इतिहास और संस्कृति के किस्से-30. चचनामा : सिंध से उपजी एक अनकही दास्तान
इतिहास और संस्कृति के किस्से-30
चचनामा : सिंध से उपजी एक अनकही दास्तान
क्या आपको पता है कि भारत में पहला मुस्लिम आक्रमण कहाँ हुआ था?
भारतीय उपमहाद्वीप में हम दिल्ली या दक्षिण के राज्यों की और उनके इतिहास की बातें करते सुनते रहते हैं लेकिन हमको उन स्थानों के इतिहास की जानकारी भी करनी होगी जहाँ की घटनाओं ने हमारा इतिहास ही बदल दिया। उन किस्सों को बताने वाले ग्रन्थों को भी पढ़ना होगा जिनमें ऐसे वाक्यात दर्ज किए गए हैं।
ऐसा ही एक ग्रंथ है चचनामा जिसके विषय में मुझको मेरे पुत्र अर्पित से पता चला।
चचनामा केवल एक युद्ध और विजय की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताता है कि किस प्रकार सत्ता, राजनीति, धर्म और संस्कृति आपस में टकराते हैं। यह भारतीय उपमहाद्वीप में अरबों के आगमन का पहला बड़ा लिखित दस्तावेज़ है और पाकिस्तान व भारत के इतिहास को समझने का आधार भी।
इस चचनामा में जिक्र है सिंध के रायवंश का और फिर उनके बाद चच और उसके पुत्र दाहर के शासन का जिसके समय में भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमण मुहम्मद बिन कासिम ने किया।
सदियों पहले, 8वीं शताब्दी में जब मुहम्मद बिन क़ासिम की सेनाएँ सिंध की धरती पर उतरीं, तो यह केवल एक आक्रमण नहीं था, बल्कि एक ऐसी कथा की शुरुआत थी जिसने पूरे उपमहाद्वीप वर्तमान और भविष्य को प्रभावित किया।
इस कहानी को 13वीं शताब्दी में ‘अली कुफ़ी’ ने चचनामा के रूप में लिखा। मूलतः यह ग्रंथ अरबी में लिखा गया था और बाद में इसका अनुवाद फारसी में हुआ। समय के साथ इतिहास ने परतें खोलीं और सामने आया कि यह केवल अनुवाद नहीं, बल्कि लोककथाओं, राजदरबारी प्रसंगों और कल्पना का मिला-जुला आख्यान है। इसमें चच वंश की स्थापना, महारानी और चच के संबंधों, विश्वासघात और सत्ता प्राप्ति की कथाएँ भी हैं।
इतिहासकार मनन अहमद आसिफ का कहना है कि चचनामा ने उपमहाद्वीप में इस्लाम के आगमन की समझ को गहराई से प्रभावित किया। औपनिवेशिक दौर में इसे हिंदू–मुस्लिम संबंधों की व्याख्या का आधार बनाया गया।
यह ग्रंथ हमें यह सोचने पर विवश करता है कि इतिहास केवल तिथियों और युद्धों का ब्यौरा नहीं है; यह सत्ता, आस्था और समाज को आकार देने वाली वह धारा है, जिसमें कल्पना और यथार्थ अक्सर एक-दूसरे से गुँथ जाते हैं।
सिंध की राजधानी अलोर (अरोर) एक भव्य और समृद्ध नगर था। यह नगर राजमहलों, हवेलियों, बाग़-बग़ीचों, फव्वारों, नदियों, नालों और वृक्षों से सुसज्जित था। नगर के बीच से बहती हुई मेहरान (सिन्धु) नदी उसकी शोभा को और भी बढ़ा देती थी।
राजा ने इस्कंदह का किला, बाबियाह, सिवारह, जजहोर और धनोद जैसे प्रदेशों को अपनी अधीनता में रखा। मुल्तान नगर भी उसके शासन का हिस्सा था, साथ ही सिक्काह, कराद, इश्तहर और कीह नगर कश्मीर की सीमा तक उसके अधिकार में थे।
राजा ने राजधानी अलोर को राजनैतिक और सांस्कृतिक केंद्र बनाया। कुरदान, कीकानान और बरहमानास को सीधे अपने अधिकार में रखा।
उसके शासन में न कोई विद्रोह था, न ही सीमा का उल्लंघन। प्रजा सुरक्षित और राज्य व्यवस्थित था।
घटनाक्रम आगे ऐसा हुआ कि अचानक निमरूज़ (फारस) के राजा ने सिंध के राज्य पर आक्रमण कर दिया और क़िरमान तक प्रवेश किया। जब राजा राय साहिरास (Rai Sahiras) को यह समाचार मिला, तो वह रावर किले से अपनी मुख्य सेना लेकर शत्रु का सामना करने निकल पड़ा।
दोनों सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ। वीर सैनिकों के सिर कटे, रक्त की धाराएँ बहीं। दोनों ओर से योद्धा मारे गए। फ़ारस के लोग अपने प्राणों की परवाह किए बिना भीषण युद्ध करते रहे।
अंततः राय साहिरास की सेना पराजित हुई और छिन्न-भिन्न हो गई।
साहिरास ने अपमान से बचने के लिए अंतिम क्षण तक रणभूमि नहीं छोड़ी। उसने शत्रु से डटकर युद्ध किया और वहीं रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुआ। फ़ारस का राजा युद्ध जीतकर अपने राज्य निमरूज़ लौट गया।
राय साहिरास की मृत्यु के बाद उसका पुत्र राय साहासी (Rai Sahaasi) गद्दी पर बैठा।
पिता द्वारा नियुक्त सभी गवर्नर उसके सामने आज्ञाकारी होकर झुक गए, अपनी संपत्ति समेत उसके अधीन हो गए और किसी ने विद्रोह करने का साहस नहीं किया।
राय साहासी ने अपनी उत्तम नीति, शाही गरिमा और विवेक से राज्य को अपने पूर्ण नियंत्रण में कर लिया।
उसके शासन में सिंध के निवासी सम्मानपूर्वक और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।
साहासी का एक वज़ीर था — चेम्बरलेन राम।
राम विद्या, प्रशासन और कूटनीति में अत्यंत निपुण था। वह विभिन्न विषयों का ज्ञाता था और उसका प्रशासन दृढ़ और स्वतंत्र था।
मंत्रिपरिषद पूरी तरह उसकी देखरेख में थी। उसके कार्यों में न कोई हस्तक्षेप कर सकता था और न ही कोई विरोध करने का साहस कर सकता था।
राय साहासी को उसकी वाकपटुता, तर्कशक्ति और नीति पर गहरा विश्वास था और उसने कभी भी उसकी सलाह की उपेक्षा नहीं की।
इसी काल में दरबार में एक ब्राह्मण आया। उसका नाम था चच (Chach)। चचके पिता ब्राह्मण थे जिनका नाम सेलाइज़ था जो मंदिर में रहते थे। वे प्रतिदिन राय साहासी और चेम्बरलेन राम की दीर्घायु और राज्य की समृद्धि के लिए प्रार्थना करते थे।
चच ने दरबार में आते ही अपनी वाकपटुता, ज्ञान और नीति से चेम्बरलेन राम को प्रभावित किया।
धीरे-धीरे चच राजसभा का प्रमुख अंग बन गया। उसकी दूरदृष्टि और नीति-युक्त सलाहों ने राय साहासी का विश्वास जीत लिया।
वह प्रशासन में इतना महत्वपूर्ण हो गया कि उसकी राय के बिना कोई निर्णय नहीं लिया जाता।
सिंध की प्रजा भी उसकी बुद्धिमत्ता और न्यायप्रियता से प्रभावित थी।
गवर्नर और सामंत भी उसके प्रभाव में आने लगे।
एक अवसर पर जब देबल से पत्राचार आया, तो सचिव ने चच को परखने के लिए वे पत्र दिए। चच ने न केवल उन्हें बड़े उत्कृष्ट ढंग से पढ़ा, बल्कि मनोहर हस्तलिपि और चुने हुए शब्दों में उत्तर भी लिखा। राम उसकी प्रतिभा से प्रभावित हुआ और उसकी प्रशंसा की। उसने चच को सहयोगी नियुक्त किया। थोड़े ही समय में चच पत्राचार विभाग में प्रसिद्ध हो गया।
राजा साहसी राय को जब चच की प्रतिभा का ज्ञान हुआ, तो उन्होंने भी उसे बुलाकर पत्र लिखवाए। राजा उसकी लेखनी और बुद्धिमत्ता से प्रसन्न हुआ और उसे सम्मान का वस्त्र प्रदान किया। शीघ्र ही चच को स्थायी सहायक सचिव बना दिया गया।
राम की मृत्यु के बाद राजा ने चच को चेंबरलेन और सचिव का पद दे दिया। चच जनता से विनम्र व्यवहार करता और शीघ्र ही पूरे राज्य में उसका प्रभाव स्थापित हो गया।
राजा साहसी राय की कोई संतान नहीं थी। एक दिन जब राजा अपनी पत्नी सुहांदी के साथ महल के निजी कक्ष में थे, चच दरवाज़े पर आया। रानी ने राजा से कहा कि उसके (रानी के) पर्दे में जाने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि चच एक ब्राह्मण है।
जब चच भीतर आया तो रानी सुहांदी उसकी ऊँची काया, सुंदर मुखाकृति और तेजस्वी व्यक्तित्व से मोहित हो गई। उसका हृदय चच पर स्थिर हो गया। उसने गुप्त संदेश भेजा –
“तेरी आँखों के बाणों ने मेरे हृदय को घायल कर दिया है। यदि तू मेरी याचना नहीं मानेगा तो मैं प्राण त्याग दूँगी।”
चच ने पहले इसे अस्वीकार किया और कहा कि यह राजा के साथ विश्वासघात है। परंतु रानी ने आग्रह जारी रखा। धीरे-धीरे दोनों में गुप्त प्रेम संबंध स्थापित हो गए।
धीरे-धीरे पूरा राज्य चच के अधीन हो गया। साहसी राय हर महत्वपूर्ण कार्य उसी से परामर्श कर करता था।
जब राजा बीमार पड़ा और मृत्यु समीप आई, तो रानी ने चच को बुलाकर कहा –
“राजा के परिजन मुझे अपमानित करेंगे। यदि हम साहस दिखाएँ तो यह राज्य तुम्हारे हाथों में आ सकता है।”
लेखक के अनुसार उसने आदेश दिया कि पचास बेड़ियाँ और ज़ंजीरें बनाकर गुप्त रूप से महल में रखी जाएँ। राजा की मृत्यु पर उसने उसके संबंधियों को एक-एक करके बुलवाया और चुपके से कैद करवा दिया। कई को मरवा दिया गया और उनकी संपत्ति पर अधिकार कर लिया गया।
इसके बाद प्रजा, सरदार, व्यापारी और सैनिकों को बुलाया गया। रानी ने पर्दे के पीछे से कहा –
“राजा बीमार है। अब चेंबरलेन चच ही राज्य चलाएगा।”
सबने सहमति व्यक्त की। तब रानी ने चच के सिर पर मुकुट रखकर उसे राजा घोषित कर दिया।
साहसी राय का भाई महारथ, जो चित्तौड़ का राजा था, सेना लेकर युद्ध हेतु आया। भीषण युद्ध हुआ। अंत में महारथ ने ललकारा –
“आओ, हम दोनों अकेले लड़ें। जो जीवित बचेगा वही राज्य पाएगा।”
चच ने कहा –
“मैं ब्राह्मण हूँ, घोड़े पर नहीं लड़ सकता। पैदल आओ।”
दोनों आमने-सामने हुए। चच ने एक ही वार में महारथ का सिर काट दिया। उसकी सेना भाग खड़ी हुई। चच विजयी होकर अलोर लौटा और राजसिंहासन पर बैठा।
रानी सुहांदी ने नगर के सरदारों और प्रमुखों को बुलाकर कहा –
“राजा साहसी मर चुका है। उसकी कोई संतान नहीं। राज्य के हित में अच्छा होगा कि अब चच से मेरा विवाह किया जाए और उसे राजा घोषित किया जाए।”
सबने सहमति दी। चच और सुहांदी का विवाह हुआ।
उनसे दो पुत्र उत्पन्न हुए – दाहिर और दाहरसिंह, और एक पुत्री बाई। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि दोनों पुत्र राज्य करेंगे और पुत्री का पति भी राजसिंहासन प्राप्त करेगा।
आज की पोस्ट लंबी हो चली है तो आज बस इतना ही।
इस विषय में शीघ्र ही अगली पोस्ट लिखूँगा जो बताएगी कि जब भारत में पहली बार मुस्लिम शासक का आक्रमण हुआ तो उसके परिणाम क्या हुए और घटनाक्रम क्या था। यह बहुत महत्वपूर्ण पोस्ट होगी क्योंकि यहाँ से इस उपमहाद्वीप के इतिहास सदैव के लिए बदलने जा रहा था।
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