इतिहास और संस्कृति के किस्से-27. किस्सा चौथे मुग़ल बादशाह जहाँगीर और उसकी आत्मकथा ‘तुज़ुक-ए-जहांगीरी’ की।

इतिहास और संस्कृति के किस्से-27

आज किस्सा चौथे मुग़ल बादशाह जहाँगीर और उसकी आत्मकथा ‘तुज़ुक-ए-जहांगीरी’ की।

क्या आपको पता है कि:-

-जहाँगीर की आत्मकथा या memoirs किस भाषा में लिखे गए हैं और उनके अनुवादक कौन हैं?

-जहाँगीर देखने में कैसा लगता था?

-सलीम का नाम बादशाह बनने पर जहाँगीर किसने रखा था और क्यों?

-साहिब किरानी, फिरदौस मकानी, जन्नत आशियानी, अर्श आशियानी, ये नाम किन बादशाहों के लिए प्रयुक्त हुए?

-न्याय की जंज़ीर किस धातु से बनी थी?

-जहाँगीर कितनी शराब रोज पीता था?

पहली बात बेवरिज दम्पत्ति की
मुग़ल सम्राटों की आत्मकथाएँ और उनके अनुवाद
भारतीय इतिहास को जानने के लिए मुग़ल सम्राटों की आत्मकथाएँ और दरबारी लेख अत्यंत महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इनका मूल लेखन फ़ारसी और तुर्की भाषाओं में हुआ, और बाद में ब्रिटिश विद्वानों ने इन्हें अंग्रेज़ी में अनूदित कर दुनिया के सामने प्रस्तुत किया।
बाबरनामा –यह बाबर द्वारा चगताई तुर्की भाषा में लिखा गया था। इसका पहला अंग्रेज़ी अनुवाद जॉन लेडन और विलियम एर्स्किन ने किया। बाद में एनेट सुज़ैनाह बेवरिज (Annette S. Beveridge) ने इसका अनुवाद किया, जो आज प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग पर उपलब्ध है।

हुमायूँनामा – इसे बेगम गुलबदन (हुमायूँ की बहन) ने फ़ारसी में लिखा था। इसमें हुमायूँ के जीवन और उनके संघर्षों का सजीव चित्रण मिलता है। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद भी एनेट बेवरिज ने किया।

अकबरनामा – अबुल फ़ज़ल द्वारा फ़ारसी भाषा में लिखा गया यह ग्रंथ अकबर के शासनकाल का सबसे विश्वसनीय विवरण है। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद हेनरी बेवरिज (H. Beveridge) ने 1897 से 1939 के बीच किया।

तुज़ुक-ए-जहाँगीरी (जहाँगीरनामा) – बादशाह जहाँगीर की आत्मकथा, जिसे उसने फ़ारसी में लिखा था। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद अलेक्ज़ेंडर रॉजर्स और हेनरी बेवरिज ने किया।

यहाँ यह भी बताना चाहूँगा कि हेनरी बेवरिज और एनेट बेवरिज पति–पत्नी थे। पति–पत्नी की इस जोड़ी ने मिलकर मुग़लकालीन चारों प्रमुख ग्रंथों को अंग्रेज़ी भाषा में उपलब्ध कराया। इस कारण उनके अनुवाद आज भी मुग़ल इतिहास के अध्ययन का आधार माने जाते हैं।
अब बात जहाँगीर और ‘तुजुक-ए-जहाँगीरी’ की
जहाँगीर ने अपने शासन के पहले बारह साल खुद “तुजुक-ए-जहाँगीरी”  लिखी। बाद में बीमारी ने उसकी कलम छीन ली और ये काम मुतमद ख़ान को सौंपना पड़ा। पूर्व और पश्चिम की शाही आत्मकथाओं की तुलना में जहाँगीर अलग सा दिखता है। जूलियस सीज़र और James VI जहाँ साम्राज्य की बातें करते हैं, वहीं जहाँगीर अपने दोष, क्रूरताएँ और कोमल भावनाएँ भी लिखने से गुरेज नहीं करता है। बाबर की आत्मकथा भी बहुत अच्छी तरह से लिखी गयी है पर उसने अपनी हार दबा दी लेकिन जहाँगीर ने ऐसी बातों को भी लिखा है जो उसकी कमजोरी कही जा सकती थीं।

मुग़ल बादशाहों में तुलादान का रिवाज था और जहाँगीर भी अपने हर जन्मदिन पर सोने के तराज़ू में खुद को तौलकर दान करता था। उसकी शक्लो-सूरत के विषय में कोरयत (Coryat) ने लिखा है कि, “वह 53 वर्ष की उम्र का है, मेरे आने के बाद से ही मैं देख रहा हूँ कि उसका जन्मदिवस बहुत उत्साह और धूमधाम से मनाया जा रहा है।उसको सोने के तराजू में तौला गया जो मैंने भी उस दिन देखा। इस प्रथा का पालन वह हर वर्ष करता है। 
उसका (जहाँगीर का) रंग न सफेद है और ना ही काला बल्कि उसके बीच का (गेहुँआ?) है। मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मैं इसको कैसे और स्पष्ट रूप से बताऊँ, शायद उसका चेहरा जैतून (olive) के रंग से मिलता हुआ कहना ज्यादा सटीक होगा। उसका मुखमंडल जैतून-सी आभा से दमकता है। उसका तन सुगठित लगता है लेकिन पूरा शरीर या उसकी आकृति मेरे शरीर के हिसाब से थोड़ी फर्क जान पड़ती है। 
 और वह मुझसे अधिक स्थूलकाय प्रतीत होता है।"
जहाँगीर अपनी आत्मकथा में लिखता है कि ईश्वर की कृपा से बृहस्पतिवार को सुबह एक घण्टा बीत जाने के पश्चात वह राजधानी आगरा में सिंहासन पर बैठा (24 अक्टूबर 1605 हिजरी 1014)। उस समय वह उम्र के 38वें वर्ष में था। जहाँगीर लिखता है कि,”जब मैं बादशाह बना तो मुझको लगा कि मुझे अपना नाम (सलीम)बदलना चाहिए क्योंकि यह रूम (रोम नहीं) के सम्राट से मिलता हुआ है। मेरे मन में यह बात आई कि बादशाह का काम विश्व को काबू में रखने का है इसलिए मेरा नाम जहाँगीर होना चाहिए। चूँकि मेरा सिंहासन पर बैठना पृथ्वी पर सूर्य के रोशनी फैलाने के समय से सम्बद्ध था इसलिए मेरा लक़ब (title of honour) नूरुद्दीन होना चाहिए। इसके अलावा एक बात यह भी थी कि जब मैं राजकुमार था तब मैंने हिंदुस्तानी संतों से सुना था कि बादशाह अकबर के जीवन और राज्य के बाद एक ‘नूरुद्दीन’ नाम का व्यक्ति राज्य चलाएगा। इस प्रकार बादशाह सलीम ने खुद अपना नाम ‘नूरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर’ रखा था।

जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि इन संस्मरणों में ‘साहिब किरानी’ से तात्पर्य तैमूर से है, ‘फिरदौस मकानी’ बाबर पादशाह के लिए प्रयुक्त किया गया है, ‘जन्नत आशियानी’ हुमायूँ पादशाह के लिए और ‘अर्श आशियानी’ अकबर पादशाह के लिए प्रयुक्त हुआ है।

जहाँगीर को गरीब जनता को न्याय हर समय उपलब्ध रहे इसकी बहुत चिंता थी तो उसने सिंहासन पर बैठने के तुरंत बाद जो पहला आदेश दिया वह ‘न्याय की जंज़ीर’ लगाने का था। जहाँगीर लिखता है कि ये जंजीर विशुद्ध सोने की बनाई गई थी जो तीस गज लंबी थी और इसमें 60 घण्टियाँ लगी थीं। इसका एक सिरा आगरा किले के शाह बुर्ज से बंधा था और दूसरा सिरा यमुना नदी के किनारे एक पत्थर से। जब भी किसी आमजन को न्याय की जरूरत होती तो वह इस जंजीर की घण्टियाँ बजा कर अपनी ओर ध्यान खींच सकता था।
जहाँगीर ने अपनी शराब पीने की कमजोरी को छिपाया नहीं है बल्कि उसने लिखा है कि एक समय में तो वह शराब के एक दिन में 20 जाम तक पीने लगा था। उसके हाथ तक कांपने लगे थे। बाद में उसने शराब पीना कम किया और 15 कप और फिर 5-6 प्याले तक पर आ गया। पहले वह किसी भी समय शराब पीता था लेकिन बाद में वह सिर्फ रात को पीने लगा और फिर उसने लिखा है कि,”अब मैं सिर्फ अपना खाना पचाने के लिए शराब पीता हूँ।”
 जहाँगीर ने ‘तुजुक-ए-जहाँगीरी’ में बहुत सी रोचक और जानने योग्य बातें लिखी हैं लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद भी पोस्ट लंबी होती जाती है। इसलिए आज के लिए बस इतना ही
अगली कड़ी में मुलाकात होगी एक नए किस्से के साथ।

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