इतिहास और संस्कृति के किस्से-19प्रसिद्ध कवि और लेखक अमीर खुसरो की और उनकी प्रसिद्ध किताब‘खज़ाईन-उल-फुतूह’ या ‘तारीख ए अलाई’ से कुछ बातें

इतिहास और संस्कृति के किस्से-19

प्रसिद्ध कवि और लेखक अमीर खुसरो की और उनकी प्रसिद्ध किताब‘खज़ाईन-उल-फुतूह’ 
या ‘तारीख ए अलाई’ से कुछ बातें

जिहाले मुस्की मकुन तगाफुल, 
दुहाये नैना बनाये बतियां।
कि ताबे हिज्रा न दाम ए जान,
न लेहु काहे लगाए छतिया।।” खुसरो

“ज़े-हाल-ए-मिस्की मकुन ब-रंजिश
ब-हाल-ए-हिज्राँ बेचारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन
तुम्हारा दिल या हमारा दिल है
सुनाई देती है जिसकी धड़कन
तुम्हारा दिल या हमारा दिल है।।” खुसरो से प्रेरित गुलज़ार

पहले खुसरो के बारे में कुछ बातें:-

1.अमीर खुसरो के बचपन का नाम था- अबुल हसन अमीनुद्दीन
2.खुसरो उनका उपनाम था
3.खुसरो के पिता अमीर सैफुद्दीन महमूद तुर्की के लाचीनी कबीले के सरदार थे जो चंगेज़ी अत्याचारों के कारण दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश या शमशुद्दीन अल्तमिश के समय में बल्ख से अपने कबीले के साथ आकर हिंदुस्तान में दिल्ली से कुछ दूर एटा जिले के पटियाली गांव में बस गए थे और बादशाह के दरबार में नौकरी करने लगे थे।
4. खुसरो की माँ ब्रज क्षेत्र के हिंदू परिवार से थीं। नाना ने इस्लाम कुबूल कर लिया था और इमादुल मुल्क नाम से सुल्तान बलबन के युद्ध मंत्री बने थे। फिर भी परिवार पूरी तरह हिंदू संस्कारों वाला बना रहा।
5.खुसरो पर अपने नाना और माँ के संस्कारों का पूरा असर रहा।
6.खुसरो को कविता का शौक बचपन से ही था। अपने पिता के गुजर जाने के कारण खुसरो अपने नाना के पास दिल्ली रहने लगे जो हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया जी के परम शिष्य थे।
7.खुसरो ने अपने गुरु हज़रत निजामुद्दीन औलिया साहब से बहुत कुछ सीखा और उन्हीं से अरबी और फारसी का जबरदस्त ज्ञान अर्जित किया।
8.खुसरो का परिवार दिल्ली के सुल्तानों की सेवा में रहा था और खुद खुसरो ने गुलाम वंश से लेकर खिलजी वंश और तुगलक वंश तक 11 सुल्तानों को राजा बनते देखा था।
9.ख्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया साहब की खुसरो पर इतनी कृपा थी कि वह कहते थे कि,  
“ कयामत के रोज़ जिस वक्त खुदा मुझसे पूछेगा कि संसार से क्या लाये हो तो मैं अमीर खुसरो को पेश कर दूंगा।”
10.खुसरो के लगभग 45 ग्रंथो का पता चला है जिनमें से 28 प्राप्य हैं।
11.अमीर खुसरो पहले साहित्यकार थे जिन्होंने ग्रंथों के आरंभ में भूमिका लिखकर एक नयी परम्परा की नींव डाली।

खुसरो ने अपनी कविता में ऐसा भी लिखा कि एक पंक्ति फारसी की और एक पंक्ति हिंदी की। जैसे:-
 “जिहाले मुस्की मकुन तगाफुल, 
दुहाये नैना बनाये बतियां।
कि ताबे हिज्रा न दाम ए जान,
न लेहु काहे लगाए छतिया।।”

12.खुसरो को राजाओं को प्रसन्न करना आता था तभी वह इतने लंबे समय तक अपनी प्रशंसा और चाटुकारिता करने की प्रवृत्ति के कारण लंबी अवधि तक अपने पद पर बना रहा और अपना कद भी बनाये रखा। इस ग्रन्थ की रचना भी खुसरो ने सुल्तान अलाउद्दीन की प्रशंसा के लिए की थी इसलिए इसमें अलाउद्दीन की किसी भी असफलता का वर्णन नहीं है।

खुसरो ईरानी संगीत का भी जानकार था। उसने दिल्ली के विषय में भी लिखा है जिसमें वह कहता है कि दिल्ली अदन की जन्नत और बाज हरम है। दिल्ली के लोग देवताओं के जैसे अच्छे स्वभाव वाले और स्वर्ग के निवासियों की भांति सरल हृदय, मधुरभाषी और सदाचारी हैं।
अपनी गद्य की पुस्तक “खज़ाईन-उल-फुतूह” में खुसरो ने अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल के पहले 15 सालों का विवरण लिखा है।खुसरो ने अपनी इस पुस्तक में मध्ययुगीन युद्धों के व्यूह, युद्ध के हथियार, युद्ध में प्रयुक्त होने वाली मन्जनिक और मगरबियों जैसी मशीनों का वर्णन किया है जिनसे बड़े से बड़े किले-दुर्ग तोड़ दिए जाते थे।
ताज्जुब की बात है कि इस ग्रन्थ में अलाउद्दीन खिलजी की ‘चित्तौड़ विजय’ का वर्णन है और खुसरो ने इस बात का भी जिक्र किया है कि तीस हजार हिंदुओं को काट डाला गया लेकिन इस पूरे प्रकरण में पद्मावती तो क्या किसी स्त्री का या जौहर का कोई जिक्र नहीं है। जबकि इस बात की चर्चा या इस भयंकर घटना की जानकारी इस शताब्दी में भी आम है। 
हाँलाँकि रणथंभौर के किले की जीत का वर्णन करते वक़्त खुसरो ने वहाँ के राय की हार का बहुत मन खराब करने वाला वर्णन किया है। वह लिखता है कि,” नैराश्य के वशीभूत एक रात उसने- रणथम्भौर के राय ने ( रणथम्भौर के राणा साहब ने) बड़ी चिता जलाई, जिसकी ज्वाला पहाड़ी पर शैल कमल सी ऊँची उठी, उसमें स्वर्णअंगी किशोर युवतियां कूदीं जो उसकी भुजाओं में बड़ी हुयी थीं।”

हाँलाँकि पोस्ट थोड़ी लंबी हो चली है पर खुसरो की भाषा में (बेहतरीन भाषा में अनूदित) दिल्ली के किले के निर्माण का वर्णन लिखने के लोभ का मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूँ और फिर मुझको स्व0 सरदार बूटा सिंह जी की बात याद आ रही है कि लिखे को उसकी मूल भाषा में पढ़ने का मजा ही कुछ और है। इस सीरीज को लिखने में रोज ही सोचता हूँ कि संस्कृत तो मैंने फिर भी 12वीं क्लास तक पढ़ी है पर काश प्राकृत, फारसी और तुर्की भाषा मुझको आती तो पढ़ने में कितना आनन्द आता।
देहली के मज़बूत किले का निर्माण : “जिसमें दुनिया के नक्शों पर अलेक्जेंडर की दूसरी दीवार (सिकंदर जुलकर नैन) दिखाई दी : पवित्र काबा का नायब देहली का किला गिर चुका है। समय के थपेड़ों से, इसकी बर्बादी की स्थिति, मदिराशालाओं, जिसे माननीय शाहंशाह ने बंद किया हो, से भी बदतर हो चुकी है। जैसे पियक्कड़ की तरह यह गिर चुका है, स्थान-स्थान पर , अपने पत्थरों को भी इकट्ठा नहीं रख पा रहा है। यह जनपद से गुजर रहे सामान्य नागरिकों के सामने अपना सर रख देता है। अन्य अवसर पर, यह बेहूदा नालों के सामने सजदे में झुक जाता है। इसकी मीनारें कभी इतनी ऊँची थीं कि यदि कोई इन्हें देखे तो उसकी पगड़ी गिर जाय। लेकिन, खराब रखरखाव से अब वे मीनारें मानो जमीन पर सो रही हैं। जब लोगों की भलाई चाहने वाला वाला 'अलाईकाल' आया तो शाहंशाह ने स्वर्ण ईंट और स्वर्णखण्ड अपने सम्पन्न होते खजाने से निकाली और किले के खर्च हेतु भुगतान के लिए दी। कुशल राज मिस्त्रियों ने अपने आपको काम में लगा दिया और पुराने किले की जगह एक नया ही किला जल्दी तैयार हो गया। नये किले ने अपने मजबूत भुजाओं और सात मीनारों ने रंगीन प्लेडीज़ (ग्रीक मान्यता के अनुसार सात बहनों वाला तारा समूह; क्या यहाँ इसका अर्थ सप्तऋषि तारा समूह से था?)  से हाथ मिलाए, शक्तिशाली मंगल ग्रह को अपनी बगल में दबाया और उच्च आकाश को कमरबंद की भांति काम में लिया।
यह जरूरी है कि नई इमारत को खून अर्पित किया जाय, इस कारण, हजारों बकरदाढ़ी वाले मुगलों को इस उद्देश्य के लिए बलि चढ़ा दिया गया। इसके संस्थापक का बहुत शुक्रिया, जब यह भव्य इमारत पूर्ण हुई, तो कायनात के रखवाले ने 'अपने' संरक्षण में ले ली। कठिनाई या विप्लव कैसे अंदर घुसेगा जिस स्थान का 'अल्लाह' निगेहबान हो।”

उस वक़्त में दिल्ली के राज-मिस्त्री और पत्थर के कारीगर विश्व के सर्वश्रेष्ठ में अपना नाम रखते थे। खुसरो ने लिखा है कि, “हिन्द के संगतराशों ने, जो कला में फरहाद से भी बढ़कर हैं, अपने छैनी हथोड़े लिए और पत्थरों को इतना चिकना तराश दिया है कि यदि कल्पना भी इस पर अपने पैर रखे तो फिसल जाए।”

बस अब आज के लिए इतना ही।
खुसरो की पुस्तक से कुछ और बातें फिर किसी कड़ी में लिखी जाएंगी।
Shri Krishan Jugnu जी
Sri  Munnalal Dakot जी

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