सिंदबाद ट्रैवल्सफ्रैंकफर्ट जर्मनी में एक भारतीय का किस्सा जो आने अकेलेपन से परेशान होकर मिलने आते थे
सिंदबाद ट्रैवल्स
फ्रैंकफर्ट जर्मनी में एक भारतीय का किस्सा जो आने अकेलेपन से परेशान होकर मिलने आते थे
व्यापार के सिलसिले में विदेश जाना अक्सर होने लगा था और वहाँ फेयर के दौरान मिलने वाले हिंदुस्तानी निर्यातकों खास तौर से मुरादाबाद और दिल्ली के से अच्छे सम्बन्ध भी होने लगे थे। कई बार ऐसा भी हुआ कि हम लोगों का भारत से आने अथवा जाने में हवाई यात्रा के दौरान भी साथ हुआ। मुरादाबाद के विजय भाई, नवीन भाई, कमल चंद्रा जी, इमरान साहब, डॉक्टर वस्फ इलाही, दिल्ली के रविशरण जी आदि से समय के साथ काफी अपनापन और घनिष्ठ सम्बन्ध हो गए। यहाँ मैं यह भी बताना चाहूँगा कि विदेश में लम्बा टूर हो जाने पर जब खाली समय हो तो अकेलापन भी बहुत बार महसूस होने लगता था। जर्मनी की एक यात्रा के दौरान मैं,विजय भाईसाहब, नवीन आदि फ्रैंकफर्ट के प्रसिद्ध जू को भी देखने गए थे।
अकेलेपन पर एक किस्सा और याद आया कि हम लोग जब भी फ्रैंकफर्ट फेयर में जाते एक भारतीय सज्जन हम लोगों से मिलने अवश्य आते थे।मैंने एक बार उनसे पूछा कि आप हम सब को जानते नहीं हैं फिर भी हर बार इतने प्रेम से अनजान लोगों से मिलने क्यों आते हैं?इसके उत्तर में जो बात उन्होंने बताई वो मन को थोड़ा दुखी करने वाली भी थी।उस जमाने में आज से काफी कम हिंदुस्तानी विदेशों में रहते थे।इन जनाब का किस्सा यह था जो उन्होंने खुद बताया;वो बोले कि भाई मैंने यहाँ की सिटीजनशिप लेने को जर्मन महिला से शादी कर ली।मेरे 3 लड़कियां हैं।हमारा जीवन यहाँ के हिसाब से बहुत सुखी है लेकिन एक समस्या तो यह है कि हमारे घर में सब जर्मन ही बोलते हैं तो अपनी भाषा सुनने को,उसमें बात करने को तरस जाता हूँ तो हुड़क उठती है इसलिए फेयर के दिनों में अपने लोगों से मिलने बात करने आ जाता हूँ।उन्होंने बताया कि जर्मनी का रहन सहन संस्कृति भी बहुत फर्क है।वो भारत में संयुक्त परिवार की बैकग्राउंड से थे तो बहुत साल हो जाने पर भी और सारी भौतिक सुविधाएं होने के बावजूद भी वहाँ की सभ्यता,संस्कृति, खुलेपन,युवाओं में खुद के बच्चों के वहाँ की संस्कृति के हिसाब से सेक्स के प्रति खुलेपन और आज़ाद विचारों से वो संजस्य नहीं बिठा पाए थे तो फेयर के दिनों में भारतीयों से मिलकर उनको आत्मिक शांति मिलती थी और हम लोगों को उन्होंने एक से ज्यादा बार खुद रेस्त्रां में ले जाकर चाय पिलाई थी।उनकी कहानी सुनकर मुझको डुसेलडॉर्फ के सूद साहब भी याद आये और फ्रैंकफर्ट के ही कॉस्ट्यूम ज्वेलरी की दुकान के मालिक सरदार जी भी।अब तो भारतीय लोग विश्व में बहुत स्थानों पर रह रहे हैं और इंडियन कम्युनिटी के काफी लोग होने के कारण अलगाव की फीलिंग की समस्या भी कम होती है लेकिन एक वो भी वक़्त था जब जो लोग बेहतर जीवन स्तर की तलाश में सात समंदर पार रहने जाते थे उनको कितनी और किस किस किस्म की परेशानियों से रू ब रू होना पड़ता था।
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