इतिहास और संस्कृति के किस्से-18सुल्तान बलबन का शाही दरबार – रौब, वैभव और अनुशासन की मिसाल
इतिहास और संस्कृति के किस्से-18
सुल्तान बलबन का शाही दरबार – रौब, वैभव और अनुशासन की मिसाल
आज का किस्सा है दिल्ली के सुल्तान गियासुद्दीन बलबन के दरबार के नजारे का।
‘मुन्तख़ब उत तवारीख’ में मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं लिखता है कि बलबन सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद के बाद चूँकि उसका कोई वारिस नहीं था इसलिए अमीरों की रजामंदी से 1266 ईस्वी में दिल्ली का सुल्तान बना। वह गुलाम था और नसीरुद्दीन के पिता का दामाद था।
सुल्तान बनने से पहले वह वजीर था और उसका खिताब ‘उलग खान’ था। बलबन शमसुद्दीन के चालीस गुलामों में से एक था जिन्हें अमीर का खिताब मिला था। उसका वास्तविक सत्ता काल दिल्ली के राजाओं में काफी लंबा रहा क्योंकि वह लगभग 20 साल वजीर रहा जब वास्तविक सत्ता उसके हाथ थी और लगभग इतनी ही अवधि के लिए वह दिल्ली का सुल्तान रहा (ईस्वी सन 1266 से 1287)। उसके बारे में बदायूनीं लिखता है कि “..हिजरी 664 में बलबन मलिकों और अमीरों की रज़ामन्दी से तख्त पर बैठा और ‘कस्त्र-ए-सफेद’ (श्वेत प्रासाद) में आया।”
मध्यकाल का ही इतिहास लेखक ज़ियाउद्दीन बरनी अपनी 'तारीखे फ़िरोज़शाही' में लिखता है कि उसने अपने नाना से बलबन के विषय में सुना था। वह लिखता है कि, “..नाना जो बहुत बुद्धिमान बुजुर्ग थे और सुल्तान बलबन की दृष्टि में स्थान और मर्तबा रखते थे, से सुना है कि ऐसा प्रतीत होता था कि समय ने बादशाही के वस्त्र सुल्तान गयासुद्दीन बलबन के शरीर पर सुशोभित कर दिए थे।”
बलबन के दरबार का ‘ज़ियाउद्दीन बरनी’ ने अपनी किताब ‘तारीख ए फ़िरोज़शाही’ में इतना रोमांचक वर्णन किया है कि पढ़ के अहसास हो कि मध्ययुगीन राजशाही कैसी होती थी।
इतिहास में रुचि रखने वाले जब इसकी तुलना उस समय के मिस्र, ख़्वारिज्म, खुरासान, इराक और पश्चिम की राजशाही से करेंगे तो भी इसके दरबार के वैभव से चमत्कृत हुए बिना नहीं रह पाएंगे। बरनी ने लिखा है कि चूंकि बलबन के सुल्तान बनने के पहले सल्तनत का हाल खराब हो चुका था,कोष खाली था, अश्वशाला में घोड़े नहीं थे और सल्तनत की पूंजी और उसके संसाधन इल्तुतमिश के तुर्की गुलामों में बंट चुके थे जो अब खुद को खान बताने लगे थे तो सुल्तान बनने पर बलबन के लिए सुल्तान और सल्तनत दोनों की प्रतिष्ठा और हैसियत को पुनर्स्थापित करना बहुत जरूरी था। इसके लिए उसने बहुत से काम किये जिनमें से एक काम दरबार की हैसियत बनाना भी था।
अब मैं उसके दरबार के दृश्य वर्णन लिखता हूँ।
दिल्ली सल्तनत का सुल्तान ग़ियासुद्दीन बलबन सिर्फ़ तलवार का शासक नहीं था, बल्कि अपने दरबार और शानो-शौकत से भी दिलों पर राज करता था।
जब वह सिंहासन पर बैठता तो दृश्य बिजली-सा चमक उठता।
चारों ओर नंगी तलवारें, दमकता हुआ चेहरा और सिंहासन पर बैठे सुल्तान बलबन की काफ़ूर जैसी सफ़ेद दमकती हुयी दाढ़ी…
उसके सामने आते ही अमीर, सरदार, दूत – सबके दिल दहल जाते।
दरबार का शोर इतना गगनभेदी होता कि दो कोस दूर तक नक्कारों की थाप और उद्घोष गूँजते।
और तभी चारों ओर से बुलंद आवाज़ उठती
“बिस्मिल्लाह…”
जिसे सुनकर दूर-दराज़ के लोग भी कांप उठते।
दरबार में अनुशासन का आलम ये था कि हर व्यक्ति – मंत्री, अमीर, गुलामों के सरदार – सभी अपने तय स्थान और पदक्रम के अनुसार खड़े रहते।
उत्सवों में नज़ारा और भी अलौकिक होता।
दो नमाज़ों के बीच बलबन स्वयं दरबार में बैठता और उसके सामने सेवक, महिलाएँ, सामंत, मंत्री और उमरा क्रम से गुजरते।अपने स्थान ग्रहण करने को जब वह लोग आते तो उनके नाम और पद ऊँची आवाज़ में पुकारे जाते और हर शब्द से बलबन का रौब और बढ़ जाता।
चारों ओर – सोने-चाँदी के बर्तन, जरीदार पर्दे, रंग-बिरंगे कपड़े, दुर्लभ फल, शरबत और शाही भोजन।
संगीत, कवियों की हास्य रचनाएँ और गायक दरबार को जीवंत बना देते।
लोग कई दिन तक उसी सजावट और उत्सव की चर्चा करते रहते।
और जब हाथियों और घोड़ों की शाही सवारी, जंगी सामान और जुलूस निकलता, तो दिल्ली की गलियाँ गवाह बनतीं।
कई दिनों तक लोग सिर्फ़ उसी की बातें करते और कहते –
“इतना वैभव और रौब तो किसी और बादशाह ने कभी न देखा।”
बलबन का विश्वास था –
“जहाँ बादशाह की शानो-शौकत और डर का असर न हो, वहाँ न राज्य की प्रतिष्ठा रह सकती है और न ही प्रजा का आज्ञापालन।”
ज़रा सोचिए…
अगर आप उस दरबार में होते, जहाँ तलवारें चमक रही हों,
“बिस्मिल्लाह” की गूँज कानों में गूंज रही हो,
हर दरबारी का नाम और पद पुकारा जा रहा हो,
चारों ओर सजावट, फल-शरबत और सोने-चाँदी की चमक बिखरी हो,
और बाहर हाथियों-घोड़ों की शाही सवारी हो…
तो क्या आप उस वैभव से मोहित हो जाते या बलबन के रौब से डर जाते?
इतिहास गवाह है – बलबन का दरबार सिर्फ़ सत्ता नहीं, बल्कि भय, वैभव और अनुशासन की अद्वितीय मिसाल था।
बलबन का न्याय, उसकी वसीयत आदि तमाम बातों के किस्से बहुत रोचक और जानने योग्य हैं पर उनकी चर्चा फिर कभी।
आज की पोस्ट में बस इतना ही।
अगली पोस्ट में फिर एक नया किस्सा होगा।
इधर कुछ लोगों ने मुझको फोन और मैसेज करके कहा है कुछ पुरानी परंपराओं, कहानियों और मिथकों पर भी लिखिए तो मेरा प्रयास होगा कि मैं आगे चलकर उस विषय में भी कुछ पोस्ट लिखूँ।
धन्यवाद।
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