इतिहास और संस्कृति के किस्से-20. किस्सा मुगल बादशाह अकबर के बेटे सलीम यानी बादशाह नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर का

इतिहास और संस्कृति के किस्से-20

आज का किस्सा मुगल बादशाह अकबर के बेटे सलीम यानी बादशाह नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर का

इटली से भारत आये यात्री, लेखक और जो बाद में चिकित्सक का भी काम करने लगा निकोलाओ मनूची ने अपने समय के बहुत रोचक वृतांत लिखे हैं जिनसे उस समय के इतिहास, संस्कृति, रहन-सहन, खान-पान, सोच-विचार आदि की अच्छी जानकारी मिलती है। मनूची ईस्वी सन 1656 में भारत 17 वर्ष की अवस्था में आया था और अपनी मृत्यु तक यानी सन 1717 तक वह यहीं रहा। मनूची जब भारत आया तब शाहजहाँ के राज्य का अंतिम दौर चल रहा था लेकिन बातें, जैसी सुनी और समझीं, उसने उस काल के पहले के शासकों के समय की भी लिखी हैं तो आज का यह किस्सा मनूची के लिखे वृतांत से है; जैसा उसने सुना और समझा वैसे का वैसा-

जहाँगीर – हिंदुस्तान का चौथा बादशाह 

क्या आपको पता है कि मुगल बादशाह जहाँगीर:-
-रोज़ा नहीं रखता था
 -शराब पीता था
 -मनूची ने लिखा है कि जहाँगीर सुअर का माँस भी खाता था जिससे सम्बंधित एक घटना का विवरण भी उसने दिया है।
मनूची लिखता है कि इतिहास इस बात की गवाही देता है अक्सर (नालायक) बेटों के हाथों महान बाप की मेहनत मिट्टी में मिल जाती है जैसा कि उसको जहाँगीर के मामले में लगा।

अकबर जैसा महान विजेता और योद्धा गुज़रा तो उसका बेटा सलीम जहाँगीर नाम से गद्दी पर बैठा।
 पर अकबर के विपरीत जहाँगीर में नए विजय अभियानों की कोई चाह न थी। उसने सिर्फ़ अपने पिता की मेहनत के फलों का आनंद लेना पसंद किया।
जहाँगीर बादशाह दावतों, शराब, नृत्य और संगीत का दीवाना था और मनूची को उस वक़्त ऐसा महसूस हुआ जहाँगीर  इन रंग-रैलियों में डूबा था उतना ही उसको इस्लाम धर्म से कुछ लेना देना (गम्भीरतापूर्वक) नहीं था।
मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूनीं ने भी अपनी ‘मुन्तख़ब-उत-तवारीख’ में अकबर बादशाह के विषय में लिखा है कि उसके बहुत से काम और नियम ऐसे थे जो  कट्टरपंथी लोगों को पसंद नहीं थे और बदायूनीं खुद भी उनमें से एक था।

मनूची को भी लगता है कि जहाँगीर ने तत्कालीन कट्टरपंथी विचारधारा वालों का  मज़ाक उड़ाने के लिए कई काम किए । 
  एक बार उसने ईसाई पादरियों को बुलाया और पूछा – “सूअर का मांस कैसा होता है?”
 पादरियों ने कहा – “इसका स्वाद बड़ा अलग और लज़ीज़ है।”
बस, फिर क्या था!

जहाँगीर ने उसी दिन पादरियों के घर जाकर सूअर का मांस और शराब दोनों का स्वाद लिया।
 यह सब उसे इतना भाया कि बाद में कई बार सबके सामने यही करने लगा।
मनूची लिखता है कि जहाँगीर को धर्मगुरुओं ने समझाया कि यह गलत है और हराम है परंतु इस
 पर वह गुस्से में आ गया और उसने सभी धर्मों के  विद्वानों को बुलाकर पूछा –
  “किस धर्म में शराब और सूअर का मांस, दोनों खाने-पीने की छूट है?”
जवाब आया – “सिर्फ ईसाइयों को।”
जहाँगीर ने तुरन्त ऐलान किया कि 

 “ तो मैं ईसाई बनना चाहता हूँ।”
और उसने यूरोपीय कपड़े और टोपी (हैट) बनवाने का हुक्म दिया।

उसके दरबार में उपस्थित विद्वान अवाक रह गए – पर बेबस थे।
रोज़े के दिनों में जब उसके दरबार के लोग दिन भर कुछ नहीं खाते-पीते…
 तो जहाँगीर ठीक दोपहर में दावतें सजाता था और वह उन सबके सामने खाता और अपने दरबारियों को भी बुलाकर खिलाता।
और बेचारे दरबारी….
वे डर के मारे खाते – क्योंकि अगर न मानते, तो शेरों के आगे फेंक दिए जाते!
बादशाह ने अपने दरबार में शेर रखे हुते थे, जिन्हें वह मौत की सज़ा के लिए इस्तेमाल करता।

 जहाँगीर की कई विचित्र आदतों में एक आदत थी कि जब कोई सैनिक सामने आता तो वह उसकी नाक में नुकीली सुई (लैंसट) चुभवा देता।
 अगर सैनिक डर गया तो अपमानित कर दरबार से निकाल देता कि अगर इतनी सी तकलीफ से यह सैनिक डर गया तो आखिर युद्ध-भूमि में यह आखिर लड़ेगा कैसे….
 अगर बिना डरे सह गया, तो उसकी तनख्वाह दोगुनी कर देता।
जहाँगीर कहता –
 “यही असली सिपाही हैं, जो युद्ध के नाम के हक़दार हैं।”
मनूची ने अपने वृतांत में लिखा है कि बहुतों का मानना था कि जहाँगीर सचमुच ईसाई बनना चाहता था।
 कई बार उसने ईसाई पादरियों और मुसलमान विद्वानों की बहस करवाई।
एक बार की घटना है कि बहस हुई और किसी बिंदु पर मुसलमान विद्वान सटीक जवाब न दे सके।
 उनमें से किसी एक नए कहा कि–
 “हमारे तर्क मज़बूत हैं, इसलिए पादरियों की बातें झूठी है।”
तभी एक पादरी ने कहा –
 “मैं अभी सबके सामने साबित कर दूँगा कि मेरी बातें सत्य है।
 वह पादरी बोला कि घास के तिनकों का ढेर लाया जाए। मैं उसमें अपने विश्वास के साथ बैठूँगा और क़ाज़ी जी अपनी आस्था के साथ बैठे। फिर उस घास के ढेर में आग लगाइए। तभी सच्चाई प्रकट होगी।”
निकोलाओ मनूची आगे लिखता है कि यह सुनकर क़ाज़ी काँप उठा।
दरअसल उसे पता था कि जहाँगीर यह प्रयोग ज़रूर करवा देगा। काज़ी महोदय जानते थे कि उनका राजा कैसा है इसलिए वह भयग्रस्त थे जबकि ईसाई पादरी पश्चिम की दुनिया से आया था तो उसको जो स्थिति हो सकती है उसकी भयावहता का अंदाज़ ही शायद नहीं था दूसरे जहाँगीर का झुकाव भी शायद उसकी ओर रहा होगा इसलिए वह निश्चिंत था।
फिर क्या था उसका चेहरा पीला पड़ गया, सिर झुक गया और डर के मारे उसने अपने कपड़े अपवित्र (गंदे-) कर दिए (He defiled himself) जिससे पूरे दरबार में बदबू फैल गई।
 जहाँगीर ने अपनी नाक पकड़ी, दरबारियों ने भी वैसा ही किया।
 क़ाज़ी चुपचाप खड़ा रहा, एक शब्द भी न निकला।
तब जहाँगीर बोला –
 “यह पादरी अपने विश्वास की सच्चाई साबित करने को तैयार है, लेकिन क़ाज़ी डर गया और गलती कर बैठा। सच्चाई इसके पास नहीं है।”
और फिर उसने उस पादरी को नया नाम दिया –
 🔥 “पादरी आतश” 🔥
 (फ़ारसी में आतश का अर्थ है आग, यानी Father Fire)।
इस पादरी का असली नाम था जोसेफ दा कोस्टा (एक पुर्तगाली)।
 लेकिन इसके बाद से वह हमेशा “पादरी आतश” कहलाया।

इन किस्सों से लगता है शायद उस मध्यकालीन युग में भी बहुत से शासको का किसी धर्म या आस्था से कट्टरता से जुड़ाव नहीं था अपितु वह समयानुसार, अपनी सुविधा और मन के अनुसार उसका उपयोग करते, उसका साथ देते-लेते तथा अपने मन के अनुसार उसकी व्याख्या और पालन भी करते। 
शायद सत्ता में रहना ही उनका प्रमुख धर्म था….
दूसरी बात यह भी है कि इस किस्से का लेखक मनूची खुद एक पश्चिमी देश से आया था तो यहाँ के मुकाबले उसकी सोच,समझ और लेखन पश्चिमी सभ्यता और सोच के प्रति नरम होना लाजिमी भी था।

आज के किस्सों में बस इतना ही।
अगली कड़ी में मिलेंगे कुछ नयी बातों के साथ, कुछ नए किस्सों के साथ।

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