इतिहास और संस्कृति के किस्से-21. चर्चा पानीपत के तीसरे युद्ध से सम्बंधित कुछ ऐतिहासिक किस्सों की
इतिहास और संस्कृति के किस्से-21
आज चर्चा पानीपत के तीसरे युद्ध से सम्बंधित कुछ ऐतिहासिक किस्सों की
पानीपत की तीसरी लड़ाई 14 जनवरी 1761 ईस्वी को मराठों जिनका नेतृत्व सदाशिव राव भाऊ कर रहे थे और अफगान आक्रमणकारियों जिनका नेतृत्व अहमद शाह अब्दाली कर रहा था उनके बीच लड़ी गयी थी। अठारहवीं सदी के यह भारत ही नहीं विश्व के भयंकरतम और खूंरेजी युद्धों में गिनी जाती है। दिल्ली से लगभग 78 किलोमीटर उत्तर में यह युद्ध लड़ा गया था। इस युद्ध में मराठा सेना की हार हुयी थी और सदाशिव राव भाऊ वीरगति को प्राप्त हुए थे।
इस पूरे युद्ध और इसके पहले की घटनाओं का रोमांचक वर्णन राजमंदिर के रघुनाथ राव यादव चित्रगुप्त ने किया है और इस विवरण की शुरुआत में ही उन्होंने लिखा है कि उन्होंने इस युद्ध और उससे पहले की की घटनाओं को स्वयं सुना और देखा है मतलब कि वह खुद वहाँ मौजूद रहे थे। इस बात की स्वतंत्र तौर पर पुष्टि का कोई तरीका नहीं है परंतु उस समय वो छत्रपति संभाजी द्वितीय (कोल्हापुर) के यहाँ कार्यरत थे और छत्रपति संभाजी द्वितीय की इस युद्ध के एक माह पूर्व ही मृत्यु हो गयी थी। रघुनाथ राव ने इस युद्ध का बहुत ही जीवंत और प्रमाणिक वर्णन लिखा है और यह मराठा दृष्टिकोण से लिखा गया है। यह युद्ध वर्णन ‘बखर पानिपत ची’ के नाम से सन 1761 में मराठी भाषा में किया गया था और इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद श्री उदय ऐस कुलकर्णी ने किया है।
रघुनाथ राव लिखते हैं कि श्रीमंत नाना साहब पेशवा की इच्छा संपूर्ण विश्व को विजय करने की थी जो काफी हद तक पूरी भी हुयी (शायद यहाँ लेखक का मन्तव्य भारत के बड़े हिस्से जीतने से है) बाद में उनकी इच्छा ईरान और रूमशम (कोंस्तानटिनोपल) को अपने शासन के अंतर्गत लाने की हुयी। इसी समय ईरानी (अहमद शाह अब्दाली) अटक को पार करके यहाँ आ गया। उसको हराने और कड़ा सबक सिखाने को पुणे से श्रीमंत राजाश्री नानासाहेब पेशवा, प्रधान मंत्री ने श्रीमंत राजेश्री सदाशिव चिमनजी भाऊसाहेब और राजेश्री विश्वास राव को भेजा और इनकी सहायता को पेशवा ने अपने प्रमुख गण राजेश्री मल्हार जी होल्कर, जानको जी सिंधिया, दामाजी गायकवाड़, यशवंतराव पवार, त्रयंम्बकराव सदाशिव पुरंदरे (जिनको छोटे नाना के नाम से भी जाना जाता था) आदि नायकों को भेजा।
सदाशिव पंत ने नर्मदा नदी को पार किया और उज्जैन पर उनकी विशाल सेना ठहर कर फिर उत्तर की ओर बढ़ने लगी। वहाँ आकर अप्पाजी और अंताजी मानकेश्वर भी अपनी सेनाओंके साथ उनको मिल गए। इसके अतिरिक्त कुम्भेर के राजा सूरजमल जाट भी अपनी तीस हजार की मजबूत सेना के साथ उनसे मिल गए। राजा सूरजमल जाट कई बार आये और उन्होंने सेना और घोड़ों के लिए कई बार सहायता सामग्री बहुतायत में उपलब्ध कराई। इसके उपरांत उन लोगों में मित्रता स्थापित हो गयी।
शिप्रा नदी को पार करने के बाद सदाशिव पंत भाऊसाहेब को अब जल्दी हुयी। तीन-साढ़े तीन लाख की सेना इकट्ठी हो चुकी थीं।मल्हार जी होल्कर की आर्टिलरी पर दो से तीन सौ तोपें थीं, सदाशिव पंत पर दो सौ छोटी और बड़ी तोपें थीं और 125 उज्जैन, पावागढ़,झांसी और नरेगल से आईं। इसके अतिरिक्त लगभग 5 से 7 हजार जेज़ैल (जेज़ाइल (या जेज़ैल ), जिसे जुज़ाइल (या जुज़ैल ) भी लिखा जाता है, एक लंबी नली वाला हथियार है जिसका इस्तेमाल मध्य एशिया , ब्रिटिश भारत और मध्य पूर्व के कुछ हिस्सों में किया जाता था। इसे चलाने वाले व्यक्ति को जजैलची कहा जाता है।) और दो हजार शुतरनाल यानी ऊँट वाली तोपें, दो हजार रहेकले (light artillery), 500 गरनाला, 2000 इतजाला, 300 बड़ी आवाज वाले पटाखे, और 25 हजार रॉकेट थे। इस सेना का ये शानदार तोपखाना या आर्टिलरी थी जिसमें 25 हजार नामचीन स्तर के प्रमुख भी थे और वीर मराठा नायकों के 96 परिवारों
( सूर्य, चंद्रमा, शेष और ब्रहम्मा में हरेक के 24 परिवार मिलाकर मराठों के 96 परिवार) के वीर थे जिनको अपनी जान की कोई परवाह नहीं थी।
इतनी बड़ी सेना के लिए राशन पानी और ठहरने की व्यवस्था करना कोई मामूली बात नहीं थी। अब इसमें और जाट लोग आके भी जुड़ने लगे तथा अब इस सेना के हौसले सम्भालना भी मुश्किल हो रहा था और अब ये लोग यमुना नदी के तट पर पहुँच चुके थे। बून्दी, बुंदेलखंड, भदावर के राजपूतों ने अपनी सेनाएं सीमाओं पर तैयार खड़ी कर रखी थीं परन्तु वे न मराठों के संग आये और ना ही अफगानों के बल्कि उन्होंने दोनों से सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध बनाकर रखे हुए थे सवाई जय सिंह ने भी ऐसा ही किया। हस्तिनापुर के लोग, मंसूर अली, शुजाउद्दौला (अवध का नवाब) और अहमदशाह बंगश (फरुक्खाबाद का नवाब) मराठों को नुकसान पहुँचाना चाहते थे और उन्होंने दुर्रानी से सन्धिबकर ली जिसकी खबर मराठों पर पहुँच गयी। सदाशिव पंत और होल्कर ने इन लोगों को समझाने की और अपने साथ लाने की कोशिश भी की किंतु सफलता नहीं मिली। उन लोगों का जवाब था कि दरअसल दुर्रानी को हमने ही बुलाया है क्योंकि पादशाही कमजोर है। राजपूत और जाट लोग बादशाह की बेइज़्ज़ती करते हैं इसलिए हम उनको हराना और निकालना चाहते हैं। तुम लोग हिंदू (यहाँ हिन्दू से तात्पर्य दक्कन के लोग से लगता है जैसा आगे स्पष्ट होगा) होने के बावजूद तुम जबरदस्ती पादशाही को जीतना चाहते हो। हमारा उद्देश्य तुमको सबक सिखाना है। शुजाउद्दौला ने चित्तौड़, उदयपुर, अजमेर, रामनगर, और मारवाड़ के राजपूतों को अपनी ओर कर लिया था।
सदाशिव पंत, मल्हार जी होल्कर, सिंधिया जानकोजी, अंताजी मानकेश्वर ने 70 हजार सैनिकों के साथ दिल्ली शहर में प्रवेश किया। शपथ लेकर यह तय किया गया कि दिल्ली की व्यवस्था जाटों के साथ मिलकर दोनों सम्हालेंगे। सदाशिव पंत का इरादा जाटों से सम्बन्ध ठीक रखकर ईरानी दुर्रानी को हराने का था। पंत ने जाटों से कहा कि इतनी बड़ी सेना की व्यवस्था करना बहुत कठिन है तो फ़िलहाल बादशाह के खजाने में जो कुछ है उससे खर्चा चला लिया जाए। इस बात से जाट लोगों को भी मराठों से अलग होने का मौका मिल गया क्योंकि उनको लगा कि ये हिंदू (मराठे) लोग बादशाह का खजाना छीनना चाहते हैं जबकि हम उसके वफादार सेवक हैं। ये हिंदुओं का नैतिक तरीका नहीं है। हमको बरगी (मराठे) लोगों का साथ देने से बदनामी मिलेगी। जाटों ने सदाशिव पंत से कहा,” यह सिंहासन/राज्य हमारा है और तय जानो कि हम इसकी रक्षा करेंगे। हम बादशाह की आज्ञा के बिना खजाना कैसे ले सकते हैं। तुमको ये नहीं करना चाहिए। अगर तुम बादशाह का खजाना छुओगे भी तो हमारी दोस्ती नहीं रह पाएगी। हम बादशाह के सेवक हैं और तुम्हारी कुछ नहीं सुनेंगे। तुमको यह बात समझनी चाहिए और इसी के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए।”
सामने खड़ी लड़ाई और दूरगामी हितों का ख्याल रखते हुए पंत और होल्कर ने इस बात पर अपनी सहमति दे दी। उन्होंने यह भी कहा कि मीराबूबू बेगम ( बादशाह मुहम्मद शाह की बेगम मलिका ज़मानी) ने अपनी बेटी अहमद शाह अब्दाली को खुश करने को उसको दे दी जिस से उनकी आज यह हिम्मत हुयी अन्यथा वह अटक पर करके दिल्ली तक नहीं आ पाता। शहंशाह शाहजहाँ और आलमगीर कोई मामूली लोग नहीं थे। ईरान, मुल्तान, तुर्की, मस्कट और पुर्तगाल आदि मात्र उनके नाम से ही थरथर कांपने लगते थे। उन्होंने राजा सूरजमल जाट से कहा कि दरअसल ईरानी दिल्ली के बादशाह के सहायक हैं और अब शुजाउद्दौला आदि उनकी पूरी पादशाही पाने को मदद कर रहे हैं। आप पादशाही के वफादार सेवक हैं और हम पर जैसा इल्ज़ाम लगाया गया है हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे। इस प्रकार उन्होंने राजा सूरजमल जाट को समझाने का प्रयास किया किंतु शक का बीज पड़ चुका था। वह दिखाता रहा कि वह मराठों की बात पर विश्वास कर रहा है परंतु भीतरखाने में उसका शुजाउद्दौला से सम्पर्क चालू हो गया और अचानक एक दिन शुजाउद्दौला आदि उस ईरानी अहमदशाह को लेकर दिल्ली में घुस आए। सदाशिव पंत को समझ आ गया था कि उन जाट लोगों पर भरोसा अब नहीं किया जा सकता था। उन्होंने बादशाह का सिंहासन तोड़ कर उसके सारे बहुमूल्य रत्न निकाल लिए और उस धन से अपनी सेना को और मजबूत किया। उसके बाद मजबूती से मार्च करते हुए अपनी सेना के साथ यमुना नदी के तट पर उन्होंने अपना डेरा जमा लिया। जाटों ने अपनी खिलाफत मन में ही रखी और चुपचाप बिना कुछ कहे उस कैम्प से निकल कर वापिस अपने क्षेत्र में पहुँच गए उन्होंने ईरानी लोगों से भी कोई झगड़ा नहीं किया। रघुनाथ यादव चित्रगुप्त के लिखे अनुसार यह थी इस युद्ध के शुरू होने के पहले राजा सूरजमल जाट की कहानी।
इस रोंगटे खड़े कर देने वाले युद्ध की कहानी कहनी अभी बाकी है
पर आज के लिए इतना ही क्योंकि पोस्ट फिर से लंबी हो चली है
अगली कड़ी में मुलाकात होगी एक नए किस्से, नयी कहानी और नयी बात के साथ।
नोट:- इतिहास प्रेमी लोगों के लिए मैंने अहमद शाह अब्दाली को लिखे सदाशिवराव भाऊ के वीरता से भरे हुए पत्र और इस युद्ध के हाल के लेखक रघुनाथ यादव चित्रगुप्त द्वारा Sir Charles Malet को लिखे पत्र की कॉपी भी पोस्ट की है। इसमें सर चार्ल्स की उपाधियां देखिए।
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