सिंदबाद ट्रैवल्सअमेरिका-3वाशिंगटन डी सी स्मिथसोनियन म्यूज़ियम आदि Original moon rock piece Original Apollo 11 module Columbia
सिंदबाद ट्रैवल्स
अमेरिका-3
वाशिंगटन डी सी
स्मिथसोनियन म्यूज़ियम आदि
Original moon rock piece
Original Apollo 11
module Columbia
दीपा भाभी के साथ मेट्रो से मैं वाशिंगटन डीसी गया।अभी तक मैं कोलकाता की मेट्रो,फ्रैंकफर्ट की UBahn,पेरिस की मेट्रो,लंदन की अंडरग्राउंड सब देख चुका था और सभी एक से एक अच्छी सेवा दे रही हैं।अमेरिका के मेट्रो स्टेशनों पर एक नई बात जो देखी वो यह थी कि जब ट्रेन आने वाली होती थी तो पूरे प्लैटफॉर्म पर किनारे की ओर एक लंबी पट्टी जैसी लाइट चमचमाने लगती थी,यह मैंने और कहीं नहीं देखा था।वाशिंगटन की मेट्रो सन 1976 से कार्यरत है जबकि लंदन की अंडरग्राउंड सबसे पुरानी है जो सन 1863 से चल रही है जबकि पेरिस की मेट्रो सन 1900 से,फ्रैंकफर्ट की सन 1968 से और कोलकाता की सन 1984 से सेवा दे रही हैं जबकि दिल्ली में मेट्रो की शुरुआत सन 2002 में हुयी थी।
अमेरिका की जनसंख्या सन 2021 की जनगणना के अनुसार लगभग 33 करोड़ 19 लाख है।अमेरिका में रहने वाले भारतीय और भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या लगभग 40 लाख है।अमेरिका में बहुत सारे भारतीयों ने विविध क्षेत्रों में बहुत नाम कमाया है।स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका में जो सम्बोधन दिया था उसकी धमक आज एक शताब्दी से ज्यादा समय हो जाने पर भी बरकरार है।परम हंस योगानन्द,कल्पना चावला,सुनीता विलियम्स, जुबीन मेहता,हरगोबिंद खुराना (नोबेल पुरस्कार विजेता), सुब्रमण्यन चंद्रशेखर (नोबेल पुरस्कार विजेता),वेंकटरमन रामकृष्णन (नोबेल पुरस्कार विजेता),अभिजीत बैनर्जी (अर्थशास्त्री और नोबेल पुरस्कार विजेता), डॉक्टर विनोद दुबे ( वर्ल्ड बैंक),प्रसिद्ध शिक्षाविद प्रोफेसर कौशिक बसु,गीता गोपीनाथ,अरविंद पनगढ़िया, विनय स्वरूप (विश्व बैंक), निक्की हैली,कमला हैरिस (वर्तमान उपराष्ट्रपति संयुक्त राज्य अमेरिका), रो खन्ना,अमी बेरा,विन्सन गिरधारी छाबड़ा (डिस्ट्रिक्ट जज),निकोलस रंजन (डिस्ट्रिक्ट जज),अमिताव घोष (नासा मार्स मिशन), विवेक मूर्ति (सर्जन जनरल ऑफ यू ऐस ), अजय बंगा (अध्यक्ष विश्व बैंक) आदि ये सब वो नाम हैं जिन्होंने भारत और भारतीय मूल का परचम अमेरिका में फहराया है।
वाशिंगटन घूमने का सिलसिला चालू हो चुका था और हम लोग स्मिथसोनियन एयर ऐंड स्पेस म्यूज़ियम गए और अपनी किस्म के अलग इस संग्रहालय को देखना एक अलग ही अनुभव है।आप जब मुम्बई के म्यूज़ियम जाते हैं तो मुझको याद है वहाँ एक हॉल में बीचोबीच लंबी बड़ी से व्हेल मछली ऊपर टंगी हुई दिखती है।काहिरा के म्यूज़ियम में पुराने समय की मूर्तियां,ममीज़,सोने के कमरे,सोने के जूते,चप्पल आदि दिखते हैं और जब आप लंदन के क्राउन ऑफ ज्वेल्स म्यूज़ियम में जाते हैं तो आपको विभिन्न किस्म के हीरे-जवाहरात आदि दिखते हैं किंतु जब आप वाशिंगटन डीसी के स्मिथसोनियन एयर ऐंड स्पेस म्यूज़ियम में जाते हैं तो आपको वस्तुएं तो दिखती ही हैं किंतु एक सोच दिखती है जिसने अमेरिका को इतना विकसित राष्ट्र और समाज बनाया।सोच विज्ञान की,विज्ञान की उपलब्धियों की, सोच अंतरिक्ष में छलांग लगाने की।इस म्यूज़ियम की स्थापना सन 1946 में नेशनल एयर म्यूज़ियम के रूप में की गई थी।यहाँ आपको विश्व के हवाई जांबाज,अंतरिक्ष यान और इससे जुड़ी वस्तुओं का विशाल और अद्भुत संग्रह नज़र आएगा। यह संग्रहालय विमानन,वैमानिकी,अंतरिक्ष यात्रा,नक्षत्रीय विज्ञान आदि के इतिहास और शोध का केंद्र है।मजे की बात यह है कि यहाँ घूमते हुए काफी समय आपको अपना सर ऊपर किये हुए ही देखना होता है क्योंकि अनेकों विमान-यान आदि ऊपर जैसे हवा में लटके ही दिखते हैं।यहाँ की उल्लेखनीय चीजों में 1903 का वो यंत्र है जिसको प्रथम विमान के रूप में उड़ा कर राइट बंधुओं ने हवा में न सिर्फ अपनी अपितु मानव जाति की पहली उड़ान भरी थी।यहाँ पर Bell-X नामक वो विमान भी आपको दिख जाएगा जिसने सबसे पहले साउंड बैरियर तोड़ने वाली उड़ान भरी थी।यहाँ आकर आपको जीवन का एक ऐसा अनुभव प्राप्त होता है जो कहीं और होना सम्भव नहीं।आप आश्चर्य चकित रह जाते हैं जब आपके सामने अपोलो 11 का कमांड मॉड्यूल कोलंबिया दिखता है।यह अपोलो 11 का वही मॉड्यूल था जिसमें बैठ कर नील आर्मस्ट्रॉन्ग,बज एल्ड्रिन और माइकल कोलिन्स 1969 में चाँद पर गए थे।इसी से उतर कर 20 जुलाई 1969 को नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने चाँद पर अपने पैर के रूप में पृथ्वी की समस्त मानवजाति का चाँद पर पहला कदम रखा था।जरा सोचिए कि कैसा लगा होगा चाँद पर अपना पहला कदम रखते हुये नील आर्मस्ट्रॉन्ग को।जब ये सोच कर मैं उतावला हो रहा था तो उन तीनों चन्द्र-अंतरिक्ष यात्रियों की मनः स्थिति कैसी रही होगी।
यहीं एक ओर वो स्पेससूट भी प्रदर्शित है जिसको पहन कर नील आर्मस्ट्रॉन्ग के रूप में मानवजाति ने एक नया इतिहास रचा था।मैं यह सब देख कर रोमांचित और आश्चर्यचकित हो रहा था कि तभी दीपा भाभी ने मेरा ध्यान एक ऐसी वस्तु की ओर आकर्षित किया जिसको देखना-छूना मेरे लिए अवर्णनीय अनुभव था;यह था चाँद का टुकड़ा,जी हाँ चाँद का टुकड़ा।
1972 में अपोलो 17 के अंतरिक्ष/चाँद यात्री Schmitt अपने साथ चंद्रमा से 3.8 अरब साल (3.8 बिलियन साल)पुरानी एक चट्टान का टुकड़ा भी लाये थे शोध और अनुसंधान हेतु।यह चट्टान का टुकड़ा सोचिए 2,40,0000 (दो लाख चालीस हजार मील ) दूरी का सफर तय करके यहाँ लाया गया था।इसी बड़े चट्टान के टुकड़े से एक छोटा सा टुकड़ा वहाँ संग्रहालय में रखा हुआ है एक लकड़ी के पोडियम स्टैंड जैसे पर जड़ा हुआ।उस गहरे रंग के कुछ-कुछ ग्रेनाइट की रंगत जैसे चिकने टुकड़े को मैं काफी देर तक तो खड़ा हुआ निहारता ही रहा।मुझको सहसा विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जिस चंदा मामा की कहानियाँ-लोरियां हमने बचपन में अपनी दादी, नानी और माँ आदि से सुनी थीं उसी चाँद का एक टुकड़ा मेरे सामने इतना पास है कि मैं उसको छू सकता हूँ।मेरे लिए वो एक बहुत ही अद्भुत,अविस्मरणीय और रोमांचक पल था जब न जाने कितने गीतों,शायरियों की विषय-वस्तु बना चाँद का टुकड़ा और मैं रू ब रू थे।मैंने बहुत उत्साह से लेकिन किंचित सहमते हुए उस चाँद के टुकड़े को छुआ और वो स्पर्श मेरे मनोमस्तिष्क में हमेशा के लिए अंकित हो गया।इस म्यूजियम में अंतरिक्ष यात्री क्या खाते हैं,कैसे रहते हैं जैसी तमाम जानकारी और उस से सम्बंधित चीजें प्रदर्शित थीं और मेरा यही मानना है कि वाशिंगटन डीसी जो भी जाये उसको यह म्यूज़ियम अवश्य देखना चाहिए।



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