इतिहास और संस्कृति के किस्से-26आज आगरा की बात:- कुछ मिथक, कुछ इतिहास
इतिहास और संस्कृति के किस्से-26
आज आगरा की बात:- कुछ मिथक, कुछ इतिहास
क्या आपको पता है कि आगरा को सबसे पहले किसने हिंदुस्तान की राजधानी बनाया?
क्या आपको पता है कि आगरा का सम्बंध रेणुका आश्रम और भगवान परशुराम से भी बताया गया है?
क्या आप जानते हैं कि महाकवि सूरदास का भी आगरा से सम्बन्ध था?
क्या आपको पता है कि आगरा के चार प्रमुख शिव मंदिर शहर की सीमाओं या कोनों पर स्थित हैं – मनकामेश्वर मंदिर, बल्केश्वर मंदिर, कैलाश मंदिर और रावली मंदिर। इनमें से पहले दो मंदिर यमुना नदी के तट पर बने हैं?
क्या आपको पता है महमूद गजनवी ने आगरा पर भी हमला किया था?
क्या आपको पता है कि आगरा पर मराठों का भी अधिकार रहा?
क्या आपको पता है कि 6 जुलाई सन 1505 ईस्वी को आगरा में एक विनाशकारी भूकम्प आया था जिसने बहुत तबाही की थी?
आगरा के स्व0 सतीश चंद्र चतुर्वेदी जी ने अपनी किताब ‘आगरानामा’ में आगरा के विषय में काफी बातें बहुत शोध करके लिखी हैं। उन्होंने लिखा है कि ‘तारीखे दाउदी’ बताती है कि आगरा का सम्बंध महाभारत काल से था और आगरा मथुरा के राजा कंस के साम्राज्य के अंतर्गत आता था। आगरा के गजेटियर के अनुसार भी महाभारत काल में आगरा का उल्लेख मिलता है।
स्व0 चतुर्वेदी जी ने अपनी पुस्तक में मुगलकालीन ग्रन्थ मेघविजय कृत ‘युक्ति-बोध’ का हवाला देते हुए लिखा है कि संस्कृत लेखकों ने आगरा का नाम ‘उग्रसैनपुर’ भी लिखा है जिसका सम्बन्ध कंस के पिता से जुड़ता है। कहा तो ये भी गया है कि आगरा में भी कंस का एक कारागार था। पुराने ग्रंथों में आगरा को अर्गलपुर भी लिखा जाता था।
आगरा नाम का सम्बंध महर्षि अंगिरा और आंगिरस से भी जोड़ा जाता है। ‘श्रीमद्भागवत’
(छटा स्कंध-प्रथम खंड) में एक कथा में शूरसैन जनपद, महर्षि अंगिरा और यमुना के तट का जिक्र आया है। उस कहानी के अनुसार शूरसैन देश के राजा चित्रकेतु के सन्तान प्राप्ति के लिए महर्षि अंगिरा ने त्वष्टा देवता के लिए ‘त्वष्टा यज्ञ’ कराया था। यज्ञ प्रसाद के फलस्वरूप एक रानी के लड़का हुआ जिसको जलनवश दूसरी रानी ने विष दे दिया और वह बच्चा मर गया। कथा के अनुसार अंगिरा ने यमुना तट पर इसका प्रायश्चित किया था और यह यमुना तट ‘चित्राहट’ आगरा जनपद में बटेश्वर का निकटवर्ती स्थान था।
आगरा के पास रेणुका (रुनकता जहाँ ) तथा सिकंदरा के पास यमुना तट पर कैलास मंदिर आगरा के पौराणिक स्थल हैं। जिनका सम्बन्ध महर्षि परशुराम से बताया गया है। सतीश चतुर्वेदी जी ने आगरा गजेटियर का हवाला देते हुए लिखा है कि वेनसन ने और हैमिल्टन ने भी आगरा का सम्बन्ध महर्षि परशुराम से माना है।
चौरासी वैष्णवन की वार्ता' के आधार पर भगवान श्रीकृष्ण के भक्त प्रसिद्ध कवि सूरदास का जन्म रुनकता अथवा रेणु का क्षेत्र (वर्तमान जिला आगरा में ) में हुआ था। मथुरा और आगरा के बीच गऊघाट पर ये निवास करते थे।
महमूद गजनवी ने आगरा पर भी आक्रमण किया था। ख्वाजा मसूद बिन सुलेमान जिन्होंने आगरा के दुर्ग के सामंत जयपाल और महमूद के उन पर आक्रमण का वर्णन किया है। उनके अनुसार आगरा का किला पहाड़ी की रेत पर बना हुआ था। उस किले की दीवारें पहाड़ियों सदृश थीं। तारीखे दाउदी के अनुसार महमूद ने आगरा का इतना बुरा हाल किया था कि वह एक बेकार सा गांव मात्र होकर रह गया था।
बहलोल लोधी की मृत्यु के बाद जब उसका पुत्र सिकन्दर लोधी राजा बना तो उसका राज्याभिषेक सम्भवतः वर्तमान आगरा जिले की काली नदी के एक टीले पर ही हुआ था। सिकन्दर लोधी ने पहले बयाना को अपनी राजधानी बनाया था।
फरिश्ता के अनुसार आगरा हिंदू या मुसलमानों किसी के समय में भी पहले कभी राजधानी नहीं रहा था और सिकन्दर लोधी के समय में भी बयाना के ही अंतर्गत था। सुल्तान सिकन्दर लोधी नरवर और ग्वालियर को जीतना चाहता था तो उसने हिसार सीरी जो दिल्ली का नाम था (फरिश्ता) उसको छोड़ कर आगरा को अपनी राजधानी बनाया (1503)। फरिश्ता लिखता है कि, “ 1504 ईस्वी में जब सितारा सुहेल (एक प्रसिद्ध सितारा जिसकी यमन देश में मान्यता है कि उसके निकलने पर चमड़े में सुगन्ध पैदा होती है और कीड़े मर जाते हैं) ने निकल कर विजय का संदेश दिया तो बादशाह मण्दरायल का किला जीतने के विचार से आगरा चला गया।”
स्व0 सतीश चतुर्वेदी जी ने आगरानामा में मखजन ए अफगानी और तारीखे खानजहाँ लोधी के हवाले से बताया है कि सिकन्दर लोधी ने सन 1491 ईस्वी में आगरा पर अधिकार कर लिया था और तब भी इस नगर का नाम आगरा ही था।
कहते हैं कि सिकन्दर लोधी ने रणनीतिक कारणों से यमुना तट पर एक नगर बसाना चाहा। कुछ निरीक्षकों को उपयुक्त स्थान की खोज के काम पर लगाया गया और उन्होंने उस स्थान का चुनाव किया जहाँ आज आगरा आबाद है।
फरिश्ता ने लिखा है कि, “ (6 जुलाई 1505) इतवार के दिन आगरा में हिंदुस्तान का सबसे बड़ा भूकम्प आया। इससे पहले ऐसा भूकम्प कभी नहीं आया था। पहाड़ हिल गए, भवन धराशायी हो गए और जीवित लोगों के लिए मानो प्रलय का दिन आ गया हो। इसके बाद या पहले ऐसे भयंकर भूकम्पों का पता नहीं चलता है। उस दिन हिंदुस्तान के दूसरे शहरों में भी भूकम्प आया था।
सिकन्दर लोधी ने आगरा में एक मजबूत किला भी बनाया था (नेविल)। ऐसा हो सकता है कि यह किला वहाँ स्थित बादलगढ़ किले के ऊपर या निकट बनवाया गया हो।
इब्राहीम लोधी ने भी आगरा के किले में एक महल बनाया था (तारीखे अल्फ़ी)।
बाबरनामा में बाबर ने भी आगरा पहुँचने का जिक्र किया है और उसने यहाँ एक बाग ‘हिश्त-बहिश्त’ लगवाया जिसको बाद में ‘आरामबाग’ कहा जाने लगा और मराठों ने इसका नाम ‘रामबाग’ कर दिया। बाबरनामा में आगरा में इब्राहीम लोधी की इमारतों और कोट के बीच दस गज लंबा और दस गज चौड़ा एक महल भी बनवाया था।
इसके बाद आगरा पर हुमायूँ और फिर शेरशाह सूरी का, अकबर का और फिर मराठों का भी अधिकार रहा लेकिन यह अकबर का ही समय था जब आगरा विश्व के सबसे सम्पन्न और शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक की राजधानी बना।
ताजमहल की चर्चा किसी पोस्ट में अलग से करेंगे।
आज की पोस्ट में बस इतना ही
अगली कड़ी में फिर मिलेंगे कुछ नए किस्सों के साथ
यहाँ मैं यह बताना चाहूँगा कि कुछ समय पहले एक दिन मेरी Heramb भाईसाहब से कुछ चर्चा हो रही थी तो उन्होंने स्व0 सतीश चंद्र चतुर्वेदी (किनारी बाज़ार, आगरा वाले) का और उनके अद्भुत ग्रन्थ आगरानामा का जिक्र किया। मैंने स्व0 सतीश चंद्र चतुर्वेदी जी के पुत्र श्री Chandraditya Chaturvedi जी से सम्पर्क किया और उनसे इस विषय में चर्चा की। इसके बाद फिर एक दिन उनसे मिलने मैं आगरा गया, उनके सद्व्यवहार की जितनी प्रशंसा की जाए कम होगी साथ ही उनके और उनकी पत्नी रेनू जी द्वारा की गई आवभगत और खातिरदारी का भी क्या कहना। उन्होंने मुझको ‘आगरानामा’ के साथ ही साथ अपने स्व0 पिता जी और स्व0 बाबा प्रसिद्ध कवि और साहित्यकार पंडित हृषिकेश चतुर्वेदी की कुछ और अमूल्य पुस्तकें भी दीं जिनका जिक्र आगे किसी लेख में करूंगा। इसके लिए हेरम्ब भाईसाहब और चन्द्रादित्य जी का बहुत बहुत आभार।
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