इतिहास और संस्कृति के किस्से-29. अकबर और आधम खाँ का किस्सा
इतिहास और संस्कृति के किस्से-29
अकबर और आधम खाँ का किस्सा
एक बार मेरी हेरम्ब भाईसाहब Heramb Chaturvedi ji से चर्चा चल रही थी और मैंने उनसे पूछा कि आखिर मुग़ल बादशाह रोजमर्रा की बोलचाल में कौन सी भाषा या बोली का प्रयोग करते थे यह जानने की मुझको बहुत उत्सुकता है। भाईसाहब ने इसके लिए कुछ किताबें बतायीं और फिर मुझसे आदरणीय प्रोफेसर हरबंस मुखिया जी की पुस्तक ‘The Mughals of India भी पढ़ने को कहा जो मेरे पुत्र अर्पित दिल्ली से मेरे लिए लाए (2013 में) और इस पुस्तक को पढ़ने से बहुत सी नयी बातें मुझको ज्ञात हुयीं। इस किताब में अकबर और आधम खान वाले प्रकरण में अकबर द्वारा दी गयी गाली मेरे लिए नयी जानकारी थी। इसके बाद मैंने अकबरनामा, आइन-ए-अकबरी, मुन्तख़ब-उत-तवारीख आदि अनेक पुस्तकें पढ़ीं और जितना पढ़ा उतनी जानने की उत्कंठा बढ़ती चली गयी।
आज की पोस्ट में आधम खाँ वाला किस्सा है।
इस घटना का वृत्तांत यह है कि आधम ख़ाँ, जो माहम अनगा का छोटा पुत्र था, वह न तो बुद्धिमान था और न ही अच्छे संस्कारों वाला। वह जवानी और समृद्धि के अहंकार में डूबा रहता था और हमेशा शम्सुद्दीन मुहम्मद अतगा ख़ाँ से ईर्ष्या करता रहता। बदायूनीं ने लिखा है कि जब पंजाब से आये आजम खान को माहम अनगा के स्थान पर वजीर अतगा खान (?) बना दिया गया तो मुनीम ख़ाँ, ख़ान-ए-ख़ानाँ भी अतगा के विरोधी गए।
आख़िरकार 5 ख़ुर्दाद, माह (शनिवार, 12 रमज़ान 969 हिजरी / 16 मई 1562) को जब अरदीबहिष्त का समय चल रहा था और दरबार का दिन था, मुनीम ख़ाँ, अतगा ख़ाँ, शिहाबुद्दीन अहमद ख़ाँ और अन्य अमीर लोग शाही दरबार में सार्वजनिक कामकाज देख रहे थे तभी आधम ख़ाँ अचानक दबंगों के तरीके से अंदर आया और उसके साथ उसके कुछ साथी भी शोर मचाते हुए आये। आधम खाँ के दरबार में घुसने पर सभा के सदस्य उसको सम्मान देने के लिए उठे। अतगा ख़ाँ भी आधे उठे ही थे कि आधम ख़ाँ ने खंजर पर हाथ रखा और उनकी ओर बढ़ा। उसने अपने सेवक ख़ुशाम उज़बेक और अन्य को इशारा किया, “क्यों खड़े हो, मारते क्यों नहीं!” ख़ुशाम ने खंजर से अतगा ख़ाँ के सीने पर घातक प्रहार किया और इस पर वह स्तब्ध होकर दरवाज़े की ओर भागा, लेकिन तुरंत ही खुदाबर्दी आया और उसने तलवार से अतगा खान पर दो वार किए जिसके परिणामस्वरूप अतगा खान की वहीं मौत हो गयी। इसके बाद तो वहाँ हड़कम्प मच गया। दरबार-ए-आम में हाहाकार मच गया। महल में भय और आक्रोश छा गया। आधम ख़ाँ पागलपन में तलवार लेकर हरम की ओर बढ़ा जबकि बादशाह के हरम में बादशाह के अलावा कोई अन्य बालिग मर्द नहीं जा सकता था।
अबुल फजल ने लिखा है कि, “सौभाग्य से उस समय शहंशाह (अकबर) सो रहे थे, किंतु तकदीर जाग रही थी।”
आधम खाँ तलवार लिए महल के चारों ओर बने बरामदे (उफ़्फ़ा) में चढ़ गया, जिसकी ऊँचाई लगभग डेढ़ आदमी की थी। उसने हरम के अंदर घुसने की कोशिश की, परंतु वहाँ तैनात नियामत ख़ोजा ने हरम का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। आधम खाँ वहीं खड़ा रह गया। आश्चर्य की बात यह थी कि वहाँ मौजूद दरबारियों ने उसे रोकने का साहस नहीं दिखाया।
उधर शोर होने पर अंततः शहंशाह अकबर की नींद खुली और उसने पूछा कि क्या हुआ है? किसी दुर्घटना के भय से शहंशाह के सेवक ने उसके कमरे के सामने का दरवाजा बंद कर दिया था तो अपनी लुंगी को लपेटते हुए ही अकबर बगल की खिड़की से बाहर निकला और एक सेवक ने उसको उसकी विशेष कृपाण दी। रफ़ीक़ नामक एक बूढ़े सेवक ने अकबर को पूरी घटना बताई। जब शहंशाह ने अतगा ख़ाँ की हत्या की पूरी घटना सुनी तो वह स्तब्ध रह गया। रफ़ीक़ ने खून से लथपथ पड़े अतगा खाँ के शव की ओर संकेत किया। शहंशाह ने शव देखा तो उसके क्रोध की कोई सीमा नहीं रही।
उधर आधम खाँ अपने हाथ में तलवार लिए जहाँ अकबर का कक्ष था उस तरफ पहुँचा। अकबर जिस दरवाज़े से आधम ख़ाँ खड़ा था, वहाँ से न जाकर दूसरे रास्ते से बाहर आया और छत पर पहुँचा जहाँ उसने आधम ख़ाँ को देखा। क्रोधित होकर अकबर ने आधम खाँ को गाली देते हुए पूछा, “ बचा ए लादा (Son of a bitch) तुमने हमारे अतगा को क्यों मारा?”
बायजीद के अनुसार अकबर के शब्द थे,” हसरत बा सबान,हिंदुस्तानी फ़ार्मूदण्ड का अई ***** चारा अतका मारा कश्ती?” अब ये लिखते में मुझको फिर से स्व0 सरदार बूटा सिंह की बात याद आयी और अफसोस हुआ कि मुझको फारसी जबान क्यों नहीं आती। हाँ, एक बात और है कि अकबर, जितना मैंने समझा, रोजमर्रा की बोलचाल में हिंदुस्तानी ही बोलता था न कि फारसी तो उसने ये बात और गाली हमारी ही भाषा में दी होगी किंतु उस समय के सुनने वालों ने फारसी में लिखी और हमने उसके अंग्रेज़ी में हुए अनुवाद में पढ़ी। अब हिंदी की गालियाँ पढ़ने को मैंने वैवरिज वाले अकबरनामा की फोटो लगाई है जिससे आप देख सकते हैं।
अकबर की बात सुनकर आधम ख़ाँ बेशर्मी से बोला –
“जांच कीजिए, निर्णय में देरी न कीजिए। बस थोड़ी-सी जाँच ही पर्याप्त है।”
और ये बोलते हुए आधम खाँ ने गजब कर दिया, उसने बादशाह अकबर का हाथ पकड़ लिया जो उस समय के प्रोटोकॉल का जबरदस्त उल्लंघन था। शहंशाह ने अपने हाथ छुड़ाए और आधम ख़ाँ की तलवार पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया। वह दुस्साहसी अपनी तलवार को खींचने ही वाला था कि शहंशाह ने अपने मुक्के से उसके चेहरे पर इतना प्रबल वार किया कि वह कबूतर की तरह कलाबाज़ी खाकर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। इस घटना के वक़्त फ़रहत ख़ाँ और संग्राम हुसैन भी वहाँ मौजूद थे। शहंशाह ने क्रोध में कहा –
“क्या देख रहे हो? इस पागल को बाँधो।”उसे बाँधा गया और आदेश दिया गया कि जिसने हद पार की है, उसे सिर के बल छत से नीचे फेंक दिया जाए। इस पर उन लोगों ने दया दिखाते और लिहाज करते हुए उसको धीरे से गिराया जिससे वह घायल तो हुआ पर जीवित बच गया। अब अकबर की गुस्सा का ठिकाना नहीं था और उसने फिर से आदेश दिया कि उसे दोबारा ऊपर लाकर बालों से घसीटकर फेंका जाए। इस बार आधम खाँ को इतनी बेरहमी से फेंका गया कि उसकी गर्दन टूट गई और मस्तिष्क चूर हो गया। अबुल फजल लिखता है कि,”इस तरह वह ख़ून का प्यासा पापी अपने कर्मों का दंड भोगकर नष्ट हुआ। शहंशाह के मुक्के का निशान इतना गहरा था कि लोग समझे यह गदा का प्रहार है।” अपनी हदें पार करके वर्जित स्थान में घुस जाना अपने आप में ऐसा गम्भीर अपराध था कि उसकी नजीर स्थापित हो जाये ऐसी सजा मिलनी ही थी और फिर आधम खाँ के अपराधों की तो पूरी फेहरिस्त थी। बाद में ऐसी या इससे मिलती जुलती एक घटना औरंज़ेब के समय में भी हुयी पर उसकी बात फिर कभी की जाएगी।
यह सन 1561 की घटना है और अकबर की उम्र उस समय मात्र 18 वर्ष (लगभग) की थी।
मुनीम ख़ाँ और शिहाबुद्दीन अहमद ख़ाँ भयभीत होकर भाग निकले थे।
आज की पोस्ट में बस इतना ही
अगली कड़ी में मुलाकात होगी एक नए किस्से, ऐतिहासिक तथ्य या मिथक की बात के साथ।
Shri Krishan Jugnu ji
Munnalal Dakot ji
Comments
Post a Comment