आजकल के मुद्दों का साध्य क्या है

आजकल मिलावट और वक़्फ़ के मुद्दों की चर्चा बहुत है और धार्मिक संस्थान से जुड़े होने के कारण जोरों पर है और यही क्यों अब तो लगता है कि रोजमर्रा में वर्षों से हमारा सबसे जरूरी मुद्दा सामाजिक-धार्मिक मामलों का ही है आर्थिक मामले शायद कोई विशेष मायने नहीं रखते हैं। सही बात तो यही है कि फ्रांस की क्रांति के बारे में जब पढ़ा तो लगा था कि क्रांतियां तो रोटी, बराबरी का हक, बराबरी के मौके, बोलने की आज़ादी आदि के लिए होती हैं, अमेरिका की क्रांति के किस्से भी कुछ ऐसे ही लगे थे।अपने देश में क्रांति का कारण जब चर्बी के कारतूस पढ़ा तो समझ आया कि हम लोगों के लिए ये मुद्दे शायद उन मुद्दों से ज्यादा जरूरी थे लेकिन फिर और सोचा तो लगा कि मूल मुद्दे तो आर्थिक और अपने हकों की लड़ाई के ही रहे होंगे हाँ अलबत्ता चिंगारी ऐसे मुद्दों से भड़की होगी। रूस की क्रांति ने बताया कि आर्थिक मुद्दों पर भी जनता की भावनाओं का लाभ उठा कर लगभग एक सदी तक की राजनीति साधी जा सकती है। मतलब यही लगा कि विचार और विचारधारा कैसी भी बताई जाए साध्य एक ही निकलता है।
अब जब पिछले कुछ दशकों से महसूस हो रहा था कि नहीं हमारे यानी कि जनसाधारण के लिए मुख्य मुद्दे भावनात्मक और सामाजिक-धार्मिक ही रहे हैं लेकिन अब मिलावट और वक़्फ़ वाले मुद्दों से लगता है कि दरअसल जिन मुद्दों को सामाजिक-धार्मिक मानते-जानते हुए हम संवेदनशील हो जाते हैं और हमारी भावनाएं आहत हो जाती हैं उनके पीछे के कारण भी अधिकांशतः आर्थिक होते हैं और उनसे भी राजनीति ही सधती है।

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