इतिहास और संस्कृति के किस्से-34 हेमू

इतिहास और संस्कृति के किस्से-34

आज किस्सा है मुगलवंश की तकदीर पलटने के दिन का अर्थात पानीपत के द्वितीय युद्ध में हेमू की हार और अकबर की जीत का

अकबरनामा में इस विषय में जिक्र करते हुए अबुल फजल लिखता है कि, “हे महान ईश्वर! भाग्य कितने विविध रूप दिखाता है और नियति कितनी जटिल है! कोई तिनका भी बिना उद्देश्य के अंकुरित नहीं होता और न कोई पत्ता बिना किसी कारण के हिलता है।”
ऐसा ही एक अवसर था पानीपत का युद्ध, जिसे अबुल फ़ज़्ल ने “बज़्म-ए-रज़्मनामा”—यानी युद्ध-उत्सव—कहा है।
मुग़ल पक्ष का मानना था कि तर्दी ख़ाँ की हार के बाद हेमचंद्र विक्रमादित्य—हेमू—का घमंड बढ़ गया था और उसने अपने पास पचास हज़ार घुड़सवार, एक हज़ार हाथी, इक्यावन तोपें और पाँच सौ फाल्कनें एकत्र कर लीं।
हेमू ने अपने तोपखाने को अपने से आगे  पानीपत भेज दिया जो दिल्ली से तीस कोस दूर था। इस सेना का नेतृत्व मुबारक खान, और बहादुर खान कर रहे थे। इधर मुग़ल फौज के काबिल अफसर लाल खान बदक्शी, कुली उज़्बेक और समानजी खान को मुग़ल नेतृत्व ने आगे जाकर हमला करने को भेज दिया जिसमें अली कुली खाँ शैबानी के लोग भी शामिल हो गए और इन लोगों ने हमला करके हेमू के तोपखाने पर कब्जा जमा लिया और हेमू के लोग बिना लड़े भाग गए।
जब हेमू को इसकी खबर लगी तो उसने अपने आत्मविश्वास के साथ अपनी सेना सजायी और उसको तीन भागों में बांटा। दाहिने हिस्से की कमान शादी खान काकर, बाएं हिस्से का नेतृत्व हेमू की बहन के पुत्र राम्या पर था और सामने के मुख्य दल का नेतृत्व खुद हेमू ने सम्हाला। उसने अपने साथ पहाड़ जैसे अति-विशाल हाथी लिए। इनमें 500 तो बेहतरीन लड़ाकू अति विशिष्ट ‘सीरा’ हाथी थे। ये हाथी अपनी तरह के अद्भुत ही थे और तेज दौड़ने वाले इराक़ी घोड़े भी उनको मात नहीं दे सकते थे। असलियत में उनमें से प्रत्येक हाथी एक बड़ी सेना को अस्तव्यस्त करने में सक्षम था। वे बड़ी से इमारत को गिरा सकते थे और युद्ध में मनुष्यों और घोड़ों को हवा में उछाल कर फेंक सकते थे। ऐसे विशाल हाथियों के साथ हेमू अपनी तीस हजार की राजपूत और अफ़ग़ान वीरों की सेना को लेकर आगे बढ़ा। इन पर्वताकार हाथियों की पीठ पर बंदूकधारी और तीरंदाज मौजूद थे। ये हाथी फौजी समान से सजे हुए थे और उनकी सूंडों पर भाले और बरछियाँ मुस्तैद थीं। इन पर काबिल और वीर महावत सवार थे।
हाथी ‘ग़ालिब जंग’ (Ghalib Jang)
 → सवार: हसन ख़ाँ फ़ौजदार

हाथी ‘गज भनवर’ (Gaj Bhanwar ?)
 → सवार: मैकल ख़ाँ

हाथी ‘जोर बन्यान’ (Jor Banyan) – अत्यन्त शक्तिशाली हाथी
 → सवार: इख़्तियार ख़ाँ

हाथी ‘फ़ौज मदार’ (Fauj Madar)
 → सवार: संग्राम ख़ाँ

हाथी ‘क़ाली बेग’ (Kali Beg) – जिस पर पहले कई बार हेमू स्वयं सवार हुआ था
 → उस दिन चालक: चापान

हाथी ‘हवाई’ (Hawāi ) – सबसे श्रेष्ठ हाथियों में से एक
 → उस दिन हेमू ने अपने प्रिय हाथी ‘हवाई’ (Hawāi ) को चुना, जिस पर वह स्वयं सवार हुआ।
उसकी ये सेना जो तीस हज़ार अनुभवी राजपूत और अफ़ग़ान घुड़सवारों से भरी थी अब युद्ध की हुंकार भर रही थी।
वीर हेमू ने अपने सेनानायकों को प्रेरित किया और युद्ध के लिए आगे बढ़ा।
जब मुग़ल सेना ने यह समाचार पाया कि हेमू पानिपत की ओर बढ़ रहा है, तो बैरम ख़ाँ ने अपनी फ़ौज व्यवस्थित की।
 अकबर स्वयं भी अपने सैनिकों को उत्साहित कर रहा था।
 दोनों सेनाएँ पानिपत के मैदान में आमने-सामने आईं।
युद्ध भयंकर था।
 हेमू गर्व से अपने हाथी ‘हवाई’ पर सवार था।
 उसने अनेक बार धावा बोला और मुग़ल सेना के कई सिपाहियों को पछाड़ा।
लेकिन युद्ध में सौभाग्य हेमू के साथ नहीं था। उसके प्रमुख साथी, भगवान दास को उसकी आँखों के सामने मुग़ल फौज ने काट डाला और शादि ख़ाँ जो बहादुरी से लड़े लेकिन मुग़ल फौज के घोड़ों ने उसको कुचल दिया और वह  युद्धभूमि में मारे गये। युद्ध चल ही रहा था और हेमू का जोर दिख रहा था कि
तभी अचानक— और जैसा अबुल फजल ने लिखा है,
 “भाग्य के धनुष से छोड़ा गया एक बाण हेमू की आँख में लगा और गह्वर को चीरता हुआ सिर के पीछे निकल गया।”
वह तुरंत बेहोश होकर हाथी के होद में गिर पड़ा।
यह दृश्य देखकर उसकी सेना का साहस टूट गया।
 सैनिक भागने लगे और उसकी पूरी सेना बिखर गई।
इसी बीच मुग़ल फौज के शाह क़ुली ख़ाँ और अन्य मुग़ल सैनिक उस हाथी तक पहुँचे।
 वे हाथी को लूट का सामान बनाना चाहते थे, इसलिए महावत को मारना चाहा। उनको पता नहीं था कि इस हाथी पर ही हेमू सवार है पर भाग्य तो अकबर के भविष्य की डोर मजबूत कर रहा था तो 
 डरे हुए महावत ने अपने स्वामी की पहचान करा दी।
 इस तरह हेमू जीवित पकड़ लिया गया।
हेमू को बंधा हुआ अकबर के सामने लाया गया। बैरम खाँ ने अकबर से हेमू की गर्दन काटने का अनुरोध किया।
 अबुल फ़ज़्ल लिखते हैं:
 “सम्राट की उच्च आत्मा ने बंदी की हत्या की अनुमति नहीं दी।”
जब बैरम ख़ाँ ने देखा कि सम्राट ऐसा करने को इच्छुक नहीं हैं तो वह आगे बढ़ा और तलवार से हेमू का सिर धड़ से अलग कर दिया।
हेमू का सिर क़ाबुल भेजा गया ताकि लोग सबक़ लें।
 उसका धड़ दिल्ली में ले जाकर ‘सूली-ए-इबरत’—चेतावनी का फाँसी का चबूतरा—पर लटकाया गया।
इस प्रकार दिल्ली फिर से मुग़ल साम्राज्य के अधीन हो गई।
 लेकिन हेमचंद्र विक्रमादित्य की गाथा केवल पराजय की नहीं है।
 यह उस अदम्य साहस और शौर्य की कथा है जिसने उसे अंतिम क्षण तक रणभूमि का सिंह बनाए रखा।
 उसकी हार ने इतिहास की धारा बदल दी, मगर उसकी वीरता आज भी अमर है।

आज की पोस्ट में बस इतना ही
अगली पोस्ट में मुलाकात होगी किसी नए किस्से के साथ

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