Our roads & food joints

अभी कुछ समय पहले मेरा अपनी पत्नी रचना के साथ दिल्ली पुराने यानी कि मथुरा-होडल-पलवल होते हुए westrrn peripheral लेकर जाना हुआ क्योंकि हमको पहले गुडगांव जाना था। पिछले लगभग एक दशक से अधिक से हम लोगों का दिल्ली जाना अब यमुना एक्सप्रेसवे से ही होने लगा है तो इस पुराने रास्ते के सफर से बहुत सी पुरानी यादें ताजा हो गईं। एक्सप्रेसवे के मुकाबले आगरा-मथुरा-पलवल वाले इस रास्ते पर खाने आदि के लिए ज्यादा ढाबे तो हैं ही साथ ही बेहतर और मुनासिब दाम वाले भी हैं।
अपनी याद में मुझको सड़क से यात्रा करते हुए लगभग 6 दशक हो चले हैं। इसमें याद हैं सिंगल रोड्स जिनमें सामने से भी ट्रैफिक उसी लेन पर आता था, इसके बाद दो लेन होने लगीं। एक जमाने में दिल्ली आगरा वाया मथुरा वाली सीमेंट से बनी सड़क देश की सबसे अच्छी सड़कों में होती थी।
1990 के दशक में जब मैंने विदेश जाना शुरू किया तो देखा कि यूरोप और अमेरिका की तो छोड़िए इजिप्ट तक की सड़कों को देख कर लगता था कि क्या कभी हमारे देश में भी सड़कें कभी अच्छी होंगी और फिर धीरे-धीरे हमारे यहाँ की सड़कें बहुत अच्छी होने लगीं हाँलाँकि ट्रैफिक सेंस का मामला बहुत गड़बड़ है और इस वजह से इन अच्छी सड़कों पर चलना खतरनाक भी हो जाता है।
मैं अपने देश में फिरोजाबाद से मुम्बई तक AB Road से गया हूँ, पुणे गया हूँ, मुंबई से सूरत, उदयपुर, जयपुर होते हुए आया हूँ।उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तमिलनाडु,कर्नाटक,आंध्र प्रदेश, तेलंगाना,गुजरात,बिहार,पंजाब, हरियाणा, हिमाचल तथा जम्मू और काश्मीर इतने राज्यों की सड़कों पर यात्रा करने की खूब यादें हैं। हाल के वर्षों में eastern peripheral पर भी काफी चलना हुआ।
सड़कों के बारे में मुझको लगता है कि अब हमारे यहाँ सड़कों में पिछले कुछ दशकों में बहुत सुधार हुआ है लेकिन छोटे शहरों को जोड़ने वाली सड़कों और लिंक रोड्स के मामले अभी भी बहुत अच्छे नहीं हैं दूसरे हमारे यहाँ बिना ट्रेनिंग और ट्रैफिक रूल्स जाने किसी को भी लाइसेंस एभी भी मिल जाता है जो वाकई बहुत खतरनाक स्थिति है।
इस सबमें जो कुछ बातें ज्यादा ध्यान आकर्षित करती हैं उनमें एक तो यह है कि जब 1977 में अपने माँ पापा के साथ हम लोग बाई रोड काश्मीर और हिमाचल गए थे तो रास्ते में खासतौर से हरियाणा में थोड़ी-थोड़ी दूर पर मिल्क बार हुआ करती थीं।बार तो अब भी दिखती हैं लेकिन मिल्क शब्द वाली नहीं दिखतीं।
दूसरे जो नए एक्सप्रेस वे बने हैं चाहे वो यमुना एक्सप्रेस वे हो या आगरा-लखनऊ वाला उन पर अधिकांशतः खाने के स्थान अत्यंत निराशाजनक और बहुत महँगे हैं जबकि पुराने वाले रास्ते पर बेहतरीन ढाबे हैं। जब मैं अमेरिका गया तो वहाँ भी सड़क किनारे खाने/ठहरने के जो स्थान देखे थे, हमारे एक्सप्रेसवे वाले स्थान भी वैसे ही बोरिंग बने हैं।
एक बात यह भी है कि इधर सड़कों की क्वालिटी में काफी समस्या दिख रही हैं जैसे गड्ढे,सड़कें धंस जाना आदि तो सड़कें बनाने के साथ इनकी गुणवत्ता का भी ध्यान रखना जरूरी है।
मुझको लगता है कि यात्रा के रास्तों पर रुकने के स्थान सुंदर तो हों ही (जैसे किसी जमाने में डैबचिक आदि थे/हैं) साथ ही वहाँ खाने पीने के लिए जो वस्तुएं उपलब्ध हों वो अच्छी होने के साथ दाम मुनासिब हों और हमारे नए एक्सप्रेसवे पर , न जाने क्यों, न स्थानों में वैसी ख़ूबसूरती है, न खाने की क्वालिटी अच्छी है और दाम तो अनाप-शनाप हैं ही। जब मैंने हाल ही में लखनऊ जाते में एक दुकानदार से इसका कारण पूछा तो उसने कहा कि साहब दुकानों के किराए बहुत ज्यादा हैं, लोगों की खरीदारी उतनी नहीं है तो क्या करें,तब मुझको लगा कि यह दरअसल एक विशस सर्कल बन गया है इस केस में तो जिस पर ऑथॉरिटी के लोगों को ध्यान देना चाहिए।
पहले के समय में मुझको याद आता है कि इलाहाबाद जाने पर औरैया के पास कुछ ढाबे थे और फिर कानपुर में घुसने के पहले। कानपुर के बाद इलाहाबाद तक कोई ऐसा ढाबा मिलता ही नहीं था जिस पर कुछ पेट भरने को मिल सके हाँ फतेहपुर शहर में बस स्टैंड के कुछ पहले एक चाय की दुकान जरूर थी और ऐसे ही लखनऊ इलाहाबाद मार्ग पर रायबरेली में बाद में नरेश चाय की दुकान। उधर जयपुर जाने पर महुआ का मिड वे, दिल्ली जाने पर मथुरा का अग्रवाल ढाबा, कोसी का पप्पू ढाबा और यूपी टूरिज़्म वाला रेस्टोरेंट, होडल का डैबचिक तथा पलवल का प्रकाश ढाबा, राधा कृष्ण या हरे कृष्ण ढाबा आदि बहुत अच्छे रुकने के स्थान थे और इनका खाने का स्तर भी काफी अच्छा हुआ करता था। बाद में मथुरा का मैक्डोनाल्ड्स भी इनमें शामिल हो गया था और ऐसा ही औरैया के पास का सूर्या ढाबा था तथा कानपुर लखनऊ रास्ते पर नवाबगंज पर एक स्थान के गुलाब जामुन और कानपुर इलाहाबाद के बीच मलवां के सोहन और मोहन के पेड़ों की दुकान मशहूर थीं।
एक प्रश्न का उत्तर मन खोजता है कि आखिर क्या वजह है कि मुरथल जैसे स्थान पर 5 स्टार होटलों को मात करते ढाबे हैं और उनका कारोबार बड़ी-बड़ी इंडस्ट्री को मात देता प्रतीत होता है और उसके कुछ ही पीछे दिल्ली से हरिद्वार या देहरादून जाने पर मुजफ्फरनगर के पास के हाइवे के फूड जॉइंट्स के कॉम्प्लेक्स हैं और मन में यह प्रश्न उठता है कि किसी और हाइवे पर तथा अन्य किसी सड़क पर ऐसे कॉम्प्लेक्स जो इतने अच्छे और सफल व्यापार के अड्डे हैं क्यों नहीं विकसित हो पाए हैं?? मेरे पूछने पर कुछ लोगों ने कहा कि जहाँ सिर्फ ट्रक जैसा ट्रैफिक ज्यादा होता है वहाँ इस किस्म के कॉम्प्लेक्स सफल नहीं होते हैं पर जहाँ पारिवारिक ट्रैफिक ज्यादा होता है वहाँ ये चल जाते हैं। मैं अभी इस आर्थिकी को और जानने का प्रयास कर रहा हूँ। मेरा मानना है कि यदि सरकार इस दिशा में गम्भीर सोच रखते हुए सार्थक प्रयास करे तो मुजफ्फरनगर, कोसी, पलवल और सबसे जबरदस्त मुरथल मॉडल पर नए व्यापार और नौजवानों हेतु नए रोजगार की संभावनाएं पूरे देश के हाईवेज़ पर उपलब्ध हो सकती हैं लेकिन उसमें एक्सप्रेस वे के खराब मॉडलों की स्टडी करके उनसे बचने के रास्ते भी सोचने होंगे।


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