जर्मनी के होटल में हमने भी अपने प्रोडक्ट्स का डिस्प्ले लगाया

जर्मनी के होटल में हमने भी अपने प्रोडक्ट्स का डिस्प्ले लगाया

जैसा मैंने पहले बताया है कि हम लोग जब अगस्त 1994 में फ्रैंकफर्ट फेयर गए तो वहाँ हमने अब्दे इलाही जी को होटल में डिस्प्ले लगाते देखा था तो इस बार यानी कि 1995 की फरवरी के फेयर में हमने भी फ्रैंकफर्ट में अपना डिस्प्ले होटल ऐक्सल्सियर में लगाने की ठान ली थी।फेयर की शुरुआत शायद शनिवार से थी तो सारे सैम्पल तैयार करवा कर और DHL से होटल के पते पर अपने नाम पर ऐसे रवाना किया कि सामान बृहस्पतिवार को हमको फ्रैंकफर्ट में मिल जाये और मैं खुद बुधवार तक फ्रैंकफर्ट पहुँच गया।इस विषय में मेरी तैयारी थी कि हमने अंग्रेज़ी में अपने डिस्प्ले के पैम्फलेट छपवाए थे,अपने विज़िटिंग कार्ड पर डिस्प्ले के डिटेल्स छपवाए थे और दो बैनर भी बनवा कर ले गए थे।फ्रैंकफर्ट में पूरा बृहस्पतिवार सामान के इंतज़ार में निकल गया और सामान नहीं आया और जब हमने फ्रैंकफर्ट वाले DHL के कार्यालय को फोन लगाया तो उन्होंने कहा कि कस्टम में समय लग रहा है कल डिलीवरी होगी।अगले दिन दोपहर तक जब डिलीवरी नहीं हुयी तो मैं खुद पहले DHL फ्रैंकफर्ट के और फिर उनके एयरपोर्ट वाले ऑफिस पहुँच गया।वहाँ पहुँच कर मालूम पड़ा कि माल दोपहर बाद कस्टम से क्लियर हुआ है और उनकी डिलीवरी वैन उसके पहले ही उस दिन का माल लेकर जा चुकी थी इसलिए अब डिलीवरी सोमवार को ही सम्भव थी।यह सुन कर मेरे हाथों के तो जैसे तोते उड़ गए और मैं अपना होश जैसे खो बैठा।मुझको लगा कि इतना पैसा और प्रयास तो व्यर्थ जाएगा ही साथ ही व्यापार की आगे की प्लानिंग भी गड़बड़ा जाएगी।मुझको बहुत गुस्सा भी आ रहा था तो मैं जोर से चिल्लाने लगा कि ये क्या तरीका है।मेरा तो फेयर ही निकल जायेगा।मेरे ऐसे चिल्लाने से वो सब वहाँ बहुत असहज हो गए और उनका सीनियर एक्ज़ीक्यूटिव मुझसे बोला कि आपकी समस्या तो ठीक है पर आप शोर क्यों मचा रहे हैं?और तब मुझको समझ आया कि वो भारत नहीं जर्मनी था और वहाँ कठोर से कठोर बात भी शालीन शब्दों और शांति से अपेक्षित थी।खैर,मैंने अपने आप को संभाला और उनसे खुशामद सी की और बताया कि ऐसे मेरा तो पूरा प्लान ही चौपट हुआ जा रहा है।उन्होंने कहा कि वो तो सब ठीक है पर हमारी तो डिलीवरी वैन जा चुकी है।मेरे बहुत समझाने के बाद उन्होंने कहा कि आप को हम ऐज स्पेशल केस अलाउ कर सकते हैं अपना सामान खुद ले जाने को यदि आप स्वयं इसको अपने खर्चे पर ले जाएं।मेरे पास तो कोई और चारा था ही नहीं और वो लोग मदद को अब तैयार हो ही गए थे तो मैंने तुरंत हामी भरी,फिर एक टैक्सी मंगवाई और सैम्पल के सारे डिब्बे खुद उठा कर टैक्सी तक ले गया और टैक्सी में रखे और फिर सारा सामान लेकर एयपोर्ट से होटल आया।
होटल में रात को ही खुद ही डिस्प्ले लगाया अपने कमरे में।अगले दिन सुबह मैं फेयर ग्राउंड के बाहर फेयर शुरू होने के समय से लगभग 1 घंटा पहले पहुँच गया और एंट्री गेट पर खड़े होकर प्रत्येक जाने वाले को अपने होटल आकर डिस्प्ले देखने वाले आमंत्रण के पैम्फलेट बांटे और हाँ इसके पहले वहाँ अपने बैनर भी खुद ही टांगे थे क्योंकि भला और कौन ऐसा करता हमारे लिए?ये सब करने के बाद जब फेयर चालू हो गया तो मैं अंदर गया।यहाँ यह बताना जरूरी है कि फेयर के आयोजक इस बात को पसंद नहीं करते थे कि फेयर से इतर कोई और आदमी वहाँ अपना प्रचार या प्रयास करे तो यह सब काम जरा सावधानी से ही करना था।फेयर के अंदर जाकर भी मैंने कुछ ऐसे स्टाल वालों को अपना निमंत्रण दिया जिनके स्टाल पर काँच के उत्पाद मुझको लगे दिखे थे।मेरे इतने सारे प्रयासों के फलस्वरूप कुछ लोग होटल तक चल कर हमारा डिस्प्ले देखने आए और जर्मनी की एक बहुत ही प्रतिष्ठित कम्पनी हॉफ इम्पोर्टर्स वालों ने हमारे डिस्प्ले को देख कर हमको ऑर्डर भी दिया और आगे कई वर्षों तक हॉफ इम्पोर्टर्स से हमारा काम चला और मैं एक बार उनसे मिलने उनके न्यूरनबर्ग स्थित ऑफिस/शो रूम पर भी गया था।हॉफ इम्पोर्टर्स के मालिक मिस्टर एडलर,उनकी पत्नी और उनकी लड़की मिस पेट्रा एडलर से हमारा बहुत समय तक व्यापारिक सम्पर्क रहा।मुझको याद है कि अपने काफी सैम्पल्स जिनको किसी ने पसंद नहीं किया था चलते समय होटल के कमरे में ही लगा छोड़ आया था क्योंकि उनको वापिस लाद कर घूमना न सम्भव था न आर्थिक रूप से उसका कोई औचित्य ही बनता था।

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