इतिहास और संस्कृति के किस्से-25. आज का किस्सा बाबरनामा से

इतिहास और संस्कृति के किस्से-25

आज का किस्सा बाबरनामा से

✨ बाबरनामा : इतिहास भी  और साहित्य भी

बाबरनामा इस्लामी दुनिया और भारतीय उपमहाद्वीप की पहली आत्मकथा भी कही जाती है। यह केवल इतिहास नहीं, बल्कि बाबर के जीवन, युद्धों, और उसके द्वारा लिखा समाज और प्रकृति का सजीव चित्रण है। साहित्यिक दृष्टि से भी इसे विश्व की श्रेष्ठ आत्मकथाओं में गिना जाता है — संवेदनशील, बारीक और गहन शैली इसे अद्वितीय बनाती है।
ताज्जुब होता है कि बाबर जैसा क्रूर आक्रमणकारी कैसे इतना अच्छा साहित्यकार भी था लेकिन वो कहा है ना
“हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना”
हाँलाँकि बाबर को कितनी ही बार देखें उसकी छवि की नकारात्मकता तो दिखती ही है।
खैर, बाबरनामा को मुग़ल इतिहास की नींव कहा जा सकता है और बाबर की आत्मा का आईना भी।
 
बाबर ने लिखा है कि, 
“परेशान जमई व जमई परेशाँ,
गिरफ्तार कौमे व कौमे अजायब।”

यानी विकल व्यग्र दल, व्यग्र तल अंतरात्मा,
सकल जाति बंदी, सकल जग अपरिचित।

बाबर ने जब पानीपत पहुँच कर दिल्ली के बादशाह इब्राहिम लोधी से युद्ध हेतु अपना डेरा डाला तब का वर्णन करते हुए बाबर कहता है कि उसके लश्कर के कुछ लोगों में डर समा गया था पर उसके हिसाब से यह बेहूदा बात थी। घर छोड़े दो तीन महीने हो गए थे। ऐसे स्थान और ऐसे लोगों से वास्ता पड़ गया था जो कि नितांत अपरिचित थे। न बाबर आदि यहाँ की बोली के जानकार थे और न ही वह लोग बाबर आदि की भाषा समझते थे, बड़ी विचित्र स्थिति थी। 
इब्राहिम लोधी की सेना के विषय में बाबर लिखता है,”बैरी की गिनती एक लाख की जाती थी। उसके हाथी एक हजार बताए जाते थे और उसके पास दो पुश्तों के पुरखों का माल  भरा पड़ा था।” लेकिन इब्राहिम लोधी मक्खीचूस था, बाबर कहता है कि वह रुपये का एक ही सुख जानता था, ताले में बंद रखने का सुख। उसने लड़ाई के लिए सेना की जैसी तैयारी, व्यवस्था करनी थी वह नहीं की। उसने लड़ाई का कोई सामान नहीं किया, न बढ़ने का न टिकने या भागने का। बाबर लिखता है कि,”जब हम पानीपत में अराबों, खाइयों और झाँकड़ों के झमेले से उलझे थे तब उसको हम पर टूटने की सूझी ही नहीं। कोई भी जानकार लड़वैय्या ऐसी गहरी चूक कभी न करता।”
अब युद्ध के विवरण को देखिए

बाबरनामा : पानीपत की लड़ाई

जब बाबर ने अपनी सेना सजाई तो सामने ख्वाजा कलाँ, सुल्तान महमूद दूलदाई, हिंदू बेग, वाली खाजीन और पीर कुली सीस्तानी थे। बाएँ हिस्से में – मुहम्मदनसुलतां मिर्ज़ा, मेहंदी ख्वाजा, आदिल सुल्तान, शाह मीर हुसैन, सुल्तान जुनैद विरलास, मुहम्मद कोकताश आदि थे। बाबर ने बहुत नाम दिए हैं पूरे व्यूह की रचना बताई है कि दाएँ हिस्से में कौन-कौन था और बायीं पाख में कौन लोग थे आदि।
बाबर लिखता है कि युद्ध आरम्भ हुआ। मेहदी ख्वाजा ने हाथियों के साथ धावा बोला लेकिन तीरों की बौछार से पीछे हटना पड़ा। बाबर ने अपनी फौज को दोनों ओर से मोड़ा। बाएँ हिस्से ने दुश्मन को दबाया और दाएँ हिस्से ने भीषण हमला किया। तोपों और तीरों की बौछार से दुश्मन अपनी ही पांतों में धकेल दिया गया। तलवारें खिंच आईं और दुश्मन के पास भागने का कोई रास्ता न रहा। बाबर बताता है कि कूल की बायीं पाख से मुस्तफा तबाची ने ‘जर्बजन’ यानी छोटी मैदानी तोप से बहुत जबरदस्त गोलाबारी की। उस्ता अली कुली तोपची ने तुर्किश गोलन्दाजी की रणनीति के अनुसार तोप गाड़ियों को जंजीरों और फीतों से बाँधा जिन्हें चाबुक की तरह ऐंठन दी गयी थी। दो तोप गाड़ियों के बीच में छह या सात बचाव की चौकियां थीं जिनकी आड़ में बंदूकची बंदूक चला रहे थे। तोप गाड़ियां आगे सुरक्षा के लिए थीं जबकि घुड़सवार और पैदल फौज पीछे से आकर आक्रमण कर रही थी।
यहाँ ध्यान रखने की बात है कि लड़ने वाली दोनों फौजें मुसलमान शासकों की ही थीं। बाबर लिखता है कि हाँलाँकि बैरी ने दाएं और बाएं दोनों हिस्सों पर चोट की लेकिन फिर तोप के बरसते गोलों की आड़ में बाबर की सेना ने ऐसे तीर चलाये और तलवारें लपलपायीं कि इब्राहिम लोधी की सेना न बढ़ पा रही थी और ना ही भागने की रास्ता उसको मिल रही थी। उनके हाथी परेशान होकर खुद की यानी इब्राहीम की सेना को ही कुचलने लगे। इस लड़ाई में बाबर के तोपखाने और बेहतर  युद्ध तकनीक ने आने वाले समय के लिए हिंदुस्तान और बाबर के खानदान के भविष्य को बदल दिया। 
इस युद्ध में भारत में एक नए खानदान के राज्य की नींव रखी गयी जिसके लोग यहाँ आये और उनकी संतानें  यहीं की मिट्टी की हो गईं। ये खानदान अब आने वाले लगभग 331 वर्ष भारत पर राज्य करने वाला था हाँलाँकि बाबर ने तब यह सोचा होगा कि वह जो अपने घर (समरकंद) पर राज्य नहीं कर सका वह एक ऐसे राज्य की नींव रख रहा है इस पर तो संदेह है पर इतिहास बताता है कि हुआ यही।

मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं ने इस युद्ध के वर्णन में लिखा है कि, ”.... रज्जब माह की आठवीं तारीख जुम्मे के दिन बड़ी फौज के साथ सुल्तान इब्राहीम, सिकन्दर  वाली पीतल की दीवार की तरह मजबूत ,लोहे का जिरह बख्तर पहने लड़ने बाहर आया।”

बाबरनामा में बाबर ने युद्ध को वर्णित करते हुए लिखा है कि, "सूरज के भाले भर उठने पर लोहा बजा था। दोपहर तक घमासान लड़ाई मची रही थी। धूल के बादल ऐसे थे कि घुड़सवार का हाथ न सूझे। इतना भीषण हमला शुरु न हुआ था कि वे बुरी तरह कुचल डाले गए। हमारा भला चाहने वाले उमंग और उत्साह में बांसों उछल रहे थे। कह रहे थे कि अल्लाह ताला की मेहरबानी ने काम ऐसा आसान कर दिया कि देखने वाला अचम्भित हो जाए।" दोपहर होते-होते इब्राहिम लोधी की विशाल सेना धूल में मिल चुकी थी। 
कहीं मैंने यह भी पढा है कि जब इब्राहीम की सेना हारती लगी तो उससे उसके साथियों ने उस वक़्त युद्ध क्षेत्र से निकल जाने को कहा कि बाद में और सेना लेकर इनसे मोर्चा ले परन्तु इब्राहिम लोधी ने कहा कि यहाँ मेरे साथी मारे गए हैं तो मैं या तो जीतूंगा अथवा यहीं शहीद हो जाऊँगा। 
इस युद्ध में बाबर का जज़्बा, रणनीति और तकनीक बेहतर साबित हुए । पाँच-छह हजार सैनिक तो इब्राहिम लोधी के पास ही एक ही जगह मरे पड़े थे। जिधर निगाह जा रही थी लाशों के टीले लगे पड़े थे।
लड़ाई के बाद पता चला कि पंद्रह–सोलह हज़ार क़त्ल हुए पर आगरा जाने पर हिंदुस्तानियों से पता चला कि पचास–साठ हज़ार सैनिक काम आए। भागने वालों का पीछा किया गया। बहुत-से अमीर और सरदार पकड़े गए। पहले लगा कि इब्राहिम लोधी भाग गया लेकिन सच यह था कि इसी युद्ध में सुल्तान इब्राहीम लोदी मारा गया। उसकी लाश वहीं मैदान में लाशों की ढेरी में मिली जहाँ और भी ढेर-सी लाशें थीं। बेर खलीफा के छोटे साले ताहिर तीबरी ने इब्राहीम की लाश को पहचाना और उसका सर काट कर बाबर को लाकर दिखाया।
बदायूनीं लिखता है कि, “इस घटना (युद्ध) को हुए लगभग 40 वर्ष के बराबर हो चुके हैं जब इस मुन्तख़ब की रचना की जा रही है, संघर्ष का शोर और लड़ाकों की चिल्लाहट जंग के मैदान से अभी भी रात्रि को यात्रियों को सुनाई देती है।” वह आगे लिखता है कि, “हिजरी 997 (1588 ईस्वी) में इस पृष्ठ का लेखक (बदायूनीं) एक दिन सुबह लाहौर से फतहपुर की ओर जा रहा था और उसे वह मैदान पार करना पड़ा तो तो उसे वह डरावना शोर सुनाई पड़ा और सहयात्रियों ने सोचा कि कोई दुश्मन उस तरफ है। मैंने जो खुद अपनी आँखों से देखा उसका वर्णन किया है। इस रहस्य को ईश्वर पर छोड़ते हुए हम अपने रास्ते पर आगे बढ़ गए।”
बाबर ने लिखा है कि हुमायूँ को उसी (विजय वाले) दिन आगरा भेजा ताकि खजाने पर कब्जा किया जा सके और बाबर ने अगले दिन यमुना पार की और दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की मजार की जियारत मंगलवार को की और उस रात को दिल्ली के किले की सैर की। बुधवार को हज़रत ख्वाजा कुतुबुद्दीन की मजार पर जियारत की। इसके बाद बाबर दिल्ली सल्तनत के मशहूर सुल्तान बलबन, अलाउद्दीन खिलजी और सुल्तान बहलोल और सिकन्दर लोधी के मकबरों पर गया तथा उसने वहाँ की प्रसिद्ध इमारतों और बगीचों की सैर की। बाबर हिंदुस्तान जैसे मुल्क के मुस्लिम शासक इब्राहिम लोधी पर जीत हासिल करने के बाद जैसे बड़े, बुजुर्गों और ईश्वर को शुक्रिया अदा कर रहा था।
बाबर ने लिखा है कि इसके बाद वह छावनी में आया और नाव में बैठ कर अरक पिया। इसके बाद दोस्त बेग को दिल्ली का दीवान और वली किज़िल को दिल्ली का शिकदार नियुक्त किया तथा जामा मस्जिद में अपने नाम का खुतबा पढ़वाया।
उधर आगरा में हुमायूँ को विक्रमाजीत राजा (ग्वालियर) के बच्चों ने मशहूर हीरा भेंट किया जो बाद में कोहिनूर नाम से प्रसिद्ध हुआ पर इस हीरे की कहानी फिर कभी लिखी जाएगी। बाबर ने इब्राहिम लोधी की माँ को 7 लाख आय का परगना दिया और आगरा से कोस भर दूर यूर्त यानी रहने को कैम्प करने को मंजूरी दे दी और उसको किले से बाहर उसके पुराने विश्वसनीय नौकर के संग जाने दिया।
अब बाबर दिल्ली का बादशाह हो गया था। बाबर ने हिंदुस्तान का, यहाँ की आबोहवा, पेड़-पौधों, फलों,फ़ूलों आदि का बहुत अच्छा वर्णन किया है जो किसी और कड़ी में लिखेंगे।
आज का ये किस्सा लंबा हो रहा है लेकिन एक घटना और लिखे बिना ये पोस्ट पूरी नहीं लगेगी।
“रसीदा बूद बलाए वले बखैर गुज़श्त” 
अर्थात विपदा पहुँच चुकी थी पर खैर हुयी कि निकल गयी।
दरअसल हुआ यह कि इब्राहिम लोधी की माँ को पता चला कि बाबर हिंदुस्तानियों के हाथ का खाना खाने लगा है। हुआ ये था कि बाबर खाने पीने का शौकीन था और उसने कभी भारतीय खाना देखा नहीं था तो उसने इस घटना से तीन चार महीने बाद इब्राहिम लोधी के बाबरचियों को बुलवाया तो पचास-साठ आये जिनमें से चार बाबर ने रख लिए। खाना बादशाह को दिया जाए उससे पहले चखने वाले (बकाबुल) को उस समय हिंदुस्तान में चाशनीगीर कहा जाता था। बाबर ने लिखा है कि उसके चाशनीगीर का नाम अहमद था और वह इटावा में था। इब्राहिम लोधी की माँ ने उससे सम्पर्क किया और लिखे हुए से लगता है कि अपनी तरफ मिला लिया और उसको एक पुड़िया दी जिसमें जहर था जो बाबर के लिए था। अहमद ने एक हिंदी बावर्ची को चार परगनों का लालच दिया और कहा कि कैसे भी बादशाह को जहर दे दो। बाबर ने लिखा है कि उसने अपने बकाबुल से सावधान रहने को कह रखा था। बहरहाल जितना जहर मिलाना था उसकी आधी पुड़िया ही उस बर्तन में छिड़की  गयी जिसमें फुलके रखे जाते थे और बाकी आधा कलिया (माँस की एक डिश) के प्याले में डालना था लेकिन डालने वाले के हाथ पाँव फूल गए और उसने बचा हुआ चूल्हे में डाल दिया।
बाबर लिखता है, “जुमे का दिन था। खरहा (खरगोश) पका था। कुछ वह खाया और कुछ अंडों का कलिया। पर कोई खाना अच्छा नहीं लगा। जी मतलाने लगा।” बाबर को कुछ उल्टियाँ हुयीं और शक पैदा हो गया। बाबर ने कुत्ते को खाना डलवाया तो कुत्ता भी मरते मरते बचा। बाबर लिखता है कि इस घटना के बाद उसको ऐसा लगा मानो वह फिर से माँ के पेट से पैदा हुआ।
सारे मामले की तफ्तीश की गई तो मामला तो खुलना ही था और मुजरिमों ने जुर्म कुबूल कर लिया। चाशनीगीर की बोटी-बोटी कटवा दी गयी, बाबर्ची की जीते जी खाल उधड़वा दी गयी। एक औरत भी उसमें शामिल थी वह हाथी से कुचलवा दी गयी, दूसरी बंदूक से मार दी गयी। इब्राहीम लोधी की बुढ़िया माँ का माल असबाब, नौकर चाकर गुलाम सब ले लिए गए और फिर उसको तथा इब्राहीम लोधी के बच्चों घरवालों जिनको अभी तक बहुत सम्मान से रखा गया था इस घटना के बाद उन सभी को मुल्ला सरसान के साथ बाहर भेज दिया।
बाबर ने लिखा है
“ ऊलार हालत कि बीतसा ऊल बीलूर जान कदरनी।।” 
जीने का मोल वही जाने,जो कभी मृत्यु के मुख तक पहुँचा हो।।
आज की पोस्ट में बस अब इतना ही
अगली कड़ी में मिलेंगे इतिहास की एक और बात- एक नए किस्से/घटना के साथ


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