इतिहास और संस्कृति के किस्से-31. मुग़ल दरबार के प्रोटोकॉल:- शाहजहाँ का दरबार;आसफखां

इतिहास और संस्कृति के किस्से-31

मुग़ल दरबार के प्रोटोकॉल:- शाहजहाँ का दरबार;आसफखां

हर राज्य या समाज के अपने नियम और परम्परा होते हैं और ये उस व्यवस्था के अभिन्न अंग होते हैं। जब कोई समाज या राज्य मजबूत होते हैं तो ये प्रोटोकॉल भी उतने ही जबरदस्त होते हैं और कमजोर होने पर इनको भी क्षीण होते देर नहीं लगती।
मुग़ल दरबार के भी कानून और कायदे बहुत व्यवस्थित और मजबूत थे,कड़े थे। उस समय के लेखकों ने ऐसी कई घटनाओं का वर्णन बहुत रोचक ढंग से किया है और कभी-कभी तो इन कायदों की परिणिति उन घटनाओं में हुयी जिन्होंने इतिहास बदल दिया या इतिहास रच दिया जैसे मुग़ल दरबार में छत्रपति शिवाजी महाराज का किस्सा, लेकिन उसकी चर्चा किसी और कड़ी में करेंगे, आज बात शाहजहाँ के दरबार की।

आप सबको मालूम ही है कि जब शहजादा खुर्रम जहाँगीर के मरने के बाद आगरा पहुँचा तो कैसे शवयात्रा के रूप में पहुँचा था और वहाँ उसके ससुर आसफखां (मुमताजमहल का पिता और नूरजहाँ का भाई) ने कैसे उसको पहले से तैयार हाथी पर बैठा कर शहंशाह हिंदुस्तान शाहजहाँ बनने में कितना बड़ा,महत्वपूर्ण और मुख्य रोल निभाया था। यहाँ इस बात को लिखने का मकसद यह बताना है कि आसफखां शाहजहाँ का कितना नजदीक और उसके लिए कितना महत्वपूर्ण था।
मुगल दरबार में घुसने, खड़े होने, बोलने हर चीज के कायदे और कानून तय थे और बहुत कड़े थे। बादशाह को सलाम करने, उससे कितनी दूर खड़े होना है, कैसे सलाम करना है आदि सारी चीजें भी नियत थीं।
कोर्निश, तीन बार झुक कर सलाम करना और कितनी बार झुक कर सलाम करना है या कितना झुकना है इसके भी नियम थे। पहले मुग़ल दरबार के नियमों की चर्चा कर लें फिर आसफखां की बात।
दरअसल मुग़ल दरबार केवल सत्ता का केंद्र ही नहीं था, बल्कि एक ऐसा स्थान था जहाँ अनुशासन, शिष्टाचार और वैभव के नियमों के माध्यम से बादशाह की शान-ओ-शौकत और अधिकार प्रदर्शित किए जाते थे।
मुख्य शिष्टाचार और अनुशासन
बादशाह हमेशा एक ऊँचे सिंहासन (तख़्त) पर विराजमान होते, और दरबार में दरबारी और शाहजादे भी अपनी-अपनी हैसियत और पदानुसार दूरी बनाकर खड़े रहते।

दरबार में प्रवेश करते समय सभी जूते उतारते और पगड़ी पहने हुए जाते।

बादशाह के आगमन पर सभी दरबारी क़ोर्निश (दाहिने हाथ को माथे पर रखकर झुकना) और तस्लीम (नम्र झुककर अभिवादन) करते।

दरबार में पूर्ण शांति रहती, बिना अनुमति कोई बोल नहीं सकता था और बिना इजाज़त अपनी जगह छोड़ना अपराध माना जाता था।

हर दरबारी को उचित पोशाक में आना अनिवार्य था। अनुचित वेशभूषा या नशे की हालत में आने पर दंड मिलता था।

दरबार में किसी को भी हथियार ले जाने की अनुमति नहीं थी। बादशाह के तख़्त पर बैठने के बाद कोई नया व्यक्ति अंदर प्रवेश नहीं कर सकता था।

रस्में और सम्मान
विशेष अतिथियों की तलाशी ली जाती, उनका नाम पुकारा जाता और मीर तुज़ुक (समारोह अधिकारी) उन्हें दरबार में सही व्यवहार की हिदायत देता।

पेशकश, नजर (उपहार अर्पण) हर मुलाक़ात में ज़रूरी था, चाहे उपहार छोटा हो या बड़ा। इस परंपरा की शुरुआत अकबर ने की थी।

जब बादशाह किसी दरबारी पर विशेष कृपा करते, तो उन्हें सिंहासन के निकट आने और बादशाह के चरण स्पर्श या पैबोस (पाँव चूमने) की अनुमति मिलती। यह बहुत बड़ा सम्मान माना जाता था।

यदि कोई बादशाह की नज़रों से गिर जाता, तो उसे दरबार से अस्थायी रूप से निष्कासित कर दिया जाता, जो दरबारियों के लिए अत्यंत बड़ी सज़ा थी।

सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियाँ
दरबार केवल राजनीति का केंद्र नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक वैभव का भी स्थल था। यहाँ दावतें, कवि दरबार, संगीत, नृत्य और दार्शनिक/धार्मिक वाद-विवाद होते।

कई बादशाहों के दरबारों में  विभिन्न धर्मों के विद्वानों को आमंत्रित कर चर्चा भी कराई जाती, ताकि सहिष्णुता और सामंजस्य का वातावरण बने और बादशाह की खुले विचारों वाली छवि प्रदर्शित हो।

शाही जन्मदिन, त्यौहार, तोलादान (बादशाह का सोने-चाँदी के बराबर तौला जाना) जैसी रस्में बड़े धूमधाम से होतीं।

इन परंपराओं की नकल प्रांतीय दरबारों ने भी की, जिससे मुग़ल दरबार का वैभव दूर-दूर तक प्रसिद्ध हुआ।

 इस प्रकार मुग़ल दरबार केवल सत्ता चलाने का स्थल नहीं था, बल्कि यह शाही गरिमा, अनुशासन और सांस्कृतिक समृद्धि का जीवंत प्रतीक था।
मुग़ल शासकों ने दरबार की बहुत सी परम्पराएं दिल्ली सल्तनत के दरबारों से ली थीं तो बहुत सी बाबर के समय से चली आ रही थीं। फारस के राजाओं और दरबार के कायदे और परंपराओं का भी मुग़ल दरबार के कायदे कानूनों पर बहुत असर था। इन चीजों को अकबर के समय में बहुत स्पष्ट और व्यवस्थित रूप दिया गया। इसके बहुत किस्से हैं पर आज की बात आसफखां की।
मुग़ल बादशाह के दरबार में वैसे तो कालीन पर सर छुला कर सलाम करने का मौका भी कुछ लोगों को ही मिलता था लेकिन जैसा मैंने ऊपर जिक्र किया है कि जब बादशाह किसी दरबारी पर विशेष कृपा करते, तो उन्हें सिंहासन के निकट आने और बादशाह के चरण स्पर्श या पैबोस (पाँव चूमने) की अनुमति मिलती। यह सबसे बड़ा सम्मान माना जाता था लेकिन जो इससे भी बड़ा सम्मान था और जो बादशाह शाहजहां के ससुर आसफखां को दिया गया वह था (इसकी चर्चा बर्नियर और मनूची ने अपनी-अपनी तरह की है) बादशाह के पैर की सबसे छोटी अंगुली के नाखून को चूमने देने का। ये कोई मामूली सम्मान नहीं था और ये आसफखां का बहुत बड़ा सौभाग्य था कि उसको यह सम्मान मिला और हाँ दरबार के कानून कायदों में रिश्तों का मतलब नहीं हुआ करता था।

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