USA अमेरिका-1

अमेरिका-1

सन 2000 की बात है यूरोप से आगे अब इस बार अमेरिका जाने का कार्यक्रम था।मेरा टिकट एयर फ्रांस का था और यूरोप की यात्रा के बाद अब मैं पेरिस के चार्ल्स द गॉल हवाई अड्डे से अमेरिका के वाशिंगटन डी सी के डलस ऐयरपोर्ट के लिए जहाज में बैठ गया था।जहाज हवा में अटलांटिक महासागर के ऊपर से और पश्चिम की ओर उड़ता जा रहा था और मैं सोच रहा था कि एशिया,अफ्रीका, यूरोप महाद्वीपों के बाद अब मैं एक और महाद्वीप उत्तरी अमेरिका की ओर जा रहा था।मैं सोच रहा था कि अभी एक दशक पहले मैंने एक सपना देखा था कि एक नया काम एक्सपोर्ट का काम शुरू करूंगा वो पूरा हो चुका था।किसी जमाने में 1910 और 1920 के दशक से मेरे बाबा स्व0 सुशील चंद्र चतुर्वेदी जी ने फिरोजाबाद के काँच उद्योग को एक संगठित (organized) रूप में आगे बढाने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी और 1960 के दशक से बल्बों की ग्लास मेटल कैप्स के सीलिंग के लिए प्रयुक्त होने वाले विट्राइट ग्लास के आयात के स्थान पर यहीं देश में उसकी तकनीकी लाकर उसका उत्पादन शुरू करके (import substitution) भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा बचाने में अपना योगदान दिया था और ऐसा ही बच्चों के खेलने के कंचे जिनको मार्बल बॉल्स भी कहते हैं उनके अंदर लगने वाले प्लास्टिक ग्लास का उत्पादन भी जापानी तकनीक के कैमिकल कम्पोज़िशन से हमारे पापा ने भारत में शुरू कर दिया था; तो हम दोनों भाइयों ने भी उनके पदचिन्हों पर चलते हुए अपने शहर,अपने उद्योग और अपने देश के लिए कुछ करने का प्रयास किया इसका आज मुझे संतोष था।इसी बीच हम लोगों के मूल काम यानी ब्लॉक ग्लास-विट्राइट ग्लास का भी हमारे पापा ने बांग्लादेश आदि देशों को शुरू कर दिया था और इसके सिलसिले में उनका ढाका-बांग्लादेश जाना अक्सर होता था और एक लंबे समय तक रहा।यहाँ उल्लेखनीय बात यह है कि पापा बांग्लादेश में ढाकेश्वरी देवी के दर्शन अक्सर करने जाते थे और वहाँ उनको पुजारी आदि सभी लोग जानते थे।वहाँ कुछ पुजारी ऐसे भी थे जो हिंदू नहीं होने के बावजूद मंदिर में पूजा आदि करते थे।एक रोचक बात यह भी थी कि बांग्लादेश में पापा की ज्योतिष के कारण जब भी वो वहाँ जाते उनसे मिलने वालों का तांता लगा रहता था और उनसे ज्योतिषीय परामर्श लेने वालों में कई नामचीन उद्योगपति,व्यापारी,अफसर और नेता शामिल थे जिनमें कुछ वहाँ की सरकार में मंत्री थे।पापा से ज्योतिष के विषय में मिलने वालों में वहाँ के एक राष्ट्रपति रहे उनकी पत्नी भी थीं।
जब एक्सपोर्ट का काम शुरू हो गया तो मेरी टीम के अभिन्न सदस्य श्री रामकुमार गुप्ता रामू भाईसाहब अक्सर कहते थे कि भाईसाहब इस काम को सीक्रेट रखो,इसके विदेशी व्यापारियों को फिरोजाबाद मत लाया करिए नहीं तो वो और जगह भी पहुँच जाएंगे किंतु इस विषय में मेरा सोचना और मेरी राय उनसे बिल्कुल भिन्न पर स्पष्ट थी।मेरा मानना था कि विदेश में काँच के व्यापारियों को मालूम होना चाहिए कि फिरोजाबाद ही वो जगह है हिंदुस्तान में जहाँ काँच बनता है।जब वो फिरोजाबाद आएंगे तो यह काम यहाँ स्थापित होगा,हमारे शहर का नाम बढ़ेगा,यहाँ एक नया काम शुरू होगा और बहुत सारे लोगों को रोजगार मिलेगा।दूसरे मेरा मानना था कि इस काम का आयाम इतना बड़ा है कि हम सबकी जरूरत यह पूरा करेगा।सबके लिए बहुत काम होगा।मुझको अमेरिका जाते वक्त यह खुशी थी कि मेरी सोच सही थी।आज ब्रांड फिरोजाबाद चल पड़ा था।अब फिरोजाबाद वालों को दुनिया में घूम-घूम कर अपने कंधों और हाथों में सैम्पल लादे हुए यह बताना नहीं था कि काँच फिरोजाबाद में बनता है।
मैंने पहले बेल्जियम के ग्राहक द्वारा दिये गए कैंडल स्टैंडों का जिक्र किया है।अमेरिका की एक बहुत बड़ी कम्पनी पॉटरी बार्न करके है उनके यहाँ 1996 में हमारे यह कैंडल स्टैंड सलेक्ट हो गए थे।उनके कैटलॉग में मुखपृष्ठ यानी कवर पेज पर आने वाला यह पहला भारतीय उत्पाद था।इसका भी एक मजेदार किस्सा यह हुआ कि जब 3 कैंडल स्टैंड के यह सैम्पल उनके यहाँ फोटोग्राफी को गए तो उनमें से एक पीस नीचे से कुछ टूट गया था और इतना समय नहीं था कि सैम्पल दुबारा भेजा जाए तो उन्होंने दो कैंडल स्टैंड सीधे खड़े और एक ऐसे लेटा हुआ करके फोटो खींची कि टूटा हुआ हिस्सा न दिखे।वो कवर पेज बहुत सुंदर था और इस प्रोडक्ट ने कई मायनों में इतिहास रचा।
अमेरिका की ही एक अन्य बड़ी कम्पनी थी हॉलमार्क कार्ड वाली।उनसे हमारा बहुत काम हुआ।उनके शादी की सालगिरह के सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली कार्डों की सीरीज के लिए हमने काँच के हाथ से ढले पीस ओर दो हंसों (swan) का जोड़ा बनाया था जिसको सिल्वर और गोल्डन डोरे से लटकाया जाता था।अमेरिका के लिए हमने जो भी चीज़ बनाई उसकी संख्या लाखों तक भी चली जाती थी और कई बार मिलियन्स में भी।
अमेरिका की बहुत सी कम्पनियों से हमारा सम्पर्क था और व्यापार भी शुरू हो चुका था जैसे पॉटरी बार्न,पीयर वन,बॉम्बे कम्पनी,टूज़ कम्पनी,हॉलमार्क आदि और लगभग सभी काम उनके बाइंग एजेंटों के माध्यम से था।मुझको काम सिखाने और अच्छा काम दिलाने में एक्ज़िम इंटरनेशनल के श्री मोहित कुमार,श्री रोहित गुहा,समथिंग एल्स की सुश्री रूमा मलिक,बाद में खुद का काम शुरू करने वाले श्री अनुपम त्रिवेदी,श्री अजय एब्रोल, श्री विशाल आदि अनेक बाइंग एजेंटो को मैं कभी भूल नहीं सकता।मेरी अमेरिका यात्रा में मुझको व्यापारियों से मिलने का उतना एजेंडा नहीं था क्योंकि उनसे एजेंटो के माध्यम से काम होता था किंतु मैं उस देश के मार्केट की फील अवश्य लेना चाहता था।मुझसे पहले अभिनव का अमेरिका जाने का प्रोग्राम बना था किंतु मेरे कार एक्सीडेंट की खबर सुन कर वो जर्मनी से ही वापिस लौट आये थे।
अमेरिका में मेरी इलाहाबाद वाली मौसी जिनको हम बड़ी मौसी कहते थे और जिनके साथ हम लोगों का इलाहाबाद में बहुत समय गुजरा उनके मंझले पुत्र श्री विनय स्वरूप रहते थे जिनको हम लोग बीनू दादा कहते हैं।मेरा कार्यक्रम वाशिंगटन डी सी में बीनू दादा और उनकी पत्नी दीपा भाभी के साथ ही रुकने का था।जैसा मैंने बताया कि मेरे जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में बीता और इसलिए बड़ी मौसी स्व0 श्रीमती सुषमा चतुर्वेदी और मौसाजी स्व0 प्रोफेसर रामस्वरूप चतुर्वेदी जी का मुझ पर बहुत आशीर्वाद और प्रभाव भी रहा है।बड़ी मौसी के तीनों पुत्र श्री विनीत कुमार (गुड्डा दादा) जो हिमाचल प्रदेश में भारतीय वन सेवा के उच्च अधिकारी थे,श्री विनय स्वरूप जो अमेरिका में विश्व बैंक में उच्च पद पर कार्यरत हैं और श्री विवेक (वेकी) जिनका मुम्बई में अपना बहुत अच्छा कारोबार है,ये तीनों लोग मेरे लगभग हमउम्र से हैं और हम लोगों की बहुत निकटता रही है।अमेरिका में मेरा कार्यक्रम वाशिंगटन और फिर उससे आगे अनेकों स्थानों पर होते हुए वैस्ट कोस्ट तक जाने का और फिर वापिस वाशिंगटन डीसी से ही अपनी वापिसी की फ्लाइट पकड़ने का था।अमेरिका में अन्य स्थानों पर जाने के लिए मैंने टीसीआई ट्रैवल कम्पनी से टिकट के साथ VUSA स्कीम के जहाज के यात्रा के टिकट लिए थे और ये सारा कार्यक्रम मैंने टीसीआई के मैनेजर लाल साहब की राय से बनाया था।

आज जब मैं यह संस्मरण सन 2023 में लिख रहा हूँ तो मेरे पुत्र अर्पित, पुत्री ऐश्वर्या और पुत्रवधू उपासना अमेरिका की प्रतिष्ठित कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से और भांजा ईशान प्रतिष्ठित स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी कर चुके हैं बल्कि उपासना तो अभी वहीं से PHD कर रही हैं और मुझको अमेरिका,वहाँ के लोग,वहाँ का समाज आदि विषयों में थोड़ी जानकारी है लेकिन उस वक़्त मैं जहाज से उस अनजान देश की ओर जब बढ़ रहा था तो मेरे लिए सब कुछ नया सा ही था।हाँलाँकि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आधुनिक इतिहास में एम ए करते समय मेरे पास एक विषय अमेरिकन हिस्ट्री का भी था जो प्रोफेसर सी बी त्रिपाठी जी (अब स्वर्गीय) पढ़ाते थे किंतु वो इतिहास था।
अमेरिका कैसा होगा,वहाँ का माहौल कैसा होगा आदि बातों को सोचते हुए समय बीतता जा रहा था कि हवाई जहाज में उद्घोषणा हुयी कि हम वाशिंगटन डी सी के डलस हवाई अड्डे पर लैंड करने वाले हैं।हवाई अड्डे पर उतरते वक़्त मुझको एक आशंका सी थी कि अमेरिका में इमिग्रेशन वाले न जाने कितना समय लगाएंगे,न जाने कितने प्रश्न पूछेंगे किंतु सारी आशंकाएं निर्मूल निकलीं और थोड़ी देर में ही अपना सामान लेकर मैं बीनू दादा जो मुझको लेने आये थे उनके साथ उनकी गाड़ी में था।अमेरिका का जो पहला इम्प्रैशन मुझ पर पड़ा वो इमिग्रेशन का था जो अच्छा था फिर वहाँ की खुली,चौड़ी सड़कें काफी अच्छी लगीं।यूरोप के विपरीत अमेरिका में हर चीज में एक खुले इलाके,बड़े इलाके और विशालता का अहसास ज्यादा प्रोमिनेन्ट था।

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