इतिहास और संस्कृति के किस्से-32. रामायण:समुद्र पर सेतुबंध
इतिहास और संस्कृति के किस्से-32
रामायण:समुद्र पर सेतुबंध
श्रीराम कथा में समुद्र पर सेतु बांधना एक बहुत रोचक और विस्मयकारी घटनाक्रम है। जैसा मैं पहले भी कह चुका हूँ कि रामायण विषयक इन लेखों में मेरा मूलसोर्स महाकवि वाल्मीकि रचित श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण है और अन्य ग्रन्थों के अलावा मैंने फादर कामिल बुल्के की ‘रामकथा’ की भी मदद ली है और हाँ आप इसको इतिहास मानें या मिथक यह विषय आप पाठकों का है लेकिन महाकवि वाल्मीकि की अद्भुत रचना का आनन्द भी अद्भुत ही है।
तो आज वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के सर्ग 11 और 12 से चर्चा सेतुबंध की:-
अपने सारे साथियों और सेना के साथ श्री रामचन्द्र जी समुद्र किनारे पहुँच गए थे। रामचन्द्र जी ने समुद्र के तट पर कुशा बिछाई और महासागर के समक्ष हाथ जोड़ कर पूर्वाभिमुख होकर वहाँ लेट गए। वाल्मीकि जी ने वर्णन किया है कि अयोध्या में अनेकों किस्म के आभूषणों से सुसज्जित रहने वाले रामचन्द्र जी अपनी दाहिनी बाँह को तकिया बना कर उस कुशासन पर सो गए। भगवान राम ने तीन दिनों तक समुद्र की प्रार्थना की किंतु समुद्र उनके सामने उपस्थित नहीं हुए। इस पर रामचन्द्र जी ने समुद्र पर कुपित होते हुए अपने पास खड़े शुभलक्षणों से युक्त लक्ष्मण जी से कहा कि समुद्र को अपने ऊपर बहुत अहंकार है। शांति,क्षमा,सरलता और मधुर भाषण ये जो सत्पुरुषों के गुण हैं,इनका गुणहीनों के प्रति प्रयोग करने पर यही परिणाम होता है कि वे उस गुणवान पुरुष को भी असमर्थ समझ लेते हैं।इस प्रकार की बातें करते हुए रामचन्द्र जी ने कहा कि अब मैं अपने बाण से इस को खण्ड-खण्ड कर दूंगा और इस समुद्र में रहने वाले प्राणियों जैसे सर्प,मत्स्य,जलहस्ति,शंख,मगर सभी के टुकड़े-टुकड़े करके इस समुद्र को सुखा देता हूँ। इसके बाद भगवान राम ने अपने धनुष को धीरे से दबा कर उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी और उसकी टन्कार से सारे जगत को कम्पित करट्ठे हुए बड़े भयंकर बाण छोड़े। इस घटनाक्रम से समुद्र में हाहाकार मच गया। उधर जब रामचन्द्र जी ने दुबारा अपने धनुष को खींचा तो वाल्मीकि रामायण के अनुसार सुमित्रानन्दन लक्ष्मण उछलकर उनके पास पहुँचे और बोले,”बस,बस, अब नहीं, अब नहीं” ऐसा कहते हुए उन्होंने धनुष को पकड़ लिया। जो देवऋषि और महाऋषि इस घटनाक्रम को देख रहे थे वह भी चिल्ला उठे,” हाय!यह तो बड़े कष्ट की बात है।अब नहीं,अब नहीं।” उधर रामचन्द्र जी का क्रोध अभी शांत नहीं है और वह कह रहे हैं,” सागर!मेरे बाणों से तुम्हारी सारी जल राशि दग्ध हो जाएगी।तू सूख जाएगा और तेरे भीतर रहने वाले सब जीव नष्ट हो जाएंगे।उस दशा में तेरे यहाँ जल के स्थान में विशाल बालुकाराशि पैदा हो जाएगी।” उधर समुद्र में हाल बुरा था, उसमें रहने वाले जीव-जंतु भय और कष्ट से थर-थर काँप रहे थे। समुद्र अपने भीतर रहनेवाले प्राणियों,तरंगों,सर्पों और राक्षसों सहित सहसा भयानक वेग से युक्त हो गया और यद्यपि यह प्रलय का समय नहीं था किंतु समुद्र अपनी मर्यादा लांघ कर एक-एक योजन आगे बढ़ गया। समुद्र के इस भयंकर रूप में आजाने पर भी रामचन्द्र जी अपने स्थान से पीछे नहीं हटे।
तब समुद्र के बीच से सागर स्वयं मूर्तिमान होकर प्रकट हुआ जैसे मेरुपर्वत पर उदयाचल से भगवान सूर्यदेव उदित हुए हों।चमकीले मुखवाले सर्पों के साथ समुद्र का दर्शन हुआ। यहाँ समुद्र का वर्णन करते हुए वाल्मीकि जी ने लिखा है कि समुद्र का वर्ण स्निग्ध वैदूर्यमणि के समान श्याम था।उसने जाम्बूनद नामक सुवर्ण के बने आभूषण पहन रखे थे। (इस बात से पता चलता है कि महृषि वाल्मीकि के समय में सुवर्ण के भी कई प्रकार हुआ करते थे)। समुद्र ने लाल पुष्पों की माला और लाल ही वस्त्र धारण किये हुए थे। समुद्र ने निकट आ कर भगवान राम को सम्बोधित किया और हाथ जोड़ कर बोला,” है सौम्य रघुनन्दन! पृथ्वी,वायु,आकाश,जल और तेज-ये सर्वदा अपने स्वभाव में स्थित रहते हैं। अपने सनातन मार्ग को कभी नहीं छोड़ते हैं। मेरा भी यही स्वभाव है। मैं अगाध और अथाह हूँ, कोई मेरे पार नहीं जा सकता है। यदि मेरी थाह मिल जाये तो यह मेरे स्वभाव का व्यतिक्रम होगा। इसलिए मैं आपको पार होने का उपाय बताता हूँ। इस पर रामचन्द्र जी ने कहा कि मैं अपने इस अमोघ बाण को कहाँ छोडूं तो समुद्र ने कहा कि,”मेरे उत्तर में द्रुमकुल्य नामक एक बड़ा ही पवित्र देश है वहाँ आभीर आदि लोग निवास करते हैं जो पापी और लुटेरे हैं तो आप अपने बाण को उधर ही छोड़िए।”
इसके बाद समुद्र ने बताया कि रामचन्द्र जी की सेना में जो नल नामक वानर है वह विश्वकर्मा का पुत्र है (वाल्मीकि रामायण में सिर्फ नल की चर्चा है इस विषय में नील की कोई चर्चा नहीं है)। यह वानर नल शिल्पकर्म में समर्थ है अतः यह मेरे ऊपर (समुद्र के) पुल का निर्माण कर सकता है और मैं उस पुल को धारण करूंगा। इसके बाद नल के नेतृत्व में पुल बनना शुरू हो गया।
वाल्मीकि जी लिखते हैं कि पर्वत के समान विशालकाय वानाराशिरोमणि पर्वत शिखरों और वृक्षों को तोड़ देते और उन्हें समुद्र तक खींच लाते। वे साल,अश्वजर्न,ध्व,बाँस, कुटज,अर्जुन,ताल,तिलक,बेल,छितवन,खिले हुए कनेर,आम और अशोक आदि वृक्षों से समुद्र को पाटने लगे। महाकाय वानर हाथी के समान बड़ी-बड़ी शिलाओं और पर्वतों को उखाड़ कर यंत्रों,विभिन्न साधनों द्वारा समुद्र तट पर ले आते थे। पहले दिन उन्होंने 14 योजन लंबा पुल बांधा। दूसरे दिन तेजी से काम करके 20 योजन पुल तैयार करवा दिया। तीसरे दिन इन महाकाय कपियों ने 21 योजन पुल बांध दिया। वाल्मीकि जी बताते हैं कि चौथे दिन इन महाबली वानरों ने 22 योजन पुल और बाँध दिया। अब वानरों का उत्साह बढ़ता जा रहा था और इन वानर वीरों ने पाँचवे दिन सुवेल नामक पर्वत के निकट तक 23 योजन पुल बना दिया और इस प्रकार 100 योजन लंबा यह पुल वानर वीर और विश्वकर्मा के औरस पुत्र नल के मार्गदर्शन में तैयार कर दिया गया। यह पुल 100 योजन लंबा और 10 योजन चौड़ा था।
आज की पोस्ट में इतना ही
अब अगली कड़ी में मुलाकात होगी कुछ और किस्सों और मिथको के साथ
नोट:-यदि आप रामसेतु के विषय में विस्तार से पढ़ना चाहें और इसके साहित्यिक पहलू के साथ-साथ वैज्ञानिक पक्ष भी तो नीचे दिए मेरे ब्लॉग के लिंक पर क्लिक करके उसको विस्तार से पढ़ सकते हैं धन्यवाद।
https://atulchaturvedifzd.blogspot.com/2023/07/blog-post_28.html
Comments
Post a Comment