इतिहास और संस्कृति के किस्से-28. किस्सा है रामायण का

इतिहास और संस्कृति के किस्से-28

आज किस्सा है रामायण का
पुष्पक विमान का और लंका के महलों में रावण और राक्षसों के लिए बनने वाले भोजन का।
मूल सोर्स श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण साथ में फादर कामिल बुल्के की 'रामकथा'

बहुत समय से मेरा मन उपरोक्त विषय पर लिखने का था। रामायण को आप इतिहास मानें या मिथक यह मैं पाठकों पर छोड़ता हूँ । किसी मिथक या विश्वास के सम्बंध में जब तक हमको किसी किस्म के पक्के साक्ष्य नहीं मिल जाते जिनका तर्कसंगत विश्लेषण करके उस चीज या तथ्य को ऐतिहासिक सिद्ध किया जा सके तब तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले विद्वान उसको इतिहास न मान कर मिथक ही मानते हैं लेकिन अपने विश्वास और रामायण के विविध संस्करणों को पढ़कर, उसमें दिए रूट को देखकर मेरा मन इसको मिथक न मान कर ऐसा इतिहास मानता है जिसकी वो कड़ी अभी लुप्त है जिसके प्रमाण के आधार पर इसको ऐतिहासिक मानने के साथ ही साथ ऐतिहासिक साबित भी किया जा सके। शायद उसके लिए अभी काफी उत्खनन आदि होने की आवश्यकता है और बिना राजनीति के।
खैर जो मैं आज लिखने जा रहा हूँ उस लेखन के सोर्स के रूप में मैंने गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण का प्रयोग किया है और इसके तार्किक पक्षों को समझने के लिए मैंने फादर कामिल बुल्के की ‘रामकथा’ का सहारा भी लिया है। फादर कामिल बुल्के ने अपने शोध में लिखा है कि वाल्मीकि कृत रामायण के प्रमुखतः तीन पाठ पाए जाते हैं;उदीच्य पाठ, पश्चिमोत्तरीय पाठ और दाक्षिणात्य पाठ और इनमें थोड़े अंतर का कारण यह है कि पहले यह रामायण मौखिक रूप से प्रचलित थी और काफी समय बाद इसको स्थायी लिखित रूप मिला। अब प्रचलित रामायण का रचनाकाल एच0 याकोबी पहली या दूसरी शताब्दी या उससे भी पहके का 5 या 6 शताब्दी ईसा पूर्व का मानते हैं, वैद्य इसका रचना काल दूसरी शताब्दी इसा पूर्व से दूसरी शताब्दी के बीच का मानते हैं। फादर बुल्के ने लिखा है कि आदि रामायण प्रचलित रामायण से इतना भिन्न है कि इस महत्वपूर्ण विकास के लिए कई शताब्दियों की आवश्यकता होती है। अतः वाल्मीकि रामायण की रचना कम से कम तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की होगी और वाल्मीकि का समय तो इससे पहले का ही होगा। कालिदास के समय में रामायण ने अपना प्रचलित रूप ले लिया था तथा महाभारत के आरण्यक पर्व के रचनाकाल में बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की कुछ सामग्री प्रचलित हो चुकी थी। प्रामाणिक वाल्मीकिकृत रामायण में बौद्ध धर्म की कोई चर्चा नहीं दिखती इसलिए यह उससे पहले की अर्थात बुद्ध के पूर्व की (पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व की) रचना है ऐसा एम0 मोनियर विलियम्स और सी वी वैद्य का तर्क है। 

खैर इस पर और चर्चा किसी और लेख में करेंगे अभी तो चर्चा पुष्पक विमान की जो जैसा हनुमानजी ने देखा और वाल्मीकि जी ने जैसा वर्णन किया।
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के सुंदरकांड के सप्तम सर्ग में वाल्मीकि जी लिखते हैं कि लंका पहुँच कर हनुमान जी ने पर्वतों के समान ऊँचे महलों के ऊपर मनोहर और विशाल अट्टालिकाएं देखीं। सोने की खिड़कियां थीं जिनमें नीलम जड़े हुए थे। इसके बाद हनुमान जी ने राक्षसराज रावण का उसकी शक्ति के अनुरूप शानदार भवन ‘पुष्पक विमान’ देखा। 
यह विमान बहुत सुंदर,मेघ के समान ऊँचा, सोने के समान चमकदार था। उस विमान में सफेद रंग के भवन (या केबिन?) बने हुए थे, और सुंदर फूलों, कमल, सरोवरों आदि की सजावट थी। वाल्मीकि जी ने लिखा है कि उस विमान में सजावट के लिए नीलम और मूँगे के आकाशचारी पक्षी बनाये गए थे और विविध प्रकार के रत्नों से विचित्र किस्म के सर्पों का निर्माण भी किया गया था और अच्छी नस्ल के सुंदर अंग वाले घोड़े भी बनाये गए थे। उस विमान में कमल खिलने वाला सरोवर (पूल/pond) भी बना हुआ था जिसमें हाथी बनाये गए थे जो लक्ष्मी की मूर्ति का अभिषेक करते लग रहे थे। इस विमान का निर्माण विश्वकर्मा ने स्वयं बहुत ही विशेष और शानदार तरीके से ब्रहम्मा जी के लिए किया था। इस विमान को कुबेर ने भारी तपस्या से ब्रहम्मा जी से प्राप्त किया और फिर कुबेर को परास्त कर रावण ने इसको ले लिया।
 मन में जहाँ भी जाने की इच्छा होती वह विमान वहाँ पहुँच जाता था (आजकल GPS,AI और टेस्ला कार तथा पायलट रहित विमान की सोचिए)। इस विमान में गुप्त गृह (सीक्रेट चैम्बर्स) भी बने हुए थे। इसमें सोने की सीढ़ियां बनाई गयी थीं। वाल्मीकि जी लिखते हैं कि सुवर्ण के समान लाल रंग के चंदन से युक्त हो के के कारण वह विमान बाल सूर्य की भांति भी दिखता था।
वहीं पास में रावण का महल था जहाँ वह सो रहा था और पाकशाला और मधुशाला का वर्णन भी वाल्मीकि जी ने किया है। उन्होंने लिखा है कि किस्म-किस्म के पकवानों की खुशबू पुष्पक विमान में आ रही थी। यद्यपि उसमें जब हनुमान जी ने जाकर देखा तो सामिष और निरामिष दोनों किस्म के पकवान थे। पानभूमि में अलग-अलग मृगों, भैंसों और सूअरों के मांस रखे गए थे (क्योंकि लंका के राक्षस लोगों का भोजन तो उस समय इसी किस्म का था)। हनुमान जी ने वहाँ सोने के बर्तनों में मोर, मुर्गे, सूअर, गैंडा, साही, हरिण तथा मयूरों का माँस देखा जो दही नमक मिला कर रखा गया था। कृकल नामक पक्षी, भांति-भांति के बकरे , खरगोश, आधे खाये हुए भैंसे, एकशल्य नामक मछली और भेड़ें, ये सब के सब पका कर रखे गए थे। इनके साथ अनेक किस्म की चटनियाँ भी थीं। 
अनेक किस्म के पेय पदार्थ और जीभ की शिथिलता को दूर करने को खटाई और नमक के साथ कई किस्म के राग (अंगूर और अनार के रस में मिश्री और मधु आदि मिलाने से जो मधुर रस तैयार होता है वह पतला हो तो ‘राग’ और गाढ़ा हो तो ‘खांडव’ कहलाता है)। 
इसके अतिरिक्त वहाँ स्वच्छ दिव्य सुरायें (जो कदम्ब आदि के वृक्ष से स्वतः उत्पन्न होती हैं) और कृत्रिम सुरायें (जिनको शराब बनाने वाले तैयार करते हैं) जैसे शर्करासव, माध्वीक (शहद मधु से बनाई मदिरा), पुष्पासव और फलासव भी थी। इसी प्रकार वाल्मीकि जी ने रावण के महल और वहाँ सोने वाली स्त्रियों  का बहुत सजीव वर्णन किया है लेकिन वह किसी और पोस्ट में लिखूँगा।

आज के लिए बस इतना ही
बाकी अगली कड़ी में मिलेंगे किसी नए किस्से, इतिहास की बात या मिथक के साथ।

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