पहली यात्रा के बादजर्मनी/फ्रैंकफर्ट-2 Frankfurt-Germany after first trip

पहली यात्रा के बाद
जर्मनी/फ्रैंकफर्ट-2

कमरे में जाकर हम लोग अगले दिन की तैयारी करने लगे।अगले दिन से फ्रैंकफर्ट फेयर शुरू होना था जिसको देखने का हमको बेसब्री से इंतज़ार था।हमने अपने सैम्पल दो भागों में बांटे और तय किया कि चूंकि फेयर बहुत ही बड़ा होता है तो हम साथ चल कर फेयर ग्राउंड में अलग-अलग हो जाएंगे और शाम को फिर मिल जाएंगे।
अगले दिन सुबह हम फेयर ग्राउंड पहुँचे तो हॉल नम्बर तीन में तो भारतीय लोगों के स्टैंड थे और बाकी फेयर ग्राउंड इतना बड़ा था कि पूरा फेयर पैदल घूमना सम्भव नहीं था और फेयर ग्राउंड में अंदर एक हॉल से दूसरे हॉल जाने के लिए बसों की भी व्यवस्था थी।उस समय हमारे भारत का प्रगति मैदान वाला फेयर लगना शुरू ही हुआ था और केवल एक हॉल;हॉल नम्बर 18 में ही लगता था तो हमने तो कभी इतना बड़ा फेयर न कभी देखा था और न कभी उसकी कल्पना भी की थी।इस फेयर का आयोजन मैसे फ्रैंकफर्ट की ओर से किया जाता था और उस वक़्त इसमें लगभग 12-14 हॉल थे जिनमें कुछ हॉल बहुमंजिला भी थे।मैंने सिविल सर्विसेज की तैयारी में संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों के नाम पढ़े और रटे थे-यहाँ इस फेयर में उनमें से शायद सभी देश मौजूद थे।इस फेयर का नजारा अजब ही था;अलग-अलग हॉल में विभिन्न देशों के हस्तशिल्प के प्रोडक्ट्स।बहुत से ऐसे जिनके विषय में न कभी पहले देखा था और न सुना था।उदाहरण के लिए एक स्टाल रेन स्टिक्स का था।ये बांस या किसी चीज के बने ऐसे पाइप जैसे थे जिनको ऊपर नीचे घुमाने पर बारिश के पानी जैसी आवाज होती है।यह स्टाल सम्भवतः अफ्रीकन देश टोगो का था।बाद में इससे काफी अलग किंतु मूलतः बांस का बना म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट मैंने छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से खरीदा था जो शायद बस्तर का बना हुआ था।कहने का आशय यह है कि यह फेयर कुछ ऐसा लग रहा था कि हम लोग अपनी दुनिया से किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं।हमारा पहला दिन इस फेयर के कुछ हिस्सों को देखने और समझने में निकल गया और रात को थक-हार कर हम अपने होटल वापिस आ गए।
होटल में गुड्डू ने मुझको 500 डॉलर के बराबर दिए (उस समय डॉलर की कीमत लगभग 35 रुपये के बराबर हुआ करती थी) और बताया कि मुरादाबाद की एक फर्म है जेमको जिसके मालिक इमरान साहब हैं उन्होंने गुड्डू को एक काँच के हैंगिंग लैम्प जिसको हमको खरबूजा बोलते थे उसके हरे,नीले और सफेद रंग के 2-2 हजार पीस का ऑर्डर लगभग 38-40 रुपये प्रति पीस में दिया है और उसका एडवांस ये दिया है।गुड्डू ने सैम्पल के पीस की फोटो या पीस भी दिखाया और हमारी जानकारी के हिसाब से 5 इंच नीचे की बंद घुंडी वाले खरबूजे के रूप में यह एक नई डिज़ाइन का प्रोडक्ट था।बाद में चलकर इमरान साहब से हमारी घनिष्ठता बहुत बढ़ गयी और हमारा एक दूसरे के आना-जाना भी काफी रहा।इमरान साहब बहुत अच्छे और मजेदार व्यक्ति हैं।
अगले दिन हम लोग फिर मैसे ग्राउंड की ओर लोकल ट्राम से गए।फेयर में घूमते हुए मुझको एक बहुत बड़ा स्टैंड दिखा जिस पर कम्पनी का नाम हाका ट्रेडिंग लिखा था और यह हॉलैंड की एक बड़ी कम्पनी हुआ करती थी।मैंने उस स्टैंड की एक विंडो में कुछ काँच के आइटम लगे देखे जिनमें एक प्रोडक्ट था जिसका नाम कैप-कोन था और अपनी फैक्ट्री की कोड वाली भाषा में हम लोग उसको चिड़िया पुकारते थे।मैं उस स्टैंड में घुस गया और मैंने उनको अपना परिचय दिया कि मैं भारत से आया काँच का मैन्यूफैक्चरर और एक्सपोर्टर हूँ।यहाँ जिन्होंने स्टाल लगाये हुए हैं वो लोग मैन्यूफैक्चरर न होकर ट्रेडर्स मात्र हैं जो हम जैसों से काँच का सामान लेकर बेचते हैं जबकि मैं यहाँ एकमात्र मैन्यूफैक्चरर- एक्सपोर्टर हूँ।मेरे पास उस फेयर में कोई स्टैंड तो था नहीं तो अपनी अटैची में सैम्पिल लाद कर घूम कर माल बेचने के अलावा मेरे पास कोई और तरीका नहीं था और उस समय फ्रैंकफर्ट फेयर में स्थान मिलना नामुमकिन सा ही था।जैसा अपेक्षित था उस स्टैंड वाले व्यक्ति ने मुझको लगभग दुत्कारते हुए कहा कि No we are not interested.मैं भी अपनी विधा में माहिर था और कहाँ मानने वाला था तो मैं उससे जबरन बेशर्मी से बात-चिरौरी करता रहा।आखिर में जब मुझको लगा कि इस पर तो कोई असर ही नहीं है तो मैंने कहा कि आप कह रहे हैं कि आप काँच में डील नहीं करते लेकिन आपके बूथ (स्टाल/स्टैंड) पर तो काँच के बहुत आइटम लगे हैं तो उसने खीझते हुए कहा कि ये हम अपना स्टॉक क्लियर कर रहे हैं और अब आप जाइये।मरता क्या न करता और मैंने अपनी अटैची उठायी और चलते हुए उसके बूथ की खिड़की में रखे कैप कोन की तरफ इशारा करते हुए बोला कि मैं जा रहा हूँ फिर भी अगर आपको ऐसा कैप कोन चाहिए तो मैं आपको 50 सेंट प्रति पीस में दे सकता हूँ।ये मैंने एक दूर की कौड़ी फेंकी थी लेकिन मेरा तीर बिल्कुल निशाने पर लगा और उसने मुझसे तुरंत बैठने को कहा। दरअसल हम वो कैप कोन जितने का भारत में बेच रहे थे मैंने लगभग उतने ही दाम का उसको बता दिया था जो उसके लिए बहुत सस्ता होना ही था।इसके बाद उसने मेरे सैम्पिल देखे और मुझसे बात करनी शुरू की।मेरे सैम्पलों से उसको प्रभावित हुआ ही था क्योंकि तब भारत के बहुत कम एक्सपोर्टर फ्रैंकफर्ट फेयर के स्टाल से काँच बेचते थे और जो ये काम करते भी थे उनका भी मुख्य प्रोडक्ट मेटल होता था हाँ ग्लोब मैटल नामक एक फर्म अवश्य थी जो जिन्होंने सिर्फ काँच का एक स्टाल लगाया था और उनकी जबरदस्त सेल थी।बहरहाल बात करते हुए हाका ट्रेडिंग वाले ने मुझको अपना एलबम खोल कर उसके पन्ने पलटते हुए अचानक एक आइटम दिखा कर उसके बारे में पूछा।उस दिन भाग्य की देवी मुझ पर मेहरबान थीं और वो आइटम था वही 5 इंच का बंद घुंडी वाला खरबूजा जिसका ऑर्डर एक दिन पहले ही इमरान साहब ने गुड्डू को दिया था।उसने मुझसे पूछा कि ये लैम्प सप्लाई कर सकते हो और मैंने तपाक से एक तीर फिर छोड़ा जो इतने अंधेरे वाला भी नहीं था।मैंने कहा कि भाई इसका तो ऑर्डर आप कल या परसों जेमको वालों को प्लेस भी कर चुके हो और वो भी लगभग डेढ़ से दो डॉलर की कीमत पर।अब तो बारी उसकी थी चौंकने की,मेरा तुक्का तीर बन कर बिल्कुल सही निशाने पर लगा था।वो भौंचक्का मुझको देखते हुए एकदम से खड़ा हो गया और मुझसे बोला कि ये तुमको कैसे पता है?मैंने मुस्कुराते हुए कहा कि मैंने आपको बताया तो कि यहाँ जो हैं वो सब ट्रेडर्स हैं और मुझसे या मेरे जैसों से माल लेकर यहाँ बेचते हैं।अब सीन बिल्कुल बदल चुका था,मेरे लिए गर्मागर्म कॉफी आ चुकी थी और अब वो दो लोग मुझसे बात कर रहे थे।उन्होंने कहा कि तुम ये आइटम हमको कितने में दे दोगे जिस पर मेरा जवाब था कि ये आइटम मैं आपको दूंगा ही नहीं।उन्होंने पूछा क्यों तो मेरा उत्तर था कि ये हम जेमको वालों को बेच चुके है और हम बात के पक्के लोग हैं ब्रीच ऑफ ट्रस्ट नहीं करते हैं।मेरी इस बात पर वो बहुत खुश हुए और जब मैं एक घंटे बाद उनके बूथ से निकला तो मेरे हाथ में बीस हजार डॉलर से ज्यादा का एक 40 फीट कंटेनर के माल का ऑर्डर था।

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