसू और बाद में सम्वत 1625 सन 1568 के आसपास जाके मालपुरा इलाके में बस गए।इस किताब “बसन्त विलास” के लेखक जगन्नाथ जी के पूर्वज दशरथराय इसी मालपुरा से सम्बंधित थे।

पहली बात इन दशरथराय की। दशरथराय बहुत बड़े और कुशल व्यापारी होने के साथ-साथ एक शानदार योद्धा भी थे। जब बादशाह अकबर और चित्तौड़ का युद्ध हुआ तो दशरथ राय चौबे चित्तौड़ की तरफ से लड़े और उस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। उनके शहीद होने के बाद उनका घोड़ा दौड़ता हुआ उनके घर मलपुरा पहुँचा और उनके दरवाजे पर अपने खुर पटकने लगा जिसके बाद उनके घरवालों को उनके वीरगति को प्राप्त होने के विषय में पता चला। इस युद्ध में उनके जीजा भी शहीद हुए थे और दशरथराय जी की पत्नी और बहन दोनों अपने हाथों में श्रीफल लेकर सती होना बताया गया है। मालपुरा के तालाब के किनारे उनकी छतरी बनी हुयी हैं जिनकी कुछ वर्ष पहले मरम्मत हुयी है।

इन्हीं चौबे दशरथराय के पुत्र तुलसीदास थे जिनके पुत्र चौबे बसंतराय हुए जिनका जन्म सम्वत 1665/सन 1608 का था। तुलसीदास और उनके पुत्र बसन्तराय ने मालपुरा के पास तोड़ानगर नामक रजवाड़े में जाकर व्यवसाय करना शुरू कर दिया जहाँ के राजा रायसिंह सिसोदिया थे। अब हुआ ऐसा कि हिंदुस्तान के  उस समय के बादशाह जहाँगीर के पुत्र शहजादे खुर्रम ने विद्रोह कर दिया और ईरान के शाह से मदद मांगी जिसने खुर्रम को समझाया। अपने मंसूबों में सफलता न मिलने पर अंततः  खुर्रम दक्कन की तरफ चल दिया और वहाँ के रास्ते में खुर्रम ने ‘तोड़ा-नगर’ में अपने लाव-लश्कर के साथ डेरा डाला। कुछ समय बाद ‘तोड़ा-नगर’ वालों को सन्देश मिलता है कि शाहजादे खुर्रम को दस लाख रुपये (उस समय की मुद्रा से तात्पर्य है) चाहिए और न मिलने पर कत्लेआम कर दिया जाएगा। इस खबर से वहाँ हड़कम्प मच गया। तोड़ानगर के राजा और व्यापारियों ने रकम इकट्ठी की जो सिर्फ साढ़े तीन लाख रुपये हो पायी। बसंतराय ने यद्यपि पैसा बहुत कमाया था लेकिन वह उस इलाके में नए व्यक्ति थे तो लोकल लोगों ने उनसे इस विषय में पैसा मांगने में संकोच किया किंतु जब बसंतराय को पता चला तो उन्होंने कहा मैं यहाँ रहता हूँ तो ये मेरा भी संकट है और मैं सहयोग करूँगा और उन्होंने रातों-रात बचे हुए साढ़े छै लाख की रकम जमा कर दी। अब समस्या आयी कि शाहजादे को रकम देने जाएगा कौन। उस जमाने में यह भी बहुत खतरनाक मसला था क्योंकि किसी भी विषय में शाहजादे की नाखुशी का मतलब था प्राणों का जाना। इस पर इस जिम्मेदारी को भी बसंतराय ने अपने ऊपर लिया और खुद वह दस लाख की रकम लेकर शाहजादे खुर्रम के पास गए। खुर्रम ने बसंतराय को बहुत आदर से बैठाया जो उस जमाने में एक अजूबा बात थी। अब प्रश्न उठा कि रसीद किसके नाम बनेगी और तोड़ा नगर के लोग फिर घबरा गए क्योंकि एक तो शाहजादे से रसीद बनवाने का मतलब तकादा खड़ा करना दूसरे अगर शहंशाह जहाँगीर को मालूम पड़ा तो न मालूम क्या होगा। अंततः रसीद भी बसंतराय चौबे के नाम की ही बनी।

समय का चक्र देखिए कि कुछ समय बाद खुर्रम शाहजहाँ के नाम से हिंदुस्तान के तख्त पर बैठा। लगभग 6-7 वर्षों बाद शाहजहाँ को याद आया कि “तोड़ा-नगर” वालों से पैसे लिए थे तो तोड़ा नगर खबर आई कि बादशाह सलामत बुला रहे हैं। अब भला किसकी हिम्मत कि बादशाह से तकादा वसूलने जाए तो फिर यह जिम्मेदारी चौबे बसंतराय ने ही उठायी। कुछ महीनों बाद शाहजहाँ ने दरबार में बसंतराय को बुलाया और वहाँ उपस्थित सब लोगों को उस घटना के विषय में बताकर अत्यंत प्रसन्न होकर बसन्त राय को “बौहरे” की उपाधि दी, उस रकम की दुगुनी राशि दी और अपने दरबार में उपस्थित राजस्थान के एक राजा जो बखाड़ा के थे उनसे बौहरे बसंतराय चतुर्वेदी को अपने राज्य में कुछ जमीन देने को कहा और बखाडा वालों ने इनको वहाँ काफी जमीन दी जिस पर बसंतराय ने “रामपुरा” नामक स्थान की स्थापना की.

तो ये था किस्सा बौहरे बसंतराय चौबे का।

अगले लेख में फिर एक रोचक किस्सा बताऊँगा इतिहास और संस्कृति के पन्नों से।


नोट:-मैं नीचे इस विषयक अपने यूट्यूब एपिसोड का लिंक भी दे रहा हूँ जिसको आप चाहें तो क्लिक करके उक्त एपिसोड को देख भी सकते हैं।


https://youtu.be/WYppnYYbZk4?feature=shared

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