इतिहास और संस्कृति के किस्से-24. “जब मुर्दा जीवित हुआ और हिन्दुस्तान का बादशाह बन गया – शाहजहाँ की अद्भुत कहानी”
इतिहास और संस्कृति के किस्से-24
“जब मुर्दा जीवित हुआ और हिन्दुस्तान का बादशाह बन गया – शाहजहाँ की अद्भुत कहानी”
इटली के यात्री मनूची ने मुग़ल दरबार के किस्सों को इतना जीवंत लिखा कि वे किसी ऐतिहासिक नाटक जैसे लगते हैं। उन्हीं में से एक प्रसंग है शाहजहाँ के सत्ता-प्राप्ति का, जो किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं।
ये किस्सा है दावर बख़्श का (जिसका अर्थ है ईश्वर प्रदत्त) जो जहाँगीर का पौत्र और खुसरू का पुत्र था और खुर्रम यानी शाहजहाँ का और ये किस्सा है सत्ता प्राप्ति के जबरदस्त षड्यंत्र का।
ये बात है जब 28 अक्टूबर 1627 को 58 वर्ष की अवस्था मे बादशाह जहाँगीर का कश्मीर से लौटते समय देहांत हो गया।
अब स्थिति यह थी कि:-
नूरजहाँ चाहती थीं कि उनका दामाद शहज़ादा शाहरयार बादशाह बने।
आसफ़ ख़ान (शाहजहाँ का ससुर) शाहजहाँ को ही गद्दी पर देखना चाहता था।
इस संघर्ष के बीच आसफ़ ख़ान ने तुरुप का पत्ता खेला—बंदीगृह से दावर बख़्श को निकालकर गद्दी पर बैठा दिया।
इक़बाल-नामा-ए-जहाँगीरी (लेखक: मुहम्मद ख़ान) में लिखा है:
“आसफ़ ख़ान ने इरादत ख़ान के साथ मिलकर दावर बख़्श को क़ैद से निकाला और उसे अश्व पर बिठाकर लाल छत्र के नीचे राजसी तामझाम के साथ दरबार में लाया।”
लेकिन समय ने साबित किया कि यह सब एक नाटक था। दावर महज़ एक बलि का बकरा था।
इस प्रकार जहाँगीर की मृत्यु के बाद उसका पौत्र और खुसरो का पुत्र सुल्तान बुलाक़ी दाबर बख्श के नाम से गद्दी पर बैठा।
गद्दी पर बैठने के बाद उसको खुर्रम की तरफ से चिंता हुई जो कि उस समय दक्कन में बीजापुर की तरफ था।खुर्रम के साथ उसकी बीवियां और बच्चे भी थे।
दाबरबख्श ने बीजापुर के शासक को पत्र भेजा कि खुर्रम को इधर न आने दिया जाए और यदि ऐसा हुआ तो बीजापुर पर हमला कर दिया जाएगा।
अब बीजापुर के राजा ने खुर्रम को उसके सारे परिवार के साथ एक किस्म से कैद से कर लिया यानी उसके वहाँ से बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया।
तभी खुर्रम के पास उसके ससुर आसफ़ ख़ाँ का गुप्त संदेश पहुँचा—
“किसी भी उपाय से निकलो, महाबत ख़ाँ तैयार है। यहाँ सब तैयारी है और आने पर तुम्हें सम्राट घोषित कर दिया जाएगा।”
मगर बीजापुर से निकलना अब आसान न था।
खुर्रम ने युक्ति रची—उसने बीमारी का नाटक शुरू किया।
दिन-ब-दिन खबर फैली कि वह असाध्य रोग से पीड़ित है।
बीजापुर के शासक को शक हुआ तो उसने खुर्रम की बीमारी की जाँच को दूत भेजे।
इधर खुर्रम भी अपनी तैयारी में लगा था।
उसने चालाकी से एक बकरी को कटवाया और उन दूतों के आने के पहले उस बकरी का खून पी लिया। जब वो दूत जाँच करने आये तो अपनी तबियत काफी खराब जताते हुए उनके सामने ही खून की उल्टी कर दी।
जब दूतों ने देखा तो वे मान बैठे कि राजकुमार अब अंतिम साँसों पर है।
वे लौटकर राजा से बोले—“शहज़ादा अब मरने ही वाला है।”
कुछ ही दिनों बाद यह घोषणा हुई—“खुर्रम मर गया।”
खुर्रम के घरवाले जो उसके साथ कैद में थे उन्होंने रोना-पीटना शुरू किया, लोग शोक में डूब गए।उन्होंने अब बीजापुर के शासक से शवयात्रा हेतु अनुमति माँगी कि शव को पूर्वजों की क़ब्रगाह तक ले जाया जाए।
बीजापुर के राजा ने सहमति दे दी और इस तरह खुर्रम अपने ही “शव” के साथ बीजापुर से बाहर निकाला गया।
खुर्रम की मृत्यु का समाचार बुलाक़ी तक पहुँचा तो यह समाचार सुनकर वह खुशी से झूम उठा और उसने सोच लिया कि
“अब मैं निर्विवाद सम्राट हूँ।”
बादशाह बनने के बाद वह शराब और नाच-गाने में जश्न मनाने में मशगूल रहने लगा।
लेकिन इतिहास का खेल कुछ और ही था।
उधर अब वो सभी परिवारीजन खुर्रम के शव को लेकर आगरा की तरफ चल दिये। जब ये लोग वहाँ पहुँचे तो आसफ खाँ ने बादशाह दाबर बख्श से अपने दामाद के शव को देखने और अंत्येष्टि सम्बंधित इंतज़ाम की आज्ञा मांगी जो दे दी गयी।
शवयात्रा जैसे ही आगरा पहुँची, सबके सामने अद्भुत दृश्य हुआ—
खुर्रम जीवित निकला!
आसफ़ ख़ाँ और सेना पहले से तैयार थे।
नगाड़े गूँजे, तलवारें चमकीं और गगनभेदी नारे उठे और आसफ खाँ ने पहले से तैयार हाथी पर खुर्रम को बैठाया और आवाज़ें आयीं
“शाहजहाँ ज़िंदाबाद!”
यहीं से खुर्रम ने स्वयं को शाहजहाँ कहना शुरू किया—“दुनिया का राजा।”
यह खबर मिलते ही बुलाक़ी यानी बादशाह दाबर बख्श स्तब्ध रह गया, उसकी सेना टूट गई और वह जान बचाकर भाग निकला। कहते हैं कि वह भागकर ईरान चला गया और वहीं मर गया।
बहरहाल,इस तरह एक “मृत घोषित” कै़दी राजकुमार अचानक हिन्दुस्तान का बादशाह बन गया।
शाहजहाँ का इस कैद का एक और किस्सा है जब उसको एक फकीर मिला था पर वो फिर कभी क्योंकि पोस्ट लंबी हो चली है।
एक बात और जब शाहजहाँ बुलाक़ी को पकड़ने में असफल रहा, तब उसने लाहौर नगर में एक और सेना भेजी, जहाँ उस राजकुमार के दो पुत्र थे। उनके लिए शाहजहाँ ने विशेष आदेश दिए गए कि वे जहाँ भी मिलें, तुरंत उन्हें दीवार में चिनवा दिया जाए। जब ये आदेश पहुँचा तो वे शाहजादे उस कक्ष में थे जहाँ बादशाह जहाँगीर दरबार लगाता था। वे शाहजादे उस समय कुछ लिखने में व्यस्त थे। मनूची ने लिखा है कि बिना किसी दया के, शाहजहाँ के दूतों ने उस स्थान के दरवाज़े को ईंटों से चिनवा दिया, उन्हें भीतर ही जिंदा छोड़कर।
मनूची ने लिखा है कि, “और आज तक वह दरवाज़ा ईंटों से बंद है। इन राजाओं और सरदारों की प्रथा है कि उनकी मृत्यु के बाद वह कक्ष, जिसमें वे मरते हैं, बंद कर दिया जाता है और फिर कभी नहीं खोला जाता।” अर्थात वह शाहजादे जिंदा कमरे में चिनवा दिए गए और मुगल वंश में सत्ता हेतु सगे परिवारीजन की हत्या की ये जो कहानी शुरू हुई ये आगे कई बार दोहराई गयी।
आज की पोस्ट में बस इतना ही
अगली कड़ी में मिलेंगे किसी नए किस्से या इतिहास की दास्तान के साथ
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