इतिहास और संस्कृति के किस्से-33 ऐबक

इतिहास और संस्कृति के किस्से-33

क्या आपको पता है कि मुहम्मद गौरी की विजय के बाद दिल्ली का पहला सुल्तान कौन बना?
उस सुल्तान का नाम जो था वह क्यों पड़ा?
क्या आपको मालूम है कि दिल्ली की कुतुब मीनार किसने बनवाई और उस जैसी या उससे मिलती जुलती दूसरी मीनार कहाँ है?कौन सी है?

इब्नबतूता लिखता है कि प्रसिद्ध विद्वान एवं काज़ी-उल-कुज़्ज़ात (मुख्य क़ाजी) कमालुद्दीन मुहम्मद बिन (son of) बुरहानुद्दीन ‘सदरे जहाँ’ कहते थे कि दिल्ली पर मुसलमानों ने हिजरी सन 584 (सन 1188 ईस्वी) में विजय प्राप्त की।इब्नबतूता ने लिखा है कि यही तिथि स्वयं उसने जामे मस्जिद की मेहराब में लिखी देखी थी। हाँलाँकि कनिंघम के अनुसार यह तिथि 589 हिजरी है यानी कि 1193 ईस्वी।
गज़नी और खुरासान के बादशाह शहाबुद्दीन मुहम्मद बिन (son of) साम, गोरी के गुलाम सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने यह नगर जीता था। बादशाह शहाबुद्दीन गोरी ने कुतुबुद्दीन को एक बड़ी सेना देकर भारत की ओर भेजा तब इसने सबसे पहले लाहौर जीता फिर दिल्ली। बदायूनीं ने लिखा है कि सुल्तान मलिक कुतुबुद्दीन ऐबक जो सुल्तान का सेवक और गोद लिया बेटा था उसने दिल्ली को अपनी राजधानी बनाया और उस दिन से दिल्ली एक बार फिर सुल्तानों की राजधानी बन गयी।
ऐबक  तुर्की भाषा का शब्द है जिसमें ‘ऐ’ का मतलब है ‘चंद्रमा’ और ‘बक या बेक या बेग’ का अर्थ है ‘अधिपति या मालिक या Lord’. ऐबक का अर्थ ‘छोटी अंगुली’ भी होता है।
बदायूनीं ने अपनी पुस्तक ‘मुन्तख़ब-उत-तवारीख’ में लिखा है कि कुतुबुद्दीन ऐबक सुल्तान मुईजुद्दीन का विशेष चहेता गुलाम था। चंद्रग्रहण के समय उसकी छोटी अंगुली टूट गयी थी इसलिए उसको इस नाम (ऐबक) से बुलाया जाने लगा। फरिश्ता ने भी उसके ऐबक नाम की वजह अंगुली टूटना बताया है यद्यपि ‘ऐबक’ एक उपाधि भी थी। कुतुबुद्दीन बहुत दान दिया करता था इसलिए उसको ‘कुतुबुद्दीन लकबक्ष’ नाम से भी बुलाते थे।

इब्नबतूता ने कुतुबुद्दीन ऐबक का एक बहुत रोचक किस्सा बताया है। ऐबक से जलने वाले भी बहुत थे तो एक बार बादशाह गोरी के दरबारियों ने ऐबक की बहुत निंदा की और कहा कि वह बादशाह की अधीनता छोड़ कर स्वतंत्र होना चाहता है। किसी तरह से यह बात कुतुबुद्दीन ऐबक तक पहुँच गयी। यह बात सुनते ही वह बिना कोई वस्तु अपने साथ लिए अकेला  ही गजनी को निकल दिया और रात्रि को आकर अकेला ही बादशाह के सामने पेश हो गया। उसके बुराई करने वालों को इस विषय में कुछ पता नहीं चला।अगले दिन बादशाह की बात के अनुसार ऐबक दरबार में राजसिंहासन के नीचे छिप कर बैठ गया। बादशाह ने वहाँ उपस्थित सरदारों से जब ऐबक के विषय में पूछा तो उन्होंने उसी प्रकार ऐबक की निंदा शुरू कर दी और कहा कि अब तो वह स्वतंत्र ही हो जाएगा। यह सुनकर बादशाह ने सिंहासन पर अपना पैर मारा और ताली बजाकर कहा “ऐबक” इस पर कुतुबुद्दीन ने जवाब दिया ‘हुजूर उपस्थित’ और सिंहासन के नीचे से निकल कर दरबार में उपस्थित हो गया। इस पर उसकी बुराई करने वाले हक्के-बक्के रह गए और मारे भय के बादशाह के सामने गिरकर धरती चूमने लगे।
कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली स्थित कुतब मीनार को बनवाना शुरू किया था। आपको शायद यह जानकर ताज्जुब होगा कि अफगानिस्तान स्थित ‘मीनार ए जाम’ कुतुब मीनार से काफी मिलती है और यह भी लगभग उसी समय बनाई गई थी। मीनार-ए-जाम (Minaret of Jam) अफ़ग़ानिस्तान में हरी नदी (हरीरूद) के किनारे स्थित एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है. यह ईंटों की बनी ६५ मीटर ऊँची मीनार है, जिसका निर्माण १२वीं शताब्दी के अंत में हुआ था और यह कुफ़िक और नस्ख़ सुलेख, ज्यामितीय पैटर्न तथा कुरान की आयतों से सजी हुई है. यह मीनार हरी नदी व जाम नदी के संगम के पास स्थित है।

आज की पोस्ट में बस इतना ही
अगली पोस्ट में फिर मुलाकात होगी इतिहास के एक नए किस्से/मिथक के साथ

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