इतिहास और संस्कृति के किस्से-10 बादशाह अकबर और हाथी

इतिहास और संस्कृति के किस्से-10
बादशाह अकबर और हाथी

इस सीरीज के भाग 6 में हमने आपसे चर्चा की थी हुमायूँ बादशाह के एक स्वप्न की जिसमें उसको एक व्यक्ति ने अकबर के जन्म के विषय में अपना एक प्रकार से आशीर्वाद दिया था और कहा था कि उसका होने वाला पुत्र उस व्यक्ति की नस्ल से होगा। स्वप्न में दिखे उस व्यक्ति ने अपना नाम बताया था ‘जिन्दाफील’। फारसी भाषा में ‘फील या फिल’ का अर्थ होता है ‘हाथी’। तो आज की इस पोस्ट में अकबर और हाथियों के कुछ किस्सों की ही चर्चा है।
बादशाह अकबर को हाथियों का बहुत शौक था और वह बेखौफ होकर हाथियों की न सिर्फ सवारी करता था अपितु बिगड़े हाथी से भी उसको कोई डर नहीं लगता था। हाथी कैसा भी हो अकबर को उसको अपने वश में करना आता था। अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है कि अकबर ऐसे मस्त हाथी पर चढ़ जाता था जो आदमियों को मार देता था, महावतों को गिरा देता था और जिसको देख कर लोगों के दिल बैठ जाते थे।
एक बार एक मस्त हाथी ने अपने महावत तथा और कई लोगों को जान से मार दिया और बिगड़ गया। सारे शहर में हंगामा हो गया। अकबर मुस्कुराते हुए उसके एक दांत पर पैर रखकर न सिर्फ उस पर चढ़ गया बल्कि उसको दूसरे हाथियों से लड़ाया भी। जिस मस्त हाथी पर अकबर 
ने चढ़ कर दूसरे हाथी से लड़ाया था उस हाथी का नाम ‘झलपा’ था। उस समय अकबर की आयु मात्र 14 वर्ष की थी।
एक बार एक दूसरा हाथी महावत के वश में नहीं था तो अकबर कूदकर उसपर जा बैठा और उसकी गर्दन में रस्सा डाल कर उसमें अपना पर बांध लिया था। ये ‘लखना’ नाम का हाथी बहुत मस्त हो रहा था। एकाएक हाथी का पैर एक खाई फंस गया। उस हाथी ने अपना पैर निकालने का बड़ा प्रयास किया परन्तु निकाल नहीं सका। इससे चारों ओर लोगों में हाहाकार मच गया क्योंकि बादशाह अकबर का पैर तो रस्से में फंसा हुआ था। इसके बाद बहुत से वीर और और स्वामिभक्त लोगों ने बहुत तरकीब लगा कर बादशाह का पैर निकाला। जब बैरमखान पर यह खबर पहुँची तो वह बहुत नाराज हुआ। अकबर के हाथियों में एक का नाम ‘दिल संकार’ था, एक और का नाम ‘फ़ौजबिदार’ था तथा एक अन्य का नाम ‘दमूदर’ भी था।

अकबर और हाथियों का एक और बहुत लोमहर्षक किस्सा है। अकबर के यहाँ ‘हवाई’ नामक एक बहुत ही विशाल हाथी था जिसकी गणना विशेष हाथियों में की जाती थी।बड़े-बड़े अनुभवी महावत भी उस पर कठिनता से ही चढ़ पाते थे और उसको लड़ाना तो अत्यंत दुष्कर कार्य ही था। एक दिन पोलो के मैदान में यह हाथी अपने भयानक रूप में घूम रहा था और ऊधम कर रहा था। उस समय अकबर न सिर्फ उस पर सवार हो गया अपितु उसने हवाई को अपने काबू कर लिया। वहीं एक दूसरा हाथी भी था जिसका नाम था ‘रणबागा’ और वह भी लगभग हवाई जैसा ही था। अब वहाँ विचित्र माहौल बन गया था;दो बेकाबू ऊधमी हाथी जिनमें से एक पर बादशाह अकबर सवार था। जो दरबारी वहाँ मौजूद थे उनका यह साहस नहीं हो रहा था कि अकबर को हाथी से उतरने की कह भी सकें।उधर हाथी और उन पर सवार अकबर के तमाशे देख सबकी जान भी अधर में लटकी हुई थी। आखिर उन्होंने अतका खाँ को सूचित किया। जब अतका ख़ाँ वहाँ आया तो मानो उसके तो प्राण ही हलक में अटक गए और उसने चिल्लाकर बादशाह से निवेदन किया कि वह हाथी से उतर आए पर बादशाह तो अकबर बादशाह था जिसकी उम्र में अभी बालपन ही था तो वह बोला कि, “ यदि तुम लोग चिल्लाना और शोर करना बंद नहीं करोगे तो मैं जानबूझकर हाथी से गिर जाऊँगा। यह असल में राजहठ और बालहठ दोनों एक साथ ही था। आखिर सब शांति पूर्वक बैठ गए। अकबर हवाई को रणबागा से लड़ाता रहा और अंत में हार कर रणबागा भाग खड़ा हुआ तो अकबर ने हवाई पर बैठे उसका पीछा किया। हाथी जमुना नदी पर पहुँचे और रणबागा नदी पर नावों का पुल बना था उस पर चढ़ गया और उसके पीछे-पीछे हवाई भी पुल पर चढ़ गया। अकबर हवाई पर चट्टान की तरह अविचल रूप से बैठा हुआ था। अब विचित्र दृश्य था;हाथियों के वजन से नावों का बना पुल कभी पानी के अंदर डूब जाता तो कभी ऊपर आ जाता। काफी देर यह खौफनाक तमाशा चलता रहा और पुल के दोनों ओर शाही सेवक और भीड़ इकट्ठे हो गए थे। आखिरकार दोनों हाथी पुल पार करके नदी के दूसरी ओर पहुँच गए जहाँ से रणबागा भाग गया और अकबर ने हवाई को रोक लिया तब लोगों की जान में जान आयी।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं ने भी अपनी किताब ‘मुन्तख़ब-उत-तवारीख में बादशाह अकबर के हाथी प्रेम का एक किस्सा लिखा है। यह किस्सा ‘हल्दीघाटी’ वाले युद्ध का है।
इस युद्ध में अकबर की आज्ञा से बदायूनीं खुद भी शामिल था। बदायूनीं लिखता है कि महाराणा की फौज ने उसकी ही अगुआई में दर्रे से आक्रमण किया। उन्होंने सामने के सभी आदमियों को साफ कर दिया और मुहाने पर उपस्थित काजी खाँ की मुगल फौज को धकेलते हुए केंद्र तक आ गए। सीकरी के सभी शेखपुत्र तत्काल मैदान छोड़ कर भाग गए। बदायूनीं आगे लिखता है कि काजी खाँ बहादुरी से लड़ रहा था कि अचानक कटार के एक वार से उसका दाहिना अँगूठा बुरी तरह जख्मी हो गया और वह हथियार पकड़ने काबिल नहीं रहा तो उसने कहा,” ताकतवर कठिनाइयों से भाग जाना ….के (हमारे) रिवाजों में से एक है” और वह मैदान छोड़ कर भाग गया। मुगल फौज का हाल बहुत खराब था कि इसी बीच मिहतर ख़ाँ अपने जवानों के साथ पीछे से ढोल नगाड़े बजाते आया और उसने मुगल टुकड़ियों को धावे के लिए ललकारा। महाराणा के कहर की वजह से मुगल फौज का हाल खराब था पर इस ललकार से उन भगोड़ी टुकड़ियों में कुछ दम आयी और वह ठहरीं।बदायूनीं लिखता है कि ग्वालियर के राजा रामशाह (प्रसिद्ध राजा मान का पोता) जिसे हमेशा  महाराणा की सेना की अगली पंक्ति में रखा जाता था, उसने राजा मानसिंह के राजोऊटोंनके सामने ऐसा पराक्रम दिखाया जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। परिणामतः मुगल सेना के बायीं ओर के राजपूत (मानसिंह की सेना) भाग गए और आसफ ख़ाँ के भी भागने का कारण बने। राणा प्रताप के हाथियों ने शाही हाथियों पर धावा बोल दिया। शाही सेना की हाथी टुकड़ी का नायक हुसैन खाँ भी लड़ने को आगे बढ़ा। उधर राजा मानसिंह के महावत का पता नहीं चला परन्तु मानसिंह उछल कर निर्भीकता से अपने महावत के स्थान पर आ गया। शाही टुकड़ी के दो लड़ाकू हाथियों में से एक जो अकबर खुद का निजी हाथी था उसने भयंकर तरीके से महाराणा प्रताप के निजी हाथी ‘रामप्रसाद’ पर जोरदार हमला कर दिया। यह रामप्रसाद नाम का हाथी बहुत शानदार, जबरदस्त और बलवान था और इस हाथी पर अकबर की बहुत समय से निगाह थी। अकबर पहले राणा से इस हाथी को मांग भी चुका था किंतु उसको मिला नहीं था। यह हाथियों का युद्ध चल ही रहा था कि अचानक एक तीर राणा के हाथी रामप्रसाद के महावत के लग गया और वह धक्के से नीचे गिर गया। इस समय मुगल सेना के शाही हाथी के महावत ने फुर्ती दिखाई और वह शाही हाथी से छलांग लगा कर महाराणा के हाथी के महावत की जगह बैठ गया। बकौल बदायूनीं यही वह क्षण था जब महाराणा की फौज में अफरातफरी मच गयी (turning point).चूँकि आज की पोस्ट का विषय हल्दी घाटी का युद्ध न होकर हाथियों की बात है तो युद्ध का वर्णन फिर कभी किया जाएगा आज बस हाथियों की बात। इस हाथी ‘रामप्रसाद’ को बादशाह अकबर तक पहुंचाने का जिम्मा बदायूनीं को ही दिया गया। युद्ध स्थल से लौटते में आमेर से पाँच कोस पहले यह हाथी दलदल में फँस गया और बड़ी मुश्किल से ग्रामीणों की मदद से निकाला गया। फतहपुर (सीकरी) पहुँच कर अकबर के सुनवाई कक्ष में हाजिर होकर जब बदायूनीं ने यह हाथी उसकी सेवा में पेश किया तो अकबर ने उस हाथी का नाम पूछा। 
बदायूनीं ने बताया कि इसका नाम है, “रामप्रसाद”.
अकबर ने जवाब दिया,” चूँकि यह सब पीर (मुइनुद्दीन चिश्ती पीर) की कृपा से हुआ है इसलिए आज से इस हाथी का नाम होगा, “पीर प्रसाद।”
अकबर के एक प्रिय हाथी का नाम ‘हिरन’ था जिसकी याद में फतेहपुर सीकरी के बाहर ‘हिरन मीनार’ भी बनी है।

फोटो:- साभार इंटरनेट से

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